उत्तम मार्दव धर्म ,दशलक्षण पर्व का दूसरा दिन
सागर । भाग्योदय तीर्थ सागर में विराजमान मुनि श्री श्री चंद्र सागर महाराज ने दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन उत्तम मार्दव धर्म पर कहा कि मार्दव का अर्थ है मृदुता, कोमलता और विनम्रता। जहां झुकना आता है, वहां जीवन में सब कुछ प्राप्त किया जा सकता है, जबकि अहंकार और अकड़ व्यक्ति के पास सब कुछ होते हुए भी उसे खाली कर देती है।
उन्होंने कहा कि विनय ही मोक्ष का द्वार है। मनुष्य को अपने ज्ञान, जाति, धन-संपत्ति, बल, शरीर और प्रतिष्ठा का अहंकार छोड़कर आत्मा के वास्तविक स्वरूप को पहचानना चाहिए। जब तक अहंकार नहीं छूटेगा, तब तक आत्मिक उन्नति संभव नहीं है। दूध मंथन के बाद नवनीत का रूप लेकर कोमल और चिकना हो जाता है, उसी प्रकार साधना और आत्मचिंतन से मनुष्य के भीतर की कठोरता समाप्त होकर मृदुता उत्पन्न होती है। सच्चा सम्मान व्यक्ति का नहीं, बल्कि उसके गुणों का होता है।
वहीं मुनि श्री गरिष्ठसागर महाराज ने कहा कि धर्म वस्तु का स्वभाव है। हमारे भीतर विद्यमान कोमलता, नम्रता और शांति ही मार्दव धर्म का स्वरूप है। मनुष्य के भीतर बैठा अहंकार उसे झुकने नहीं देता। ज्ञान, जाति, पूजा, बल, धन-संपत्ति और शरीर का मद मनुष्य में अहंकार पैदा करता है। इसलिए इन मदों का त्याग आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि हिंसा, झूठ, चोरी और कुशील आदि पापों से दूर रहकर तथा अहंकार का त्याग करके ही आत्मा को निर्मल बनाया जा सकता है।