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कई रूप धरकर इंसाफ खान ने जगाई भूली-बिसरी लोककला, मोबाइल-टीवी के दौर में पुश्तैनी कला को बचाने की कोशिश

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15 साल बाद फिर दीवानगंज-अंबाड़ी और सेमरा में गूंजा बहुरूपिया का रंग

 मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन

मोबाइल, इंटरनेट और टीवी के बढ़ते प्रभाव के बीच पारंपरिक लोककलाएं धीरे-धीरे लोगों की यादों से दूर होती जा रही हैं। ऐसे दौर में राजस्थान से आए बहुरूपिया कलाकार इंसाफ खान ने करीब 15 साल बाद एक बार फिर दीवानगंज, अंबाड़ी और सेमरा क्षेत्र में अपनी कला का रंग बिखेरा है। अलग-अलग दिन अलग-अलग किरदारों का रूप धारण कर ग्रामीणों के बीच पहुंच रहे इंसाफ खान इन दिनों क्षेत्र में आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

कलाकार का पहनावा, चेहरे का श्रृंगार, हाव-भाव और अभिनय देखकर बुजुर्गों को पुराने दिनों की याद आ रही है, वहीं बच्चे और युवा भी इस पारंपरिक कला को कौतूहल के साथ देख रहे हैं। कभी भील तो कभी रावण, शूर्पणखा और अन्य पात्रों का रूप धारण कर इंसाफ खान ग्रामीणों का मनोरंजन कर रहे हैं।

अंबाड़ी में टोली के साथ डेरा

राजस्थान के शिखर जिले के हंसपुर निवासी इंसाफ खान पिता पप्पू खान इन दिनों अपनी टोली के साथ अंबाड़ी गांव में डेरा डाले हुए हैं। फिलहाल वे भील का रूप धारण कर ग्रामीणों के बीच पहुंच रहे हैं। इससे पहले वे रावण, शूर्पणखा, जींद सहित कई अन्य किरदारों का रूप धारण कर चुके हैं।

इंसाफ खान के मुताबिक करीब 15 वर्ष पहले वे अपने पिता के साथ इसी क्षेत्र में बहुरूपिया कला का प्रदर्शन करने आए थे। उस समय कलाकारों को देखने के लिए घरों और गलियों में बड़ी संख्या में ग्रामीण जुटते थे। लंबे अंतराल के बाद जब वे दोबारा क्षेत्र में पहुंचे तो बुजुर्गों के बीच पुरानी यादें ताजा हो गईं।

चार पीढ़ियों से परिवार की पुश्तैनी कला

इंसाफ खान बताते हैं कि बहुरूपिया कला उनके परिवार की पुश्तैनी कला है। उनके परिवार की करीब चार पीढ़ियां मध्य प्रदेश के अलग-अलग क्षेत्रों में इस कला का प्रदर्शन करती आ रही हैं। उन्होंने भी अपने पिता के साथ रहकर इस कला की बारीकियां सीखी हैं।

उनका करीब 10 सदस्यों का परिवार गांव-गांव घूमकर बहुरूपिया कला का प्रदर्शन करता है। एक गांव में वे लगभग 10 दिन तक रुकते हैं और इस दौरान अलग-अलग किरदारों का रूप धारण कर लोगों के बीच पहुंचते हैं।

कभी वे पौराणिक पात्र रावण और शूर्पणखा का रूप धारण करते हैं तो कभी जींद या आदिवासी किरदार में नजर आते हैं। वेशभूषा, चेहरे का श्रृंगार, हाव-भाव, संवाद और अभिनय के जरिए पात्र को जीवंत करना बहुरूपिया कला की सबसे खास पहचान है।

राजदरबारों से गांव की गलियों तक पहुंचा सफर

इंसाफ खान के अनुसार बहुरूपिया कलाकारों की परंपरा काफी पुरानी है। उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के समय में भी अलग-अलग रूप धारण कर अपनी कला का प्रदर्शन करते थे। उस दौर में राजदरबारों से लेकर आम लोगों तक बहुरूपिया कलाकारों को सम्मान और प्रोत्साहन मिलता था।

लोग कलाकारों का प्रदर्शन देखने के लिए उत्सुक रहते थे और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देकर उनका उत्साह बढ़ाते थे। समय के साथ मनोरंजन के साधन बदले और टीवी, मोबाइल तथा इंटरनेट लोगों के जीवन का हिस्सा बन गए। इसका असर बहुरूपिया जैसी पारंपरिक लोककलाओं पर भी पड़ा।

मनोरंजन के साथ परिवार के पालन-पोषण का जरिया

इंसाफ खान कहते हैं कि बहुरूपिया कला उनके लिए केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं है, बल्कि इसी कला के जरिए वे अपने परिवार का पालन-पोषण भी करते हैं। दर्शकों की संख्या और आर्थिक सहयोग पहले की तुलना में कम हुआ है, इसके बावजूद उन्होंने इस पुश्तैनी कला को छोड़ने का फैसला नहीं किया।

उनका प्रयास है कि यह कला अगली पीढ़ी तक पहुंचे और लोकसंस्कृति से लोगों को जोड़ने वाली यह परंपरा पूरी तरह खत्म न हो।

बच्चों और युवाओं में भी दिखा उत्साह

करीब 15 साल बाद क्षेत्र में बहुरूपिया कलाकारों की मौजूदगी से ग्रामीणों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। बुजुर्ग कलाकारों के अलग-अलग रूप देखकर पुराने समय को याद कर रहे हैं, जबकि बच्चों और युवाओं के लिए यह किसी नए अनुभव से कम नहीं है।

कई ग्रामीण कलाकार के साथ फोटो खिंचवाते नजर आ रहे हैं। वहीं बच्चे उनके अलग-अलग किरदारों और वेशभूषा को उत्सुकता से देख रहे हैं। आधुनिक मनोरंजन के दौर में बहुरूपिया कलाकार की मौजूदगी ने क्षेत्र में एक ऐसी लोककला की यादें फिर से ताजा कर दी हैं, जो धीरे-धीरे लोगों की दिनचर्या से दूर होती जा रही है।

कलाकार ने कहा- पुश्तैनी कला को जिंदा रखना हमारा प्रयास

बहुरूपिया कलाकार इंसाफ खान का कहना है कि उनके पूर्वज राजा-महाराजाओं के समय से अलग-अलग रूप धारण कर लोगों का मनोरंजन करते आए हैं। परिवार की चार पीढ़ियां मध्य प्रदेश में इस कला का प्रदर्शन कर चुकी हैं। आज मोबाइल और इंटरनेट के दौर में लोककलाओं के लिए पहले जैसा प्रोत्साहन नहीं मिल रहा, लेकिन उनका परिवार इस परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए लगातार प्रयास कर रहा है।

इंसाफ खान, बहुरूपिया कलाकार ने कहा, “हम अपनी पुश्तैनी कला को जिंदा रखना चाहते हैं। लोगों का प्यार और सहयोग मिलता रहे तो आने वाली पीढ़ी भी इस कला को आगे बढ़ा सकती है।”

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