गुरु ही मोक्षमार्ग के पथप्रदर्शक, उनके ज्ञान को न नापा जा सकता है और न तौला जा सकता है : निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज
सागर । गुरु पूर्णिमा के पावन अवसर पर भाग्योदय तीर्थ में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान के दौरान निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज ने गुरु महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि यदि प्रभु और गुरु दोनों सामने हों तो सबसे पहले गुरु के चरणों में वंदन करना चाहिए, क्योंकि गुरु ही प्रभु तक पहुंचने का मार्ग बताते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु केवल अक्षर ज्ञान ही नहीं देते, बल्कि जीवन को मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर करने वाली साधना का भी मार्ग प्रशस्त करते हैं।
मुनिश्री ने आचार्य श्री ज्ञानसागर महाराज एवं आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के गुरु-शिष्य संबंध का स्मरण करते हुए कहा कि आचार्य ज्ञानसागर महाराज ने विद्याधर को दीक्षा देकर मुनित्व प्रदान किया, उन्हें आचार्य पद के योग्य समझकर आचार्य पद से विभूषित किया तथा संलेखना और समाधि मरण की संपूर्ण विधि भी सिखाई। अपने अंतिम समय में स्वयं नीचे बैठकर आचार्य विद्यासागर महाराज के चरणों में बार-बार नमस्कार करते हुए समाधि करने की इच्छा व्यक्त की। यह गुरु-शिष्य परंपरा का अद्वितीय उदाहरण है।
उन्होंने कहा कि जिस प्रकार किसी मंदिर पर कलश स्थापित होने के बाद ही वह पूर्ण माना जाता है, उसी प्रकार योग्य शिष्य को आचार्य पद प्रदान कर गुरु अपनी परंपरा को पूर्णता प्रदान करते हैं।
मुनिश्री ने कहा कि जैसे विद्युत आपूर्ति का केंद्र पूरे क्षेत्र में ऊर्जा का वितरण करता है, उसी प्रकार आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ने अपने विशाल गुरुकुल के माध्यम से धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया। उनके शिष्यों ने देशभर में धर्मध्वजा को ऊंचाइयों तक पहुंचाया। वर्षायोग के प्रथम दिवस वर्षा का प्रारंभ होना भी शुभ संकेत है। उन्होंने बताया कि चातुर्मास का वर्षायोग 105 दिनों का होता है।
प्रवचन के दौरान उन्होंने कहा कि ज्ञानी जब ज्ञानी से मिलता है तो ज्ञान का आदान-प्रदान होता है, जबकि अज्ञान का संग लाभदायक नहीं होता। उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं से सदैव सद्गुरु और सज्जनों की संगति अपनाने का आह्वान किया।
इस अवसर पर मुनि श्री चंद्र सागर महाराज ने कहा कि जैसे चंदन की सुगंध लोगों को अपनी ओर आकर्षित करती है, वैसे ही आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के व्यक्तित्व की आध्यात्मिक सुगंध से हजारों-लाखों श्रद्धालु उनके दर्शन के लिए स्वतः खिंचे चले आते थे। उन्होंने कहा कि सामान्यतः दीपक के नीचे अंधेरा होता है, किंतु आचार्य विद्यासागर महाराज ऐसे गुरु थे जिनके व्यक्तित्व का प्रकाश चारों दिशाओं में फैलता था। गुरु स्वयं भौतिक दृष्टि से कुछ नहीं रखते, फिर भी अपने ज्ञान, तप और आशीर्वाद से सभी का जीवन समृद्ध कर देते हैं। गुरु विश्वास का अथाह सागर होते हैं। गुरु का ज्ञान न नापा जा सकता है और न तौला जा सकता है। सच्चा मुनि वही है जो पापों से मौन होकर मोह का विनाश करते हुए मोक्ष की अभिलाषा रखता है। ऐसे गुरु ही अपने शिष्यों को भी ज्ञान का सागर बना देते हैं।
मुनि श्री प्रभात सागर महाराज ने कहा कि आज केवल पूर्णिमा नहीं, बल्कि गुरु पूर्णिमा का महापर्व है। सावन मास के प्रथम दिवस वीर शासन जयंती का भी विशेष महत्व है। मुकेश जैन ढाना ने बताया कि सिद्धचक्र महामंडल विधान का समापन अंतिम दिन हवन के साथ संपन्न हुआ। 30 जुलाई को भाग्योदय तीर्थ में वीर शासन जयंती मनाई जाएगी तथा 9 अगस्त को दोपहर 1 बजे से कलश स्थापना का कार्यक्रम आयोजित किया गया है।