रिपोर्ट धीरज जॉनसन दमोह
जिले की हटा तहसील अंतर्गत तथा छतरपुर–पन्ना जिले की सीमा के निकट स्थित ग्राम वर्धा में अतीत की याद दिलाता है, जहां गढ़ी, तालाब और पहाड़ी और कुछ वीरान क्षेत्र दिखाई देते है।

समय के साथ यह स्थान अब भग्नावशेषों में बदल चुका है।यहां खरपतवार, झाड़ी और पेड़ दिखाई देते है। गढ़ी की कुछ दीवारें और बुर्ज अब भी सुरक्षित दिखाई देते हैं, किंतु अधिकांश हिस्से जर्जर अवस्था में हैं। यहां तक पहुंचने के लिए पगडंडी और कच्चे रास्तों का सहारा लेना पड़ता है, जिससे यह ऐतिहासिक स्थल आम लोगों की नजरों से लगभग ओझल ही बना हुआ है।
गढ़ी (किले) में कहीं कहीं ऊपर तक पहुंचने के लिए सीढ़ियां भी है इन पर चढ़कर आसपास के क्षेत्र का सुंदर दृश्य और किले के अन्य हिस्से स्पष्ट दिखाई देते हैं।दीवारों की नक्काशी आकर्षित करती है।गढ़ी के भीतर एक चबूतरा भी बना हुआ है। ग्रामीणों के अनुसार आसपास के गांवों के लोग यहां पूजा-अर्चना करने आते हैं।

किले के अंदर ही एक प्राचीन बावड़ी भी स्थित है, जिसमें नीचे तक जाने के लिए पत्थरों की सीढ़ियां बनी हुई हैं। गर्मी के मौसम में भी इस बावड़ी में पानी बना रहता है, हालांकि पेड़-पौधों और झाड़ियों के कारण इसका कुछ हिस्सा ही दिखाई देता है। पानी भी गंदा प्रतीत होता है, जिससे स्पष्ट होता है कि देखरेख के अभाव में यह ऐतिहासिक धरोहर अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही है।

किले से कुछ दूरी और छतरपुर – पन्ना जिले की सीमा पर एक तालाब है जिसे पवइया तालाब कहा जाता है और यहां से करीब 7 – 8 किमी दूर ब्यारमा नदी और सुनार नदी का संगम दिखाई देता है।जहां दमोह जिले के ग्राम खमरगौर से और वर्धा – पौड़ी से पन्ना जिले के धौर्रा झिराटा से पहुंचा जा सकता है।
ग्रामीणों का कहना है कि यदि गढ़ी की स साफ-सफाई कर इसे संरक्षित किया जाए और यहां तक पहुंचने के लिए बेहतर मार्ग बनाया जाए, तो लोगों का आवागमन बढ़ सकता है और क्षेत्रीय पर्यटन की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण बन सकता है।

गौरतलब है कि दमोह जिले में ऐसे कई प्राचीन स्थल मौजूद हैं, जिन्हें संरक्षण और पर्यटन के दृष्टिकोण से विकसित किया जा सकता है। यदि समय रहते वर्धा की इस ऐतिहासिक गढ़ी की देखरेख नहीं की गई, तो बढ़ती झाड़ियां और पेड़ इसे पूरी तरह जंगल और खंडहर में तब्दील कर सकते हैं, जिससे इतिहास की एक महत्वपूर्ण कड़ी हमेशा के लिए विलुप्त हो सकती है।