आलेख
अजय बोकिल
राजनीतिक दल भी अपने पक्ष में वोट डलवाने के लिए पूरी कोशिश करते हैं, क्योंकि वोटों की संख्या ही सियासी रण में विजेता का फैसला करती है। लेकिन इस बार वोटर ही बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं दिख रहा है, इसके पीछे जो कारण गिनाए जा रहे हैं, उन्हें राजनीतिक मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री और चुनावी रणनीतिकार भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।
लोकसभा चुनाव के लगातार दूसरे चरण में भी मतदान प्रतिशत घटने से राजनीतिक दलों का आत्मविश्वास डगमगाने लगा है। पार्टियों को अब ऐसे ‘क्लिक’ करने वाले मुद्दे की तलाश है, जो वोटर को पोलिंग बूथ तक खींच कर ला सके। कम होते वोटिंग के साथ-साथ मुद्दों की शिफ्टिंग भी साफ तौर पर परिलक्षित होने लगी है। विकास और कुछ बड़ा करने के दावे अब हाशिए हैं।
हकीकत में राजनेता अब मतदाता को रिझाने की जगह उसे डराने के खतरनाक खेल पर उतर आए हैं। कहीं मतदाता को आरक्षण खत्म करने और संविधान बदल डालने के नाम पर डराया जा रहा है तो कहीं महिला मतदाता से सम्पत्ति के समान वितरण के नाम पर महिला मतदाताओं से मंगल-सूत्र तक छीन लेने और हिंदुओं की आय को मुसलमानों में बांट देने की बात कही जा रही है। इसकी व्यावहारिकता और सच्चाई पर कोई नहीं जा रहा है।
चुनाव के कुरूक्षेत्र में भिड़ी दोनो राजनीतिक गठबंधनों की सेनाएं अब अपना- अपना वोट बैंक किसी भी कीमत पर बचाने में लगी हैं। लेकिन मतदाता राजनेताओं और राजनीतिक दलों की इस ड्रामेबाजी से मन ही मन खिन्न नजर आता है, शायद यही कारण है कि प्रलोभनो की बारिश और भयादोहन की पराकाष्ठा के बीच वह घर बैठना ही ज्यादा बेहतर समझ रहा है। भाव यह है कि किसी को भी वोट देने से फायदा क्या? हमाम में सभी निर्लज्ज और झूठे हैं।
यूं हर चुनाव में मतदान प्रतिशत की घट-बढ़ नई बात नहीं है और वोटों की यह कमी बेशी कभी सत्ता की वापसी तो कभी बेदखली के रूप में सामने आती है। वोट प्रतिशत के घटने बढ़ने का हार जीत से कोई सीधा रिश्ता नहीं है। यहां ऊंट किसी भी करवट बैठ सकता है। हालांकि चुनाव आयोग भी लोकतंत्र के इस महापर्व में मतदाता की ज्यादा से ज्यादा भागीदारी को लेकर कई तरह से कोशिश करता है ताकि चुनाव नतीजों की साख अधिकाधिक बढ़े।

राजनीतिक दल भी अपने पक्ष में वोट डलवाने के लिए पूरी कोशिश करते हैं, क्योंकि वोटों की संख्या ही सियासी रण में विजेता का फैसला करती है। लेकिन इस बार वोटर ही बहुत ज्यादा उत्साहित नहीं दिख रहा है, इसके पीछे जो कारण गिनाए जा रहे हैं, उन्हें राजनीतिक मनोविज्ञानी, समाजशास्त्री और चुनावी रणनीतिकार भी समझने की कोशिश कर रहे हैं।
