रामभरोस विश्वकर्मा, मंडीदीप रायसेन
मनुष्य के ऊपर कोई भी संकट आए तो उसे सहन करना आना चाहिए ।कष्ट को सहन किए बिना कभी भी पुरस्कार नहीं मिलता है । जहां भूमि में दबे बिना बीज का भी अंकुर नहीं फुटता है। उसी प्रकार प्रभु को पाना है तो कष्टों को स्वीकार करना ही होगा ।यह बात मुनि निर्णय सागर महाराज ने कही। वे महावीर दिगम्बर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि कष्ट आने के बावजूद भी चंदना समभाव में रही तो महावीर स्वामी की प्रथम शिष्या बनी और मोक्ष मिला।मनुष्य में धर्म के प्रति लगन और प्रतिभा हो तो नरक में भी वह स्वर्ग का वातावरण बना सकता है। सहनशीलता हो तो का परिवर्तन स्वतरू होता है।तपस्या करने में वर्षों लगते हैं लेकिन तपस्या की छवि बिगाड़ने में एक गलत कार्य एक क्षण में सब कुछ खत्म हो जाता है। इसलिए अभी भी अधर्म और गलत कार्य नहीं करना चाहिए । धर्म सत्य की राह पर चलकर ही परमार्थ का सेवा कार्य करना चाहिए तभी जीवन का कल्याण हो सकता है। धर्म की राह पर चलेंगे तो सदैव अच्छाई का मार्ग मिलेगा ।प्रेम से जीवन बदलता है चातुर्मास परिवर्तन का पावन अवसर है । चंदना मोक्ष गई समभाव का उदाहरण है ।जीवन में बहुत कुछ सिखाता है।अच्छी सोच आदमी के जीवन का सबसे सुंदर मित्र है ।वही बुरी सोच आदमी के जीवन का सबसे बड़ा शत्रु है। जिंदगी में कुछ क्षण ऐसे आते हैं जो जिंदगी को एक निश्चित दिशा देते हैं ।पूरे जीवन को उजाले से भर देते हैं। जीवन में रूपांतरण लाने के लिए समस्याओं का समाधान पाने सद्भाव की परिणत करने हेतु संत समागम बहुत उपयोगी है। उसे भाव निद्रा टूट सकती है। कष्टों को सहन करने पर ही भगवान मिल सकते हैं ।क्रोध मोह माया हमारे विचार है इसे तपस्या भक्ति से खाली करना होगा तभी जिनवाणी अंदर जाएगी और आत्मा का कल्याण होगा ।शरीर को स्वस्थ रखना है तो वाणी पर संयम रखना होगा हैं।धन को पुण्य कर्मों में दान करते हैं धन पवित्र होकर बढ़ता है मानव चाहे कितना ही धन संपत्ति संग्रह के साथ नहीं जाता है। इस अवसर बड़ी संख्या मेें श्रदालु मौजूद रहेे।