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परंपरा:: दीपावली के बाद  ग्रामीण  पशुओं को सजाकर गांव में घूमाते हैं

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मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन

दीपावली पर्व के दौरान रूप चौदस के दिन आपने हर जगह महिलाओं को सजते और संवरते ही देखा होगा। लेकिन दिवाली के बाद दीवानगंज सहित ग्रामीण अंचलों मे सारे पशुओं को सजाया जाता है और पूरे गांव के भ्रमण पर निकलते है। इस दिन पशु कोई काम नहीं करते है। उनकी पूजा करते है। नए पकवान खिलाते है। दरअसल, यह अनोखी परंपरा मध्य प्रदेश सहित कई गांवों में देखने को मिलती है। इसके पीछे की वजह भगवान श्रीकृष्ण से जुड़ी हुई है, क्यूंकि श्रीकृष्ण को पशुओं से काफी लगाव था।
इस दिन वह प्रत्येक व्यक्ति जिसके घर गाय, बैल, बकरी या अन्य कोई भी पशु है, उन्हें खास तरह के आभूषण पहना कर श्रृंगार करते है। बाजारों में दुकानों पर यह आभूषण अलग-अलग डिजाइन में उपलब्ध होते है । दुकानदार महेंद्र नायक , रवि कुशवाह , नरेश साहू बताते है कि पशुओं की श्रृंगार सामग्री में मुख्यताः तीन आभूषण विशेष कर शामिल रहते है, जिन्हें हर पशुपालक अपने पशुओं के लिए खरीदता है।
इन आभूषणों में पहला है मछवंडी, जो अलग-अलग रंगों में हाथों से बुना हुआ होकर धुंगरू लगे हुए रहता है। इसे पशु के सिर पर बांधा जाता है। दूसरा होता है कांडा घुंघरू – यह भी विभिन्न डिजाइनों में घंटियां लगे होते है। इसे पशु के गले में हार की तहत पहनाया जाता है। वहीं तीसरा होता है मोरकी, इसे भी हाथो से बनाया जाता है। जालीनुमा यह मोर की पशु के मुंह पर बंधी जाती है। इसके अलावा उनके सींगो को रंगते है। शरीर पर रंगो से डिजाइन बनाते है।
पड़वा के दिन पशुओं का श्रृंगार और घरों के बाहर गाय के गोबर से गोवर्धन बनाया जाता है। क्षेत्र में यह परंपरा सदियों से चली आ रही है। यह परंपरा भगवान श्री कृष्ण से जुड़ी हुई है बाल्य अवस्था में श्रीकृष्ण ने 7 दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी तर्जनी उंगली पर उठाएं रखा था और इसके नीचे पूरा गांव बारिश से बचने के लिए सहारा लिए हुए था। तभी से दिवाली के बाद गोवर्धन की पूजा की जाने लगी। श्रीकृष्ण को पशुओं से लगाव होने और पुराने जमाने में पशुओं को धन स्वरूप मानने से इस दिन किसी भी पशु से काम नहीं करवाया जाता, बल्कि उनका श्रृंगार किया जाता है।

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