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तीन किताबों में बहता अदभुत जानकारियों का झरना:: राजेश बादल

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सप्रे संग्रहालय में पच्चीस जनवरी को पुस्तक चर्चा सत्र

भोपाल। पच्चीस जनवरी याने शनिवार का दिन पुस्तक प्रेमियों के लिए ख़ास है। एशिया के सबसे बड़े समाचार पत्र शोध संस्थान सप्रे संग्रहालय में दोपहर ढाई बजे समकालीन पत्रकारिता और लेखन पर तीन अनूठी किताबों पर विमर्श होगा।

इस विमर्श में शामिल होने के लिए नागपुर से दैनिक भास्कर के समूह संपादक और प्रेस कौंसिल ऑफ़ इंडिया के सदस्य प्रकाश दुबे , मुंबई से वरिष्ठ कथाकार और संपादक हरीश पाठक और बायोपिक फ़िल्मकार व वरिष्ठ संपादक राजेश बादल उपस्थित रहेंगे। श्री दुबे इस कार्यक्रम की अध्यक्षता करेंगे। इस आयोजन में जिन किताबों पर चर्चा होगी ,वे हैं – गणेश मंत्री : आधुनिक हिंदी पत्रकारिता के यशस्वी स्तंभ – लेखक – हरिवंश ,मेरा आकाश ,मेरे धूमकेतु (यादों के दरीचे) लेखक : हरीश पाठक और मिस्टर मीडिया,लेखक:राजेश बादल ।

पहली पुस्तक गणेश मंत्री पर है। मंत्री जी स्वतंत्र भारत की हिंदी पत्रकारिता में राजेंद्र माथुर के बाद सबसे बड़े हस्ताक्षर थे। चिंतक और विचारक गणेश मंत्री और प्रख्यात संपादक डॉक्टर धर्मवीर भारती ने मिलकर धर्मयुग जैसी पत्रिका को देश की श्रेष्ठ पत्रिका बना दिया था। मुझ पर उनका बड़ा स्नेह था। धर्मयुग में उनके रहते मेरे अनेक आलेख प्रकाशित हुए। हम लोगों ने 1984 में राष्ट्रीय पत्रकार अधिवेशन में उन्हें छतरपुर आमंत्रित किया था। उनके सारगर्भित और विचारोत्तेजक संबोधन ने सबको मंत्रमुग्ध कर दिया था। वे जैसा बोलते थे ,वैसा ही लिखते भी थे। दूसरी पुस्तक यादों के दरीचे भाई और क़रीब पैंतालीस बरस पुराने दोस्त हरीश पाठक ने लिखी है। हरीश भी उन दिनों धर्मयुग में थे ,जब गणेश मंत्री जी भी वहाँ थे। हरीश वैसे तो अनेक अख़बारों के संपादक रह चुके हैं लेकिन इन दिनों वे मुल्क़ के लाखों पाठकों के चहेते कथाकार हैं।उनकी यह किताब प्रभात प्रकाशन से प्रकाशित हुई है। तीसरी किताब मेरी ही है।यह एशिया में सबसे लंबे समय तक चलने वाले मेरे स्तंभ मिस्टर मीडिया के चुनिंदा आलेखों पर केंद्रित है।यह स्तंभ पत्रकारिता की प्रिंट ,टीवी ,रेडियो और डिज़िटल माध्यमों की पत्रकारिता की दशा और दिशा पर केंद्रित है। इसे पी पी पब्लिकेशन ने छापा है।

इस तरह एक शानदार संपादक के चिंतन पर एक पुस्तक और दूसरी बीते पचास वर्षों में हरीश के संपर्क में आए रचनाकारों पर केंद्रित है और तीसरी पिछले छह साल की पत्रकारिता को डाँट पिलाने वाली पुस्तक है।
इन किताबों पर चर्चा के अलावा पाठकों और पत्रकारिता के छात्रों तथा शिक्षकों से संवाद भी होगा। आप सब कार्यक्रम में आमंत्रित हैं। संग्रहालय के संस्थापक संयोजक पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर ने इस संस्थान को एक ज्ञानतीर्थ बनाया है तो कृपया इस तीर्थ में पधारकर ज्ञानगंगा में डुबकी लगाने का अवसर मत छोड़िए। यहाँ पद्मश्री विजय दत्त श्रीधर का अनुरोध संग्लग्न है। दो किताबों के कवर आप देख सकते हैं। तीसरी किताब का कवर मुझे उपलब्ध नहीं हुआ।

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