मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
दुर्गा पूजा को लेकर क्षेत्र में तैयारियां तेज हो गई हैं। माता की प्रतिमाओं का निर्माण भी अंतिम चरण में है। कारीगरों के हाथ तेजी से चल रहे हैं। पांच हजार से 60 हजार रुपये तक की प्रतिमाओं को आकर्षक रूप देने में कारीगर जुटे हैं। कारीगरों के अनुसार, निर्माण सामग्री के दामों में तो वृद्धि हुई है, लेकिन प्रतिमाओं के दामों में वृद्धि नहीं हुई है। ऐसे में सिर्फ लागत ही निकल पाती है।
कोई पुश्तैनी धंधे को बचाने में मंहगाई से जूझ रहा है, तो कोई आत्म संतुष्टि के लिए अपनी कला का जौहर दिखा रहा है। हर हुनर लाजवाब है। हाथों से मिट्टी को मूर्ति का नायाब रूप मिल रहा है। जिसे देख हर कोई तारीफ प्रशंसा करने पर विवश है। मगर मूर्तियों में जान डालने वाले इन हुनरमंदों के चेहरे पर बेबसी की झलक साफ दिखाई दे रही है।

हम बात कर रहे अंबाडी के कलाकारों की। जो अपने ही क्षेत्र में करीब तीन माह से प्रतिमा तैयार करने में जुटे हैं। इनके हुनर की पहचान सिर्फ कुछ ही दिनों में चौराहों, गांवों व गलियों में झलकेगी। लेकिन यह कलाकार भी मंहगाई की आग में जल रहे हैं। क्योंकि कड़ी मेहनत के बावजूद इन्हें मनमाफिक रकम मिलने की गुंजाइश नहीं दिख रही है। इनमें कुछ कलाकार ऐसे हैं जो अपने पुश्तैनी धंधे को बचाने में जुटे हैं। अंबाडी की सकरी गली में पसीने से तर-बतर हाथों से दुर्गा प्रतिमा को अंतिम रूप दे रहे हैं। इनकी कला ऐसी जो भी देखे तारीफ कर बैठे लेकिन यह अंदर से संतुष्ट नजर नहीं आए। प्रताप प्रजापति ने बताया कि उनके यहां पर कई प्रतिमाएं तैयार की जा रही है, पूरे साल मूर्ति बनाने का ही हमारा परिवार काम करता है। वही अंबाड़ी निवासी हल्के राम प्रजापति, अमनप्रजापति ,राहुल प्रजापति ,विक्की ,छोटू प्रजापति बताया जिस तरह अभी तक आर्डर आ रहे हैं उसको देख ऐसा प्रतीत हो रहा है कुछ प्रतिमाएं बच भी जाएंगी।
कड़ी मेहनत करने के बाद मनमाफिक रकम पर कलाकार महादेव ने बताया कि जो सोचा था उससे काफी कम रकम मिलने की उम्मीद है। घाटा हो जाए तो कुछ आश्चर्य नहीं होगा। क्या करें पुश्तैनी धंधा है और अब कुछ कर भी नहीं सकते इसलिए इसी काम में लगे रहना उनकी मजबूरी भी है। मूर्तियों में इस्तेमाल होने वाली बांस, लकड़ी, सुतरी, मिट्टी, पेंट, कपड़ा आदि का मूल्य एक वर्ष में दुगने हो गए हैं जबकि मूर्तियों के दाम वहीं हे।