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आत्मा की आवाज, मूल्यबोध और धर्ममय जीवन ही सफलता का आधार” : मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज

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सुरेन्द्र जैन 

मधुवन (गिरिडीह)। “जीवन की अधिकांश समस्याओं का मूल कारण बाहरी परिस्थितियाँ नहीं, बल्कि हमारी दृष्टि और सोच है” उपरोक्त उदगार राष्ट्रसंत निर्यापक श्रमण मुनिश्री प्रमाण सागर महाराज ने गुणायतन परिसर मधुवन में व्यक्त किये

राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री द्वारा गुणायतन में प्रतिदिन सायंकाल 6:20 बजे शंका-समाधान कार्यक्रम आयोजित किया जाता है, जिसमें देश विदेश से हजारों दर्शक ऑनलाइन एवं प्रत्यक्ष उपस्थित श्रद्धालुओं को धार्मिक, सामाजिक तथा व्यावहारिक एवं जीवन से जुड़ी जिज्ञासाओं का समाधान मिलता है!

मुनि श्री ने कहा कि जब व्यक्ति धर्म के प्रकाश में स्वयं को देखना सीख जाता है,तब उसके अनेक संशय और समस्या स्वतः समाप्त हो जाती हैं।प्रत्येक व्यक्ति यदि आत्मचिंतन,संयम, सदाचार और सकारात्मक दृष्टिकोण को अपनाए,तो वर्तमान समय में असामाजिक घटनायें घटित हो रही है उन घटनाओं से समाज बच सकता है और प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बना सकता है। एक प्रश्न के उत्तर में मुनि श्री ने कहा कि व्यावहारिक जीवन में आने वाली परिस्थितियों तथा मन और बुद्धि के बीच जब द्वन्द चलता है, तो मनुष्य को अपनी अंतरात्मा कीआवाज को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मन सदैव अपनी अनुकूलता की ओर आकर्षित होता है,तथा बुद्धि लाभ-हानि परविचार करती है,और परिस्थितियाँ हमारे विश्वास को प्रभावित करती हैं। ऐसे समय में व्यक्ति को न तो परिस्थितियों से विचलित होना चाहिए और न ही केवल मन अथवा बुद्धि के भ्रमजाल में उलझना चाहिए।”आत्मा की प्रेरणा के अनुरूप लिया गया निर्णय ही जीवन को सही दिशा प्रदान करता है” उन्होंने कहा कि अनेक परिस्थितियों में विवेकपूर्ण बुद्धि से मन को नियंत्रित कर स्वयं को परिस्थितियों के अनुरूप ढालना भी आवश्यक होता है। जब मन परिस्थितियों से सामंजस्य स्थापित कर लेता है,तब कठिनाइयाँ भी विकास और आत्मोन्नति का माध्यम बन जाती हैं। उन्होंने गृहस्थ और साधु जीवन की चर्चा करते हुए कहा कि साधु जीवन की पूर्णता त्याग,तप और साधना में निहित है, जबकि गृहस्थ जीवन की धन्यता दान, पूजा, शील और उपवास से प्रतिष्ठित होती है। धर्म मर्यादा का पालन करते हुए इन चारों का आचरण करने वाला गृहस्थ अपने जीवन को सफल, सार्थक एवं कल्याणकारी बना सकता है।एक अन्य प्रश्न के उत्तर में मुनि श्री ने मूल्यबोध पर विशेष बल देते हुए कहा कि जो वस्तुएँ वास्तव में निःशुल्क उपलब्ध हैं,उनका उपयोग किया जा सकता है,किंतु जो मूल्यवान हैं,उन्हें उचित मूल्य देकर ही प्राप्त करना चाहिए। यदि कोई हमें लाभ पहुँचाता है तो उसे कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार करें और अवसर मिलने पर हम भी किसी के जीवन में उपयोगी बन सकें ऐसा संकल्प करना चाहिये केवल लेने की मानसिकता व्यक्ति को परावलंबी और अकर्मण्य बनाती है,जबकि देने की भावना उसके व्यक्तित्व को महान,उदार और समाजोपयोगी बनाती है।मुनि श्री ने कहा कि आत्मा की आवाज, विवेकपूर्ण निर्णय, मूल्यबोध, दानशीलता, संयम और कृतज्ञता—ये सभी श्रेष्ठ एवं सफल जीवन के आधार हैं। जो व्यक्ति इन आदर्शों को अपने जीवन में उतारता है,वह न केवल स्वयं का कल्याण करता है,बल्कि परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए भी प्रेरणास्रोत बन जाता है। राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया संस्कृत भाषा में निवद्ध श्री सिद्ध चक्र महामंडल विधान जो कि आगामी 21 जुलाई से 29 जुलाई तक नवीन गुणायतन परिसर (निहारिका के पास) में मुनि संघ के सानिध्य में किया जा रहा है, इसी के साथ 2026 के चातुर्मास की स्थापना 29 जुलाई गुरु पूर्णिमा को की जायेगी एवं मुनि श्री संधान सागर महाराज का 12 बां दीक्षा दिवस समारोह भी मनाया जायेगा गुणायतन एवं श्री सेवायतन समिति ने रजिस्टर्ड किये गये सभी देश विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को असुविधाओं से बचने के लिये उनके मोवाईल पर ही उनके आबास की सूचना प्रदान कर दी गई है

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