सागर। भाग्योदय तीर्थ में आयोजित सिद्धचक्र महामंडल विधान के चौथे दिन मुनिश्री प्रभात सागर महाराज एवं मुनिश्री चंद्र सागर महाराज ने श्रद्धालुओं को वैयावृत्ति, त्याग, गुरु भक्ति और एकता का संदेश दिया।
मुनिश्री प्रभात सागर महाराज ने कहा कि सभी मुनिराजों को रसोई में ही आहार कराना चाहिए तथा रसोई परिवर्तन से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि भोजन को बार-बार गर्म करना स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है, इसलिए ऐसी व्यवस्था हो कि भोजन ताजा और गर्म ही रहे। उन्होंने बताया कि मुनिराजों को आहार कराना वैयावृत्ति है और इससे तीर्थंकर भक्ति का भी पुण्य बंध होता है। उन्होंने कहा कि सिद्धचक्र महामंडल विधान के माध्यम से श्रद्धालुओं ने 64 ऋद्धियों की आराधना की है। त्याग का महत्व बताते हुए कहा कि त्याग करने वाले को ही वास्तविक प्राप्ति होती है। महापुरुष अधिक सुनते हैं और कम बोलते हैं, इसलिए गुरु और भगवान के प्रति सदैव श्रद्धा, प्रसन्नता और समर्पण का भाव रखना चाहिए।
मुनिश्री चंद्र सागर महाराज ने कहा कि आचार्य श्री का प्रभाव इतना व्यापक था कि जहां उनका सान्निध्य होता था, वहां स्वतः ही जनसमूह उमड़ पड़ता था। उन्होंने भाग्योदय तीर्थ के निर्माण एवं विकास में डॉ. अमरनाथ जैन के योगदान की सराहना करते हुए कहा कि आज यह अस्पताल सागर की धरोहर बन चुका है। उन्होंने कहा कि आचार्य श्री के प्रेरणा से अनेक लोगों ने अंडा, मांस, मछली और शराब का त्याग किया। श्रद्धालुओं से आह्वान करते हुए उन्होंने कहा कि गुरु के बताए मार्ग पर चलें, एकता बनाए रखें और अपने भीतर ऐसी शक्ति विकसित करें, जिससे समाज सदैव संगठित रहे।