विशेष रिपोर्ट: जब रक्षक ही भक्षक बने: वित्तीय अनियमितता के आरोपियों को प्रभार और दूरियों के जाल में उलझता ग्रामीण विकास
मनोज बैरागी सरदारपुर धार
ग्रामीण विकास की रीढ़ मानी जाने वाली ग्राम पंचायतों में इन दिनों सुशासन के दावों की धज्जियाँ उड़ती दिख रही हैं। एक ओर सरकार पारदर्शी प्रशासन और भ्रष्टाचार मुक्त व्यवस्था का वादा करती है, वहीं दूसरी ओर पंचायतों के धरातल पर ऐसे फैसले लिए जा रहे हैं जो सीधे तौर पर वित्तीय निष्ठा पर सवालिया निशान खड़े करते हैं।
वित्तीय धांधली और घोटालों के आरोपों में घिरे सचिवों को पुनः पंचायतों का वित्तीय प्रभार सौंपना और एक ही सचिव के कंधे पर 30 किलोमीटर से अधिक दूरी पर स्थित दो-दो पंचायतों की जिम्मेदारी लादना प्रशासनिक अदूरदर्शिता का जीता-जागता उदाहरण है।
1. दागियों के हाथ में ‘तिजोरी की चाबी‘
कितना सही, कितना गलत?
जिन सचिवों पर पूर्व में वित्तीय गड़बड़ियों, गबन या अनियमितता के गंभीर प्रकरण दर्ज हैं, उन्हें पुनः वित्तीय अधिकार सौंपना मानो दूध की रखवाली बिल्ली को सौंपनेजैसा है।
जाँच प्रभावित होने का खतरा: जब आरोपी पद पर और विशेषकर वित्तीय प्रभार में बना रहता है, तो वह अपने खिलाफ चल रही जाँच, साक्ष्यों और रिकॉर्ड्स को प्रभावित करने की स्थिति में आ जाता है।
भ्रष्टाचार की पुनरावृत्ति
कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई के बजाय पुनः वित्तीय प्रभार देना गलत प्रवृत्तियों को बढ़ावा देता है, जिससे शासकीय धन के दुरुपयोग की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।
जनता के विश्वास पर चोट
ग्रामीण जनता जब देखती है कि धांधली के आरोपी ही दोबारा बजट का आवंटन और नियंत्रण कर रहे हैं, तो उनका पूरी प्रशासनिक व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है।
2. 30 किलोमीटर का फासला,प्रशासनिक सुस्ती और जनता की फजीहत
एक सचिव को दो पंचायतों का प्रभार देना प्रशासनिक विवशता हो सकती है, लेकिन यदि दोनों पंचायतों के बीच की दूरी 30 किलोमीटर या उससे अधिक हो, तो यह व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है।
निगरानी और निरीक्षण का अभाव
30 किलोमीटर की दूरी तय करने में ही सचिव का अधिकांश समय और ऊर्जा खर्च हो जाती है। इसके परिणामस्वरूप सचिव किसी भी पंचायत में पर्याप्त समय नहीं दे पाता और दैनिक प्रशासनिक कार्य ठप पड़ जाते हैं।
ग्रामीणों को परेशानी
प्रमाण-पत्र बनवाने, योजनाओं की जानकारी लेने या अपनी समस्या सुनाने आने वाले ग्रामीणों को अक्सर सचिव के अनुपस्थित मिलने पर निराश लौटना पड़ता है।
योजनाओं में देरी
समय पर फाइलें और स्वीकृतियाँ न मिलने के कारण केंद्र और राज्य सरकार की जनकल्याणकारी योजनाएं समय सीमा में पूरी नहीं हो पातीं।
3. कटमनी, फर्जी बिल और दूरस्थ वेंडरों की आड़ में ‘कमीशनखोरी का खेल’
दूरस्थ पंचायतों का प्रभार होने और प्रभावी निगरानी न रहने का सबसे बड़ा नुकसान फर्जी बिलों के भुगतान और मनमाने वेंडर चयन के रूप में सामने आता है।
सेटिंग, कटमनी और नगद वापसी: पंचायत सचिव और सरपंच की मिलीभगत से विशेष (पसंदीदा) फर्मों/वेंडरों को भुगतान किया जाता है और उसके बदले नगद राशि (कटमनी) वापस ली जाती है।
स्थानीय दुकानों की अनदेखी और भ्रष्टाचार का नया मॉडल: जब पंचायत के 10 किलोमीटर के दायरे में गुणवत्तापूर्ण भवन निर्माण सामग्री (सीमेंट, गिट्टी, बालू आदि) की दुकानें उपलब्ध हैं, तो फिर 30 से 40 किलोमीटर दूर स्थित दुकानों से सामग्री की खरीदी क्यों की जा रही है? *अतिरिक्त वित्तीय भार और स्थानीय नुकसान:* जब सामग्री की गुणवत्ता, मात्रा और शासकीय दरें समान हैं, तब भी दूरस्थ वेंडरों से खरीदी केवल कमीशन सेट करने के लिए की जाती है। इससे भाड़े (ट्रांसपोर्टेशन) का बेवजह अतिरिक्त शासकीय भार पड़ता है और स्थानीय व्यापारियों व रोजगार का भारी नुकसान होता है।
बिना भौतिक सत्यापन भुगतान
दूर बैठकर कागजी बिलिंग के आधार पर बिना धरातलीय जांच के भुगतान पास कर दिए जाते हैं, जिससे शासकीय बजट सीधे तौर पर ठिकाने लगा दिया जाता है।निष्कर्ष और सुधार की आवश्यकता: ईमानदार नेतृत्व ही बचा सकता है व्यवस्था
पंचायती राज व्यवस्था का मूल उद्देश्य सत्ता और सुविधाओं का विकेंद्रीकरण कर अंतिम व्यक्ति तक विकास पहुँचाना था। लेकिन यदि वित्तीय अनियमितता के आरोपियों को प्रभार मिलता रहेगा और दूरियों के नाम पर निगरानी को ठप रखा जाएगा, तो विकास केवल फाइलों तक सीमित रहेगा।
उम्मीद की किरण
ईमानदार सीईओ की कार्यशैली जहाँ एक ओर निचले स्तर पर भ्रष्टाचार की जड़ें गहरी हैं, वहीं मुख्य कार्यपालन अधिकारी (सीईओ) जैसे ईमानदार, निष्ठावान और पारदर्शी अधिकारियों की मौजूदगी से व्यवस्था में सुधार की उम्मीद जगती है। उनके द्वारा किए जा रहे कठोर निरीक्षण, नियमों का कड़ाई से पालन और भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति का ही नतीजा है कि कई जगहों पर फर्जीवाड़ा पकड़ा जा रहा है। ऐसे कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों के उत्कृष्ट आचरण और बेहतरीन कार्यशैली की जितनी प्रशंसा की जाए कम है।
शासन से अपेक्षाएं:
वित्तीय आरोपों से घिरे कर्मचारियों को जाँच पूरी होने तक किसी भी स्थिति में वित्तीय प्रभार न सौंपा जाए।
10 किमी दायरे में सामग्री उपलब्ध होने पर दूरस्थ वेंडरों से खरीदी पर तुरंत रोक लगाई जाए और स्थानीय खरीदी को प्राथमिकता दी जाए।
भुगतान से पहले सामग्री और निर्माण कार्य के अनिवार्य एवं सख्त भौतिक सत्यापन की व्यवस्था लागू की जाए।