सागर।आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के शिष्य एवं आचार्य श्री समय सागर महाराज के आज्ञानुवर्ती निर्यापक मुनि श्री अभयसागर महाराज ससंघ के सागर आगमन पर गुरुवार को शहर में भव्य एवं ऐतिहासिक अगवानी यात्रा निकाली गई। महावीर नगर, गल्ला मंडी चौराहे से प्रारंभ हुई इस अगवानी में बड़ी संख्या में श्रद्धालु, महिला मंडल, युवा एवं सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि शामिल हुए।
प्रातः 7 बजे मुनिसंघ खुरई रोड स्थित कृषि उपज मंडी चौराहे पर पहुंचा जहां भाग्योदय तीर्थ से मुनि श्री उद्यम सागर महाराज,मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज एवं मुनि श्री हीरक सागर महाराज ससंघ ने अगवानी की।मुनि श्री अभय सागर महाराज,मुनि श्री शाश्वतसागर महाराज, मुनि श्री नमीसागर महाराज ने भी छोटे मुनिराजो ने 3 परिक्रमाएं कर पुण्य लाभ अर्जित किया।अगवानी यात्रा में सागर शहर के एक दर्जन से अधिक महिला मंडलों की सदस्याएं, विभिन्न सामाजिक एवं धार्मिक संगठनों के पदाधिकारी, भाग्योदय तीर्थ एवं सर्वतोभद्र जिनालय के ट्रस्टी, सकल दिगंबर जैन समाज तथा शहर के सभी जैन मंदिरों के पदाधिकारी एवं सदस्य बड़ी संख्या में उपस्थित रहे।
मार्ग में अनेक स्थानों पर श्रद्धालुओं द्वारा मुनिसंघ का पाद प्रक्षालन, आरती एवं पुष्पवर्षा कर स्वागत किया गया। संपूर्ण मार्ग को आकर्षक रंगोलियों और गेट लगाकर सजाया गया,जबकि सैकड़ों युवा हाथों में धर्मध्वज लेकर जयघोष करते हुए मुनिसंघ के साथ चल रहे थे। भक्ति, श्रद्धा और उत्साह से परिपूर्ण यह अगवानी यात्रा पूरे शहर के लिए आस्था का अनुपम दृश्य बन गई। प्रातः लगभग 9 बजे मुनिसंघ मुख्य पंडाल में पहुंचा, जहां सैकड़ों श्रद्धालुओं ने ‘नमोस्तु-नमोस्तु’ के जयघोष के साथ दर्शन एवं वंदना कर आशीर्वाद प्राप्त किया। इस अवसर पर पाद प्रक्षालन का सौभाग्य महेश, संतोष बिलहरा एवं तहसीलदार मोहित जैन को प्राप्त हुआ।
बीना से बिहार कर रहे युवाओं का सम्मान आचार्य श्री का चित्र देकर किया गया। अपराजित योद्धा संघ सागर के अलावा रहली,बंडा चंदेरी,बीना, मुंगावली, खुरई आदि स्थानों के श्रद्धालुओं ने शामिल होकर पुण्य लाभ अर्जित किया
कार्यक्रम का संचालन ब्रह्मचारी विजय भैया लखनादौन, मुकेश जैन ढाना एवं अनिल नैनधरा ने किया।
अष्टानिका महापर्व पर भाग्योदय तीर्थ में चल रहे श्री सिद्धचक्र विधान के तीसरे दिन श्रद्धालुओं द्वारा 16 अर्घ समर्पित किए गए। विधान के चौथे दिन शुक्रवार को 32 अर्घ चढ़ाए जाएंगे। श्रद्धालुओं में विधान को लेकर विशेष उत्साह एवं श्रद्धा का वातावरण बना हुआ है।

निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज ने कहा कि उनका विहार चंदेरी से प्रारंभ हुआ और आचार्य श्री समय सागर महाराज के आशीर्वाद से सागर को चातुर्मास का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। उन्होंने कहा कि चातुर्मास के लिए अनेक स्थानों पर समाजों ने भरपूर प्रयास किए, किंतु सागर समाज का समर्पण और पुरुषार्थ अधिक प्रभावी रहा। दीक्षा के बाद उनका पहला चातुर्मास भी भाग्योदय तीर्थ में हुआ था। उन्होंने कहा कि वे सदैव आचार्य भगवान की प्रत्येक आज्ञा का पालन करते आए हैं और आगे भी उसी परंपरा का निर्वहन करेंगे।
मुनिश्री ने कहा कि आचार्य श्री की आज्ञा से वे भाग्योदय प्रांगण में चातुर्मास करते हुए धर्म साधना और प्रवचनों के माध्यम से लोगों के जीवन में आध्यात्मिक चेतना का संचार करने का प्रयास करेंगे। चातुर्मास के दौरान प्रतिदिन तीनों समय धर्म-ध्यान कराया जाएगा। उन्होंने स्पष्ट कहा कि यहां केवल धर्म चर्चा होगी, सांसारिक विषयों की चर्चा नहीं होगी।
उन्होंने आहारचर्या के संबंध में आचार्य श्री विद्यासागर महाराज का स्मरण करते हुए कहा कि गुरुदेव कहा करते थे, “जहां चौका लगेगा, वहीं हम पहुंचेंगे।” साधु-संघ घर-घर जाकर चौका में ही पढ़गाहन देंगे। उन्होंने श्रद्धालुओं को आहार के समय हाथकरघा से निर्मित वस्त्र धारण करने की सलाह दी।
आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के विराट योगदान का स्मरण करते हुए कहा कि गुरुदेव ने भाग्योदय की धरती पर जो आध्यात्मिक बीज बोए हैं, उनके परिणामस्वरूप अनेक पंचकल्याणक महोत्सव संपन्न हुए हैं और विश्व का एक अनूठा जैन तीर्थ आकार ले रहा है। उन्होंने कामना व्यक्त की कि गुरुदेव के आशीर्वाद से मंदिर का निर्माण शीघ्र पूर्ण हो। उन्होंने कहा कि समाज का सामूहिक पुरुषार्थ तभी सार्थक होगा।
मुनिश्री ने भाग्योदय तीर्थ के नामकरण का प्रसंग भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जब इस स्थान का नाम निर्धारित किया जा रहा था, तब वे आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के समीप बैठे थे। एक नाम लिखे जाने के बाद आचार्य श्री ने स्वयं इसका नाम “भाग्योदय तीर्थ” रखने का निर्देश दिया था। साथ ही उन्होंने यहां अस्पताल सहित विभिन्न लोककल्याणकारी योजनाओं की भी प्रेरणा दी थी। मुनि श्री प्रभात सागर महाराज ने भी अपने उद्बोधन में कहा कि अब भाग्योदय तीर्थ में धर्म आराधना की गंगा बहने वाली है जिसको जितना लाभ लेना है वह आकर के ले सकता है
इस अवसर पर मुनि श्री उद्यम सागर महाराज ने भी अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा, “बड़ा बनना बहुत कठिन है। निर्यापक महाराज के चरणों में आ गया हूं, आज से स्वयं को बहुत हल्का अनुभव कर रहा हूं। “मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज ने भी अपनी बात रखी।