इधर कुछ तर्क सामने भी आए हैं जिनमें गर्मी ज्यादा होने, एक वर्ग द्वारा मतदान दिवस की छुट्टी को पिकनिक डे के रूप में मनाने, भाजपा शासित ज्यादातर राज्यों में चुनावी माहौल एकतरफा होने का नरेटिव बनने, नई सरकार बनाने या बदलने के प्रति मतदाता के अप्रतिबद्ध होने, भाजपा नेताओं द्वारा चुनाव के पहले ही 4 सौ पार का नारा देकर चुनाव नतीजों की प्री सेटिंग करने से भाजपा के वोटर द्वारा चैन की नींद सोने, विपक्ष के एकजुट होने के बाद भी नेतृत्वविहीन होने तथा सत्ता परिवर्तन के लिए ऐसा कोई आंतरिक बल या प्रेरणा का अभाव जो मतदाता को पोलिंग बूथ तक जाने के लिए विवश करे आदि शामिल है।

दरअसल, इस लोकसभा चुनाव के पहले राजनेताओं ने जिस तरह गर्वोक्तियां की थी, उससे लग रहा था कि इस बार मतदान के दौरान कोई सुनामी आने वाली है, जो या तो मोदी सरकार के पक्ष में होगी या फिर उसके विरोध में। लेकिन मतदान के जो आंकड़े आ रहे हैं, उससे सुनामी तो क्या बरसाती नदी की मौसमी बाढ़ का भी अहसास नहीं हो रहा। हालत यह है कि 2019 के लोकसभा चुनाव की तुलना में पहले चरण में 102 सीटों पर हुए मतदान में औसतन 4.4 फीसदी की गिरावट आई तो दूसरे चरण में यह कमी और बढ़कर 7 फीसदी तक जा पहुंची।

बावजूद इसके कि मप्र में केन्द्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्य के मंत्रियों को साफ चेतावनी दे दी थी कि वोटिंग घटा तो उनकी कुर्सी भी जाएगी। इसका भी वोटरो पर कोई असर नहीं हुआ, अब मप्र में किस किस मंत्री की कुर्सी जाएगी, लोग इस पर चर्चा में ज्यादा रस ले रहे हैं बजाए इसके कि वोटिंग कैसे बढ़े। हालांकि मतदान के पांच चरण अभी बाकी हैं, लेकिन अगर वोटिंग ट्रेंड नहीं बदला तो सियासी दलों के चुनावी गणित गड़बड़ा सकते हैं।
मतदाता जो भी सोच रहा हो, राजनीतिक दलों ने इस उदासीनता को तोड़ने के लिए वोटर को रिझाने, मनाने की बजाए डराने के नुस्खे पर काम शुरू कर दिया है। इसकी शुरूआत पहले विपक्ष की तरफ से हुई। कहा गया कि भाजपा और एनडीए को 4 सौ पार का बहुमत इसलिए चाहिए कि देश के संविधान को बदला जा सके। हालांकि कोई यह बताने की स्थिति में नहीं है कि संविधान बदलने का निश्चित अर्थ और विषयवस्तु क्या है। संविधान में संशोधन का प्रावधान पहले ही से है।
संविधान के मूल ढांचे में बदलाव नहीं किया जा सकता, यह कोर्ट का फैसला है। अगर भाजपा इसे बदलना भी चाहे तो क्या बदलेगी? दबी जबान से यह बात फैलाई जा रही है कि संविधान नए सिरे से लिखा जाने वाला है, जो मनुस्मृति पर आधारित होगा। लेकिन जब यह देश ईवीएम से बैलेट पेपर पर वापस जाने के लिए तैयार नहीं है तब संविधान को ढाई हजार साल पुरानी मनुस्मृति के आधार पर पुनर्लेखन की बात महज सियासी शोशेबाजी है। दूसरा डर है आरक्षण खत्म करने का। भाजपा भारी बहुमत में आएगी तो आरक्षण का खत्म होगा।
