चूना और छुई मिट्टी का दौर हुआ खत्म, अब प्लास्टिक पेंट, ऑयल पेंट और वॉलपेपर का बढ़ा क्रेज
300 से 1000 रुपए लीटर तक बिक रहा ऑयल पेंट, मजदूरी बढ़ने से रंगाई-पुताई का खर्च भी बढ़ा
मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
दीपावली का त्योहार नजदीक आते ही घरों को सजाने-संवारने की तैयारियां तेज हो गई हैं। बाजारों में रंग, पेंट और सजावट से जुड़ी सामग्री खरीदने के लिए लोगों की भीड़ उमड़ने लगी है। हर कोई चाहता है कि दीपावली पर उसका घर नया और आकर्षक नजर आए, लेकिन इस बार महंगाई ने लोगों के इस शौक को महंगा कर दिया है। पेंट और रंग-रोगन की सामग्री के दाम बढ़ने के साथ ही मजदूरों की मजदूरी में भी इजाफा हुआ है। ऐसे में घर की रंगाई-पुताई कराने वालों को पहले की तुलना में अधिक रुपए खर्च करने पड़ रहे हैं।
एक समय था जब दीपावली से पहले गांवों में घरों की सफाई के बाद कच्चे मकानों पर छुई मिट्टी और पक्के मकानों पर चूने से पुताई कराई जाती थी। वहीं कुछ लोग डिस्टेंपर का इस्तेमाल करते थे। कम खर्च में घरों को नया रूप मिल जाता था। लेकिन समय के साथ लोगों की पसंद और मकानों की बनावट में बदलाव आया है। अब साधारण पुताई के बजाय लोग प्लास्टिक पेंट, ऑयल पेंट और अलग-अलग डिजाइन वाले वॉलपेपर को प्राथमिकता दे रहे हैं। मकानों की दीवारों को आकर्षक बनाने के लिए कई तरह के रंगों और डिजाइन का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसका सीधा असर लोगों की जेब पर पड़ रहा है।
300 से 1000 रुपए लीटर तक मिल रहा ऑयल पेंट
बाजार में इन दिनों ऑयल पेंट की कीमत 300 से लेकर 1000 रुपए लीटर तक पहुंच गई है। वहीं पांच लीटर डिस्टेंपर का डिब्बा 300 से 400 रुपए तक में मिल रहा है। इसके अलावा रंगाई-पुताई में इस्तेमाल होने वाली अन्य सामग्री के दाम भी लोगों का बजट बढ़ा रहे हैं। पहले जहां सीमित सामग्री से घरों की पुताई हो जाती थी, वहीं अब दीवारों की तैयारी, प्राइमर, पुट्टी और अलग-अलग तरह के पेंट पर भी खर्च करना पड़ रहा है। इसके साथ ही पुताई करने वाले कारीगरों की मजदूरी बढ़ने से कुल खर्च और अधिक हो गया है।

बैलगाड़ी से गांव-गांव बिकने आती थी छुई, अब खत्म हुआ कारोबार
दीपावली के पहले गांवों में छुई मिट्टी बेचने वालों का इंतजार रहता था। पहले व्यापारी बैलगाड़ियों में छुई मिट्टी भरकर गांवों और कस्बों में पहुंचते थे। ग्रामीण परिवार दीपावली की सफाई के बाद घरों की दीवारों और आंगन की पुताई के लिए छुई खरीदते थे। यह ग्रामीण जीवन की परंपरा का हिस्सा हुआ करती थी। लेकिन पक्के मकानों की संख्या बढ़ने और रंगाई-पुताई के नए विकल्प आने से छुई मिट्टी की मांग लगभग समाप्त हो गई है। अब यह पुराना कारोबार भी धीरे-धीरे खत्म होने की कगार पर पहुंच गया है।
ट्रैक्टर-ट्रॉली से आ रही छुई, फिर भी नहीं मिल रहे खरीदार
दीवानगंज, अंबाडी , सेमरा, नरखेड़ा, जमुनिया, निनोद के आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कुछ लोग ट्रैक्टर-ट्रॉली में छुई मिट्टी भरकर बेचने पहुंचते हैं, लेकिन अब पहले जैसी मांग नहीं रही। खरीदार नहीं मिलने के कारण छुई बेचने वालों की संख्या भी लगातार कम होती जा रही है। कुछ साल पहले तक दीपावली के दिनों में गांवों में छुई बेचने वालों की आवाजाही आम बात थी, लेकिन अब यह दृश्य भी धीरे-धीरे बीते समय की याद बनता जा रहा है।
वॉलपेपर की बढ़ी मांग, ऑनलाइन खरीदी से दुकानदार भी प्रभावित
बाजार में डिस्टेंपर के साथ प्लास्टिक पेंट और वॉलपेपर की मांग तेजी से बढ़ी है। खासकर दीवारों को आकर्षक डिजाइन देने के लिए लोग वॉलपेपर पसंद कर रहे हैं। व्यापारी बताते हैं कि वॉलपेपर की मांग में अचानक बढ़ोतरी हुई है। हालांकि कई लोग इसे ऑनलाइन भी खरीद रहे हैं, जिससे स्थानीय दुकानदारों के कारोबार पर असर पड़ रहा है। व्यापारियों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में मकानों की रंगाई-पुताई का तरीका पूरी तरह बदल गया है। अब लोग परंपरागत चूना और मिट्टी के बजाय आधुनिक पेंट और सजावटी सामग्री पर अधिक खर्च कर रहे हैं।
व्यापारियों का कहना है कि दीपावली के समय रंग-रोगन का कारोबार बढ़ जाता है, लेकिन बदलते ट्रेंड के कारण अब ग्राहकों को घर सजाने के लिए पहले से ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। मंटू खंडेलवाल, राशिद खान, गोपी नायक और मोनू ठाकुर सहित अन्य व्यापारियों के अनुसार, कुछ ही वर्षों में रंगाई-पुताई का चलन काफी बदल गया है। पहले कम खर्च में घरों की पुताई हो जाती थी, लेकिन अब आधुनिक पेंट और अन्य सामग्री के इस्तेमाल से खर्च लगातार बढ़ रहा है।
मजदूरी और अन्य सामग्री के खर्च ने बढ़ाया रंगाई-पुताई का बजट
दीपावली की तैयारियों के साथ बाजार में आधुनिक सजावट का चलन बढ़ रहा है, लेकिन इसके साथ ही गांवों की पुरानी छुई मिट्टी और चूने से घर सजाने की परंपरा भी इतिहास बनती जा रही है।