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साँची विवि और दक्षिण कोरिया के डोंगगुक विश्वविद्यालय में एम.ओ.यू

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• कोरियाई प्रो. ह्वांग सूनील का विशेष व्याख्यान

•   लगातार खुश रहने का बुद्ध का तरीका सिखाया
• मंगोलियाई विद्वान का विपस्सना पर विशेष व्याख्यान
• मंगोलिया में लोकप्रिय है भारतीय विपस्सना

सांची रायसेन।  सांची बौद्ध भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में दक्षिण कोरिया और मंगोलिया के दो विद्वानों के विशेष व्याख्यान आयोजित किए गए। कोरिया के डोंगगुग विश्वविद्यालय के साथ सांची विश्वविद्यालय ने अकादमिक एमओयू भी किया। गहन शोध को बढ़ावा देने के उद्देश्य से दोनों संस्थाओं ने एक दूसरे से हाथ मिलाया हैं। विश्वविद्यालय परिसर में आज कोरिया के डोंगगुक विश्वविद्यालय के बौद्ध अध्ययन विभाग के डीन प्रो. ह्वांग सूनील और सांची विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक डॉ. हरीश चंद्रवंशी ने एम.ओ.यू पर हस्ताक्षर किए।


एम.ओ.यू के दौरान विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. वैद्यनाथ लाभ और डोंगगुक विश्वविद्यालय के बुद्धिस्ट संस्थान के डायरेक्टर प्रो. चोनडोगॉक भी उपस्थित थे। इस अवसर पर प्रो. ह्वांग सूनील ने लगातार खुश(सुख) रहने पर बोलते हुए सूत्र दिया कि अपनी इच्छाओं को नियंत्रण में रखकर आसक्ति से बचा जा सकता है।


ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय का किस्सा सुनाते हुए उन्होंने बताया कि विश्वविद्यालय के अंदर आने-जाने के लिए उन्होंने एक महंगी साइकिल खरीदी थी जो कि दूसरे ही दिन चोरी हो गई। तब उन्होंने एक साधारण साइकिल खरीदी जो कभी नहीं चोरी हुई। उस साइकिल में उन्हें ताला भी नहीं लगाना पड़ता था।


प्रो. ह्वांग ने बताया कि थाइलैंड के लोग भी बुद्ध के इस विचार के कारण सुखी रहते हैं कि- जीवन में दूसरी सबसे बेहतर चीज़ से संतुष्ट हो जाइए, प्रसन्न रहेंगे। उन्होंने कहा कि वर्तमान में खुश रहें नहीं तो आप अपने बीते हुए दिनों और आने वाले भविष्य को लेकर दुखी ही रहेंगे।
कुलगुरू प्रो. लाभ ने कहा कि बुद्ध कहते थे कि अगर आपकी एक हज़ार इच्छाएं हैं तो आपको दुख भी एक हज़ार हैं और अगर आपकी 100 ख्वाहिशें हैं तो दुख भी 100 हैं लेकिन अगर आपकी एक ही ख्वाहिश है तो आपको दुख भी एक ही होगा। कोई ख्वाहिश नहीं तो कोई दुख नहीं। उन्होंने कहा कि अपने आप को इच्छाओं से दूर करने पर आप स्वयं को खुश रख सकेंगे।

सांची विश्वविद्यालय में आज मंगोलिया के विपस्सना रिसर्च सेंटर के श्री सीरेंदेव डोरलिंग ने भी विपस्सना पर विशेष व्याख्यान दिया। उन्होंने सभी से 10 मिनट के लिए विपस्सना मेडिटेशन भी कराया।
श्री डोरलिंग का कहना था कि हम शरीर को तो साफ करते हैं लेकिन अपने मन को साफ नहीं कर पाते। विपस्सना के ज़रिए मन साफ होता है। उन्होंने बताया कि बाह्य चीजों पर ध्यान केंद्रित करना बुद्ध ने अपने गुरु से सीखा लेकिन खुद के भीतर ध्यान केन्द्रित करने की कला बुद्ध ने स्वयं विकसित की थी जिसे वो खुद भी करते थे औऱ दूसरों को भी सिखाते थे। उन्होंने बताया कि कलिंग के युद्ध के बाद सम्राट अशोक ने भी अपने 7 साल के पौत्र से विपस्सना सीखी थी और अपने अंतर्मन को शांत किया था।
उन्होंने बताया कि मंगोलिया की जेलों में 2000 लोगों ने विपस्सना सीखने के बाद अपराध छोड़ दिया।
वहां के स्कूलों में भी विपस्सना सिखाई जाती  है जिससे बच्चे शांत और तीव्र बुद्धि वाले होते हैं। मंगोलिया के 45 हज़ार लोग विपस्सना सीख चुके हैं।

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