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विक्रम विवि में 12 साल बाद सेवा में आए व्याख्याता तिवारी के बहाली का निर्णय कार्यपरिषद् ने किया अमान्य

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कुलसचिव ने जारी किया आदेश, तिवारी बोले – विवि प्रशासन और कार्यपरिषद् ने न्यायालय की अवमानना की

उज्जैन। विक्रम विश्वविद्यालय में 12 साल बाद पिछले वर्ष सेवा में आए भू-विज्ञान अध्ययनशाला के व्याख्याता पवनेंद्रनाथ तिवारी के निर्णय को कार्यपरिषद् ने अमान्य कर दिया है। जिसके बाद कुलसचिव डॉ. प्रशांत पुराणिक ने मई 2010 में जारी तिवारी के सेवा समाप्ति के आदेश के निर्णय को यथावत रखने का आदेश शुक्रवार देर शाम जारी किया है। इधर तिवारी का कहना है कि डॉ. पुराणिक को इस आदेश का निकालने का अधिकार ही नहीं है। साथ ही कार्यपरिषद् और विवि प्रशासन ने बहाली के निर्णय को अमान्य कर कोर्ट की अवमानना की है।

कुलसचिव डॉ. पुराणिक द्वारा शुक्रवार देर शाम जारी किए गए आदेश के अनुसार उच्च न्यायालय
इंदौर द्वारा रिट याचिका क्रमांक14200/2013 में पारित निर्णय दिनांक 3 अगस्त 2022 के पालन में प्रार्थी पवनेंद्रनाथ तिवारी द्वारा कुलपति को 8 अगस्त 2022 को प्रस्तुत अभ्यावेदन के परिप्रेक्ष्य में पुनः नियुक्ति संबंधी कुलपति कार्यालय के आदेश क्रमांक 195 दिनांक अगस्त 2022 12 विश्वविद्यालय कार्यपरिषद् की बैठक में 27 जनवरी 2023 के समक्ष विषय क्रमांक 11 के अंतर्गत विचारार्थ प्रस्तुत किया गया। जिस पर कार्यपरिषद् द्वारा यह निर्णय लिया गया कि विश्वविद्यालय मप्र अधिनियम 1973 के अनुसार अभ्यावेदन वैधानिक अभ्यावेदन में प्रस्तुत नहीं है। कुलपति कार्यालय के आदेश क्रमांक 195 विक्रम विश्वविद्यालय कार्यपरिषद् के निर्णय से पारित नहीं होने से मप्र विवि अधिनियम 1973, परिनियम 31 केअनुसार त्रुटिपूर्ण है, जो कार्यपरिषद् को मान्य नहीं है। अतः कार्यपरिषद् की 31 मार्च 2010 की बैठक के कार्य विवरण क्रमांक- 8 में पारित निर्णय और उक्त आधार पर कार्यपरिषद् की बैठक दिनांक 7 मई 2010 को पवनेंद्रनाथ तिवारी की सेवा समाप्ति का आदेश निर्णय यथावत मान्य है। विश्वविद्यालय के आदेश क्रमांक गोपनीय /2011/931-932 दिनांक 4 जून 2011 के अनुसार पवनेंद्रनाथ तिवारी की पीएचडी की उपाधि को रद्द कर वापस ले लिया गया है। ऐसी स्थिति में तिवारी की व्याख्याता पद की मूल अहर्ता भी समाप्त हो जाती है। तिवारी का 8 अगस्त 2022 का अभ्यावेदन अमान्य होने से 18 नवंबर 2022 का अभ्यावेदन भी अमान्य होकर स्वमेव समाप्त हो जाता है।

तिवारी बोले- पहले भी न्यायिक प्रक्रिया से न्याय मिला, अभी भी वैधानिक प्रक्रिया पर विश्वास

इधर इस मामले में पवनेंद्रनाथ तिवारी का कहना है कि मेरे विरुद्ध जारी आदेश पर कुलसचिव के रूप में डॉ. पुराणिक के हस्ताक्षर हैं, जिनकी प्रतिनियुक्ति 28 दिसंबर 2022 को ही उच्च शिक्षा विभाग ने राज्यपाल के आदेशानुसार समाप्त कर दी है। ऐसे में डॉ. पुराणिक किसी भी दस्तावेज पर हस्ताक्षर किस अधिकार से कर रहे हैं, यह जांच का विषय है। वर्तमान कार्यपरिषद् सदस्यों ने हर बार मेरे प्रकरण को आगामी बैठक में रख कर टालने का कार्य किया, जससे पूरा मामला साफ है कि वह मुझसे क्या चाहते थे। उच्च न्यायालय से ऊपर विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद् कैसे हो गई, ये अब न्यायालय का विषय है। कार्यपरिषद् का आदेश इस बात से भी हास्यापद है कि मेरी पीएचडी उपाधि को कुलसचिव ने ही उच्च न्यायालय के आदेश से यथावत करने का आदेश जारी किया है। तिवारी ने कहा मुझे वैधानिक प्रक्रिया और न्यायालय पर पूर्ण विश्वास है। पूर्व में भी मुझे न्यायिक प्रक्रियाओं से ही न्याय मिला था।

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