आचार्यश्री ने कहा गुरु ने मुझे गुरु समय दिया लघु बन्ने के लिये
दीक्षा ली जाती है दी नहीं जाती और पद दिया जाता है लिया नहीं जाता
सुरेन्द्र जैन धरसीवा
शुक्रवार को चन्द्रगिरि तीर्थ डोंगरगढ़ में ससंघ विराजमान संत शिरोमणि आचार्यश्री 108 विद्यासागरजी महामुनिराज का 56 वां दीक्षा दिवस भक्तिभाव के साथ मनाया गया जिसमें सांकरा सिलतरा सहित प्रदेश ही नहीं अपितु देशभर से बड़ी संख्या में जैन समाज के लोग शामिल हुए ।
आचार्यश्री ने अपने अनमोल वचनो में कहा कि स्मृति वर्तमान में होती है लेकिन उसका अनुभव नहीं होता है | आचार्य कुंदकुंद ने बताया कि दीक्षा के दिन को याद करने से क्या होता है | दीक्षा के दिन को याद नहीं करना किन्तु दीक्षा क्यों धारण किया है उसको याद रखने को कहा है | आप लोग घरों में प्रवेश करते हैं जब कहीं जाते हैं तो लौटकर वापस घर ही आते हैं | किन्तु दीक्षा होने के उपरांत लौटने कि बात नहीं होती है | यदि लौटना ही है तो फिर जाना नहीं चाहिये | इस रहस्य को जो समझ गया वह कभी लौटने कि बात नहीं करता वह सिर्फ आगे बढ़ते जाता है और जो दीक्षा उपरांत छोटे घर से निकल कर बड़े घर में रह रहा है उसे यह रहस्य अभी भी समझ में नहीं आया है।
दीक्षा ली जाती है दी नहीं जाती
आचार्यश्री ने कहा कि दीक्षा ली जाती है दी नहीं जाती और पद दिया जाता है लिया नहीं जाता | जब दीक्षा लेते हैं तो गुरु का आशीर्वाद भी रहता है | यथायोग्य दीक्षा के उपरांत नियमों का पालन आदि रुचिपूर्वक एवं श्रद्धान के साथ करते हैं | स्मृति का हमें अनुभव नहीं हो सकता, वर्तमान में प्रत्यक्ष होता है वही अनुभव में आता है | संसार सब कुछ दिख रहा है लेकिन देखने वाला नहीं दिखता | गुरु ने मुझे गुरु समय दिया लघु बन्ने के लिये | पहले मुनि महाराज जंगलों में रहते थे वहाँ उन्हें जिन बिम्ब का दर्शन नहीं होता था तो वे परोक्ष में ही बिम्ब का दर्शन कर लेते थे | गुरु ने पद दिया है निर्वाह करना है जब तक चल रहे है ठीक है जब खीचने लग जायें तो यहाँ पर खीचा – तानी नहीं होना चाहिये | यह बहुत बड़ा पद है जिसको लघु बनकरके शक्ति को विकसित किया है | जिस प्रकार रेल में चालक और गार्ड होता है | गार्ड जब हरी झंडी दिखाता है तभी चालक रेल को आगे बढाता है और जब गार्ड लाल झंडी दिखाता है तो चालक रेल को वही रोक लेता है | स्मृति का अर्थ शास्त्र होता है और उसका दूसरा अर्थ लिखा हुआ भी होता है | पहले फलक पर लिखा जाता था जिसे पढ़कर उसका पालन करते थे | भगवान से यही प्रार्थना है कि लघु से लघुतर, लघुतर से लघुतम बनु | यहाँ लघु से आशय छोटा है किन्तु उसका दूसरा अर्थ हल्का है | जैसे एक कढाई में घी को चुरोते हैं फिर उसमे कच्ची पूरी डालते हैं जब उसमे कच्ची पूरी डालते हैं तो वह निचे जाती है क्योंकि उसमे पानी का भार था और जब वह चुरने लगती है और आप लोग उसमे ऊपर से घी का अभिषेक करने लगते हो तो उसका सारा पानी निकल जाता है और वह हल्की – फुल्की होकर ऊपर आ जाती है | हल्की मतलब भार कम होना और फुल्की मतलब फूलना (अच्छा लगना) | इसी प्रकार हमें हल्का होना है पूरी कि भांति लेकिन उसके लिये हमें इस चुरनी को सहन करना पड़ेगा | गुरु जी ने आचार्य पद को त्याग कर दिया था क्योंकि मुनि बनकर ही सल्लेखना ले सकते हैं | मुनि दीक्षा का अंतिम लक्ष्य सल्लेखना ही होता है।

दीक्षा दिवस में सांकरा जैन समाज भी पहुची
शुक्रवार को आचार्य श्री विद्यासागर महाराज जी का 56 वा मुनि दीक्षा दिवस श्री दिगम्बर जैन अतिशय तीर्थ क्षेत्र में बड़ी धूम धाम के साथ मनाया गया | प्रातः भगवान का अभिषेक, शान्ति धारा, पूजा हुई फिर आचार्य श्री कि पूजा बहुत भक्ति भाव से अष्ट द्रव्य को बड़ी – बड़ी थाल में सजाकर कि गयी | तत्पश्चात आचार्य श्री का प्रवचन हुआ फिर आचार्य श्री के आहार के बाद भंडारा का आयोजन किया गया जिसमे सभी ग्रामीण एवं शहर के लोगो ने सम्मिलित होकर कार्यक्रम को सफल बनाया
सांकरा निको जैन समाज के आशीष जैन गीदम वाले, श्रीमती शशिप्रभा जैन,बबिता जैन,खुशी जैन ,संजय जैन मढ़ाबरा, कुमारी श्रुति जैन सांकरा श्रीमति मंजू जैन,खेमचंद जैन सहित बड़ी संख्या में सांकरा व आसपास के जैन समाज के लोग चन्द्रगिरि तीर्थ में इन दिनों आचार्यश्री के दर्शन पूजन का लाभ अर्जित कर रहे हैं।

राजस्थान में हुई दीक्षा ओर राजस्थानियों के चौके में आहार
जैन आचार्यश्री विद्यासागरजी के आहार जिनके चौके में हो जाते हैं वह महान पुण्यशाली होते हैं आचार्यश्री की दीक्षा 30 जून 1968 को राजस्थान में हुई थी आचार्यश्री ने अपने गुरु पूज्य ज्ञान सागर जी महामुनिराज जी से दीक्षा ग्रहण की थी 56 वे दीक्षा दिवस पर यह संयोग रहा कि आचार्यश्री को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य राजस्थान के श्री सुरेश कुमार रेखा जैन, सिद्धार्थ जैन, ब्रह्मचारिणीदीक्षा रीना दीदी बाबरिया परिवार रामगंज मंडी राजस्थान निवासी को प्राप्त हुआ।