सागर । निर्यापक मुनि श्री अभयसागर महाराज ने बताया कि आचार्य श्री विद्यासागर महाराज के जीवन के अनेक प्रसंग साधकों के लिए प्रेरणा का स्रोत हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि दिगंबर परंपरा में दशलक्षण पर्व मनाया जाता है, न कि पर्युषण, दिगंबर परंपरा में दस धर्मों की आराधना होती है। जबकि श्वेतांबर समाज में प्रदूषण पर्व 8 दिन के होते हैं। यह बात अष्टानिका पर्व के पांचवें दिन भाग्योदय तीर्थ में कही ।
उन्होंने कहा कि वर्ष 1998 में सागर में वर्षायोग चातुर्मास के दौरान के दशलक्षण पर्व में मुनि श्री समयसागर जी ने आचार्य श्री से प्रतिदिन एक-एक उपवास का संकल्प लेकर उपवास पूरे किए। इसी दौरान एक भक्त ने भूलवश आँखों की दवा के स्थान पर अमृतधारा डाल दी। सूचना मिलने पर आचार्य श्री ने शुद्ध घी डालने का निर्देश दिया, जिससे दुष्प्रभाव शांत हो गया।
एक अन्य प्रसंग रामटेक का है। प्रातःकाल विहार के समय अचानक मधुमक्खियों के झुंड ने आक्रमण कर दिया। मुनि श्री समयसागर जी अडिग होकर स्तंभ के समान खड़े रहे और उनके शरीर से लगभग 125–150 डंक निकाले गए। आचार्य श्री के निर्देशानुसार चंदन का तेल लगाया गया। यह घटना केवल शारीरिक सहनशक्ति नहीं, बल्कि संयम, धैर्य और गुरु के प्रभाव का अद्भुत उदाहरण है।
ऐसे प्रसंग बताते हैं कि जब साधना और संयम अपने उत्कर्ष पर पहुँचते हैं, तब विपरीत परिस्थितियाँ भी साधक के आत्मबल को डिगा नहीं पातीं।
यह हमारा सौभाग्य है कि ऐसे तीर्थ के निर्माण में तन, मन और धन से सहभागी बनने का अवसर मिल रहा है। जिनका दान इस पवित्र कार्य में लगेगा, उनके पुण्य का भी वर्धन होगा।
मुनि श्री निरीह सागर ने कहा कि आगम में वर्णित ऋद्धियों का वास्तविक स्वरूप तब समझ में आता है, जब उनका प्रत्यक्ष अनुभव देखने को मिलता है। आचार्य श्री विद्यासागर महाराज केवल पुरुष नहीं, बल्कि विरले महापुरुष और ऋद्धिधारी संत थे। उनके पास दृष्टि ऋद्धि और वचन ऋद्धि जैसी अद्भुत शक्तियाँ थीं। उन्होंने मुनि श्री निराश्रव सागर महाराज का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि गृहस्थ अवस्था में उन्हें कैंसर हो गया था। आचार्य श्री के दर्शन करने पर उन्होंने रात में चारों प्रकार के आहार का त्याग करने का निर्देश दिया। कुछ ही समय बाद उनका कैंसर ठीक हो गया और आगे चलकर वे दीक्षा लेकर मुनि बन गए।
एक अन्य प्रसंग में पैर में बना घाव और मवाद दवाइयों से ठीक नहीं हो रहा था। आचार्य श्री ने कहा— “न उसे छूना, न देखना और न उसके बारे में सोचना” कुछ समय बाद वह समस्या भी ठीक हो गई। ऐसे प्रसंग आचार्य श्री की अद्भुत आध्यात्मिक शक्ति और प्रभाव को प्रकट करते हैं।
मुनि श्री ने बताया कि आचार्य श्री ने कहा था कि जैन धर्म हजारों वर्षों तक सुरक्षित रहेगा। आज सागर में बन रहा सर्वतोभद्र जिनालय भी आने वाले समय में एक महान तीर्थ बनेगा, जहाँ देश- विदेश से श्रद्धालु आएंगे।
मुकेश जैन ढाना ने बताया कि विधान का निर्देशन ब्र विजय भैया लखनादौन कर रहे हैं 5 वें दिन 128 अर्घ श्रद्धालुओं ने चढ़ाए। 26 जुलाई को 256 अर्घ चढ़ाए जाएंगे अनेक स्थान की समाज की तरफ अब तक द्रव्य समर्पित हो चुकी है।