खासकर दलितो और आदिवासियों का। यह भी देश के लोकतांत्रिक तकाजों और विवशताअों के चलते असंभव है। इसके पहले विपक्षी दल अल्पसंख्यकों और खासकर मुसलमानो को सीएए और एनआरसी पर डराते आ ही रहे हैं। जबकि सीएए तो नागरिकता छीनने का नहीं, देने का कानून है। मकसद यही कि किसी तरह वोटों की गोलबंदी मजबूती से हो।
दूसरी तरफ विकास और देश को विश्वगुरू बनाने के दावे अब आर्थिक न्याय-अन्याय के बीहड़ों में छटपटाते नजर आ रहे हैं। इसकी शुरूआत तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ही की। उन्होंने कांग्रेस घोषणा पत्र में आर्थिक समानता के वादे को उलटाते हुए मतदाताओं और खासकर हिंदू मतदाताओं को डराया कि कांग्रेस सभी का आर्थिक सर्वेक्षण कराके तमाम हिंदुओं की सम्पत्ति हड़प कर मुसलमानों में बांट देगी।
क्या यह संभव है? जब 600 साल के मुस्लिम शासन में यह मुमकिन न हो सका तो कांग्रेस जो खुद ही अपने अस्तित्व के लिए जूझ रही है, 80 फीसदी हिंदुओं की सम्पत्ति छीनकर मुसलमानों को बांटने का क्या खाकर दुस्साहस करेगी और क्या हिंदू ऐसा होने देंगे? प्रधानमंत्री ने इस सम्पत्ति के बंटवारे में मंगलसूत्र का इमोशनल धागा भी पिरोया कि कांग्रेस पावर में आई तो सधवाओं के मंगलसूत्र भी छिन जाएंगे।
हिंदू विवाहित महिलाओं द्वारा सुहाग के प्रतीक मंगल सूत्र पहनने की प्रथा देश में मुख्य रूप से महाराष्ट्र और कर्नाटक में है। गुजरात में भी हो सकती है, लेकिन देश के बाकी हिस्सो में विवाहित महिलाए आमतौर सोने की चेन, जिसमें पेंडेंट लटका होता है ही पहनती हैंं, इसलिए मंगलसूत्र बचाने की अपील कितनी कारगर होगी, कहना मुश्किल है। इसी तरह मामला ‘विरासत कर’ का भी है।
अमेरिका के कुछ राज्यों में प्रचलित विरासत कर ( इनहेरिटेंस टैक्स) भारत में लागू करने का सुझाव अमेरिका में रह रहे कांग्रेस नेता सैम पित्रोदा ने दिया था। जबकि कांग्रेस ने इससे खुद को अलग कर लिया है। लेकिन भाजपा इस सुझाव को भी कांग्रेस के ‘संकल्प के रूप में पेंट कर रही है। इस देश में लोग अमूमन सामान्य कर भी देने में आनाकानी करते हैं, वो विरासत कर जैसा काल्पनिक कर देने की उदारता क्योंकर दिखलाएंगे?
जाहिर है कि चुनाव प्रचार अब जमीनी मुद्दों के बजाए हवाई मिसाइल अटैक पर ज्यादा फोकस होता जा रहा है। ये ऐसी बातें हैं, जिनका आम मतदाता की जिंदगी और आकांक्षाओं से खास सम्बन्ध नहीं है। भाजपा यह जताने की कोशिश कर रही है कि कांग्रेस का राज मतलब मुसलमानों की हुकुमशाही तो भाजपा को फिर से सत्ता सौंपने का अर्थ हिंदुओं की तानाशाही है। यानी पूरा नरेटिव अर्ध सत्य पर चल रहा है। अगर तीसरे चरण में भी मतदान का औसत नहीं सुधरा तो हमे सियासत के और घटिया तथा भ्रामक नमूने देखने को मिल सकते हैं। जो सत्ता की रस्साकशी में जो हो रहा है, वह कम से कम लोकतंत्र के लिए स्वास्थ्यप्रद कतई नहीं है। आगे आगे देखिए, होता है क्या?

–लेखक मप्र के ख्यात वरिष्ठ पत्रकार हें।