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बामुलाहिजा:: ‘विजय बम’ फूटा, कुर्सियां कांपीं!- संदीप भम्मरकर

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आलेख

संदीप भम्मरकर

मंत्री विजय शाह पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी क्या आई, भोपाल में मंत्रिमंडल विस्तार की फुसफुसाहट फिर तेज हो गई। सत्ता के गलियारों में अब कैलकुलेटर और कुंडली दोनों खुल गए हैं। चर्चा है कि कुछ मंत्री घर बैठेंगे, कुछ का कद बढ़ेगा और कई विभागों की कुर्सियां नई नेमप्लेट तलाशेंगी। रणनीतिकार गणित सुलझाने में जुटे हैं, जबकि दिग्गज अपनी-अपनी गोटियां फिट कर रहे हैं। उधर मुख्यमंत्री मोहन यादव भी मंत्रियों की परफॉर्मेंस फाइलें खंगाल रहे हैं। यानी फैसला सिर्फ विजय शाह का नहीं होगा… कई चेहरों का भविष्य उसी फाइल में दबा बैठा है।

कांग्रेस दफ्तर में ‘सरप्राइज एंट्री’

कांग्रेस दफ्तर में इस बार मीटिंग से ज्यादा चर्चा एंट्री की रही। एससी विभाग की बैठक में सबको जीतू पटवारी का इंतजार था, लेकिन अचानक दिग्विजय सिंह भी पहुंच गए। कई नेताओं के चेहरे ऐसे हो गए, जैसे बिना ट्रेलर फिल्म शुरू हो गई हो। मजेदार बात ये कि इस सरप्राइज की खबर सिर्फ पीसीसी चीफ को थी। मंच पर गुरु-चेले वाला संवाद चला, लेकिन नीचे बैठे पदाधिकारियों के मन में दूसरा ही सवाल कुलबुलाता रहा… “दिग्गी राजा आ रहे थे, तो कम से कम सूचना तो दे देते!” कांग्रेस में अब सरप्राइज भी सियासी संदेश बन गए हैं।

शिवराज की एक्टिविटी के चर्चे

एमपी की सियासत में शिवराज सिंह चौहान इन दिनों ऐसे छाए हैं कि उनका कार्यक्रम हो तो बाकी नेताओं की सुर्खियां खुद किनारे लग जाती हैं। बयान, फोटो, वीडियो… सोशल मीडिया पर ऐसा तूफान उठता है कि देर तक धूल बैठती ही नहीं। दिलचस्प ये कि शिवराज सिर्फ अपने संसदीय क्षेत्र में सक्रिय हैं, लेकिन चर्चा हर तरफ गूंज रही है। सियासी गलियारों में तुलना उमा भारती और बाबूलाल गौर जैसे दिग्गजों से हो रही है, जिन्हें “पूर्व” लगते ही साइलेंट मोड पर डाल दिया गया था। मगर शिवराज… राजनीति के ऐसे खिलाड़ी निकले, जिन्होंने “पूर्व” को भी फुल फॉर्म में बदल दिया।

आईएएस का जंगल चैप्टर

सरकार ने नए आईएएस अफसरों को सीधे एयरकंडीशंड दफ्तर नहीं, आदिवासी इलाकों की धूल और धरातल सौंपा है। मंशा साफ है, अफसरों को फाइलों से नहीं, फील्ड से तपाकर तैयार किया जाए। मध्यप्रदेश में आदिवासी राजनीति बीजेपी की सबसे बड़ी प्रयोगशाला मानी जाती है, इसलिए यहां पोस्टिंग भी अब “स्पेशल ट्रेनिंग मॉड्यूल” बन गई है। राज्यपाल की निगरानी वाली टीम अलग नजर रखे हुए है। मतलब साफ है, नए अफसरों की असली क्लास अब जंगल, जनजाति और जमीन के बीच लगने वाली है… जहां नोटिंग नहीं, समझ काम आती है।

पेट माफिया का बढ़ता दायरा

“पेट माफिया” वाला जुमला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि अब मुरैना में गांजा तस्करी ने नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। बड़ी खेप पकड़ी गई तो चंबल की हवा में सवाल तैरने लगे। चर्चा है कि यूपी से माल आ रहा था और रास्ते एमपी तक सेट थे। पुलिस ने तस्करों को दबोच लिया, लेकिन पूछताछ में खुल रहे राज़ कई रसूखदार चेहरों की नींद उड़ा सकते हैं। अब सियासी गलियारों में तंज चल रहा है… रेत वाला माफिया “पेट माफिया” था, तो दूसरों की जिंदगी से खेलने वाले इस नेटवर्क को क्या नाम दिया जाएगा?

लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं

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