शैलचित्रों से बेखबर प्रशासन और पुरातत्व विभाग! नागौरी की पहाड़ी पर बिखरी हजारों साल पुरानी विरासत
देवेंद्र तिवारी सांची रायसेन
विश्व प्रसिद्ध सांची अपनी प्राचीन बौद्ध एवं पुरातात्विक विरासत के लिए दुनियाभर में पहचान रखता है। यहां ढाई हजार वर्ष पुराने स्मारकों से लेकर भगवान बुद्ध के परमशिष्य महामोद्गलायन और सारिपुत्र की पवित्र अस्थियों से जुड़ी ऐतिहासिक धरोहरें संरक्षित हैं। इन विरासतों के संरक्षण पर शासन द्वारा लगातार प्रयास किए जाते हैं, लेकिन सांची क्षेत्र में मौजूद कई अन्य पुरातात्विक महत्व के स्थलों की ओर अपेक्षित ध्यान नहीं पहुंचने की बात सामने आ रही है।
इसी कड़ी में नागौरी की पहाड़ी का उल्लेख किया जा रहा है, जहां बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच प्राचीन शैलचित्र मौजूद बताए जाते हैं। इन चट्टानों पर उकेरे गए चित्र इस क्षेत्र के प्राचीन मानव जीवन और तत्कालीन संस्कृति से जुड़े महत्वपूर्ण संकेत माने जाते हैं। स्थानीय स्तर पर इन शैलचित्रों और चट्टानों के संरक्षण को लेकर चिंता जताई जा रही है।

ग्रामीण निभा रहे विरासत की सुरक्षा की जिम्मेदारी
नागौरी की पहाड़ी के आसपास रहने वाले ग्रामीणों का कहना है कि इन चट्टानों और शैलचित्रों को उनके पूर्वजों की विरासत के रूप में देखा जाता रहा है। हजारों वर्ष पुरानी मानी जाने वाली इन आकृतियों को नुकसान न पहुंचे, इसके लिए स्थानीय लोग अपनी ओर से इनकी देखरेख करते हैं।
स्थानीय लोगों की भूमिका इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाती है क्योंकि प्राकृतिक परिस्थितियों के साथ-साथ मानवीय गतिविधियों से भी ऐसी पुरासंपदा को नुकसान पहुंचने की आशंका रहती है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि संबंधित विभाग इन स्थलों का सर्वेक्षण और वैज्ञानिक तरीके से संरक्षण करे तो यह क्षेत्र पुरातात्विक दृष्टि से और महत्वपूर्ण बन सकता है।
संरक्षण की दरकार
सांची की पहचान जहां संरक्षित बौद्ध स्मारकों और विश्व प्रसिद्ध पुरातात्विक धरोहरों के कारण अंतरराष्ट्रीय स्तर पर है, वहीं क्षेत्र में मौजूद अन्य प्राचीन धरोहरों की पहचान, दस्तावेजीकरण और संरक्षण भी जरूरी है।
स्थानीय लोगों की मांग है कि पुरातत्व विभाग नागौरी की पहाड़ी पर मौजूद शैलचित्रों का विशेषज्ञों से सर्वेक्षण, दस्तावेजीकरण और संरक्षण कराए। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जाए कि इन शैलचित्रों की ऐतिहासिक एवं पुरातात्विक महत्ता क्या है और इन्हें सुरक्षित रखने के लिए क्या कदम उठाए जा सकते हैं।
अब सवाल यह है कि नागौरी की पहाड़ी पर बिखरी इन प्राचीन चट्टानी कलाकृतियों की सुध संबंधित विभाग कब लेगा? क्या इन शैलचित्रों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण कर इन्हें संरक्षित धरोहर के रूप में विकसित किया जाएगा, या फिर यह ऐतिहासिक विरासत संरक्षण के इंतजार में ही रह जाएगी?