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संरक्षण के इंतजार में: दूरगामी सोच की झलक और वर्तमान को आईना दिखाती प्राचीन बावड़ियां

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धीरज जॉनसन,दमोह

दमोह जिले में जल स्रोतों के संरक्षण और उसके पुनर्जीवन के लिए 5 से 15 जून तक विशेष अभियान जारी है जिसके तहत जल संरक्षण के ऐसे स्थान जो अनुपयोगी हो गए हैं उन्हें अविरल बनाए रखने और उनका जीर्णोद्धार व नवीनीकरण कर उन्हें उपयोगी बनाया जा सके। परंतु अभी भी कुछ ऐसी प्राचीन बावड़ियां दिखाई देती है जिनमें सुधार की आवश्यकता परिलक्षित होती है।अफसोस यह कि गुणवत्ता के आधार पर वर्तमान में बने जल संरक्षण के माध्यम सवालात पैदा करते है और प्राचीन धरोहर को नजरंदाज करते है जो आज भी उपयोगी साबित हो रही है।

दमोह शहर में बस स्टेंड और रेल्वे स्टेशन के मध्य चौराहे के निकट प्राचीन बावड़ी है जिसकी दीवार और सीढियां कमजोर हो चुकी है और इसमें काफी मात्रा में गंदगी भी है जिस कारण इसका पानी इस्तेमाल योग्य नहीं बचा है हालांकि इसके निकट खेत में इसके पानी का उपयोग किया जाता रहा है अगर इसकी सफाई हो जाए तो जल संरक्षण के साथ साथ इसका पानी भी उपयोग में लिया जा सकता है।

तेजगढ़ में झाड़ियों में छुप गई बावड़ी

शहर से लगभग 35 किमी दूर जबलपुर की ओर जाने वाले सड़क मार्ग पर गौरैय्या नदी के किनारे दिखाई देने वाले तेजगढ़ का इतिहास काफी पुराना है जिसके खंडहर बताते है कि इसकी खूब रौंनक रही होगी। जो किसी समय 210 परगनों का सदर मुकाम था यहां दिखाई देती प्राचीन बावड़ी जिसकी गहराई 60 फीट से अधिक हो सकती है अब उसमें कचरा और गंदगी दिखाई देती है जिसे चारों तरफ से झाड़ियों ने घेर लिया है जिस कारण इसकी खूबसूरत बनावट भी ठीक से दिखाई नहीं देती है। और सीढ़ियों से नीचे जाना भी मुश्किल होता है।स्थानीय लोगों का कहना था कि अगर यह साफ हो जाए तो प्राचीन बावड़ी संरक्षित हो जाएगी और उसके पानी का उचित इस्तेमाल भी किया जा सकेगा।

सूखी पिपरिया के ग्रामीण कर रहे सफाई का इंतजार

कुछ इसी तरह की प्राचीन बावड़ी जिले के ग्राम सूखी पिपरिया में दिखाई देती है जिसकी बनावट और मजबूती देखकर लगता है कि यह कोई पुरातन स्थल होगा। जिसकी गहराई लगभग 50 फीट बताई गई परंतु वह भी झाड़ियों और कचरे से भर चुकी है। स्थानीय निवासी दीपक,दुर्गा इत्यादि बताते है इसके नीचे तक जाने के लिए सीढ़ियां बनी हुई है। वर्षो पहले इसमें पर्याप्त मात्रा में पानी भरा रहता था परंतु सफाई न होने के कारण इसमें गंदगी जमा हो चुकी है,पहले इसके पानी से खेतों में भी सिंचाई हो जाती थी और इसका पानी खत्म नहीं होता था,अगर अभी भी इसकी सफाई और जीर्णोद्धार हो जाएगा तो ग्रामीणों को पानी की सहूलियत हो जाएगी।

उमराहो की बावड़ी में साल भर रहता है पानी
जिले के ग्राम उमराहो में भी दो प्राचीन बावड़ियां दिखाई देती है जो गांव से कुछ दूर और पथरिया – शाहपुर सड़क मार्ग के निकट है परंतु इसमें भी गंदगी व्याप्त है। स्थानीय निवासियों ने बताया गर्मियों में मौसम में भी इसमें पानी खत्म नहीं होता है। बड़ी वाली बावड़ी में आने जाने के लिए सीढ़ी और पहले एक स्लोप (ढलान मार्ग) भी दिखाई देता था जिससे मवेशी बावड़ी तक पहुंचकर पानी पीते थे परंतु अब वह दिखाई नहीं देता। वर्तमान में इससे खेतों में सिंचाई होती है अगर यह साफ हो जाएं तो पेयजल की व्यवस्था हो जाएगी।

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