दमोह से धीरज जॉनसन की रिपोर्ट
आधुनिक समय में जीवन के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में परिवर्तन हुआ है जिसका प्रभाव भी स्पष्ट दिखाई देता है वक्त के साथ गतिशीलता आई और लोग त्वरित कार्य में विश्वास करने लगे। इस बदलाव का प्रभाव घर परिवार में भी दिखाई देता है।
आज के समय में गृहस्थी के समस्त कार्य और सामान रखने के स्थान और तकनीक तय है। मसाले मिक्सी में पीसे जाते है,तो अनाज चक्की से पिस कर आता है, रोटियां केसरोल में रखी जाती है और सामग्री के नाप तौल के तरीके बदल चुके है, पर प्राचीन काल में घरेलू कार्यों के तरीके बिलकुल भिन्न थे और वर्तमान पीढ़ी तो शायद इनके नाम भी भूलती जा रही है। ये सब सामान अभी भी घरों में पाए तो जाते है पर इनका उपयोग नहीं होता या बहुत कम मात्रा में होता है।
घर में काम आने वाली वस्तुओं को स्थानीय स्तर पर बुंदेली बोली में अलग अलग नामों से पहचाना जाता था। पूर्व के समय में अनाज पीसने के लिए हाथ की चक्की का उपयोग किया जाता था जिसे जांतो कहते थे और धान,धनिए,मिर्च पीसने के लिए मूसर का इस्तेमाल होता था।अनाज का नाप पैला (5 से 6 1/2 किलो तक) चोपल्ला (सवा से डेढ़ किलो तक) से होता था।अनाज मडुलिया में रखा जाता था और रोटियां मटेलनी में रखी जाती थी जो कागज को गला कर और सफेद मिट्टी (छुई) से बनती थी।छाछ निकालने के लिए परछिया तो आम काटने के लिए अमकटना ढूंढना पड़ता था।
कुछ इसी तरह की अन्य सामग्री भी हुआ करती थी जो समय के साथ-साथ विस्मृति के गर्त में समाती जा रही है लोगों का कहना था कि ये सामान अब उपयोग में नहीं आते,घर में भी अब इन्हें ढूंढना पड़ता है,कुछ तो अब मिलते ही नहीं है।