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1947 में राजनेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा माना था,सांची विश्विद्यालय में हिंदी दिवस पर विशेष व्याख्यान

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• ‘हिंदी की बोलियां और सांस्कृतिक अस्मिता’ विषय पर व्याख्यान
• पूर्व प्रमुख सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव का व्याख्यान
• सांस्कृतिक उत्तराधिकार और संस्कृति का हिस्सा है हिंदी

साँची रायसेन।सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में हिंदी दिवस केअवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार और मध्य प्रदेश शासन के पूर्व मुख्य सचिव श्री मनोज श्रीवास्तव का विशेष व्याख्यान आयोजित किया गया।


श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि आज़ादी के बाद देश के तत्कालीन सभी राजनेताओं ने हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार किया था, लेकिन बाद में इसे राजभाषा का दर्जा दे दिया गया। उनका कहना था कि संविधान निर्माण के समय कहा गया था कि भारतीय संघ की राजभाषा मात्र अगले 15 वर्षों तक हिंदी होगी लेकिन पिछले 75 सालों से भी इसे राजभाषा से राष्ट्रभाषा नहीं बनाया जा सका।
सांची विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग द्वारा ‘हिंदी की बोलियां और सांस्कृतिक अस्मिता’ विषय पर आयोजित किए गए व्याख्यान में श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि हिंदी भाषा सिर्फ माध्यम नहीं है बल्कि इसमें सांस्कृतिक अस्मिता और सांस्कृतिक उत्तराधिकार है और संस्कृति का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि चीन ने मेंडेरिन भाषा को बचाए रखने के लिए तय किया है कि 2025 तक 25 प्रतिशत नागरिकों को मेंडेरिन सीखनी होगी। जबकि 2030 तक सभी नागरिकों को। उनका कहना था कि हमारे देश में हिंदी भाषा के साथ ऐसा बर्ताव क्यों किया जाता है।
उनका कहना था कि हिंदी की तरह अंग्रेज़ी भाषा का मूलभूत कर्तव्य पूरा नहीं कर पाती और ये ‘संप्रेषण’ से ज़्यादा ‘संगोपन’ का कारण बन गई है। श्री मनोज श्रीवास्तव का कहना था कि भाषा का प्रश्न दरअसल मानवाधिकार का प्रश्न है। उनका कहना था कि जिस भाषा में आप स्वप्न देखते हैं वो आपकी मातृ भाषा/धमनी भाषा/स्नायु भाषा होती है।


उनका कहना था कि हमारे देश में पिए जाने वाली दवाओं के साथ मिलने वाले पर्चे सिर्फ अंग्रेज़ी में क्यों होते हैं जबकि देश के अधिकतर लोग या तो हिंदी या फिर स्थानीय/आंचलिक भाषा में बातचीत करते हैं। बोलियां ग्लोबल के विरुद्ध लोकल हैं। उन्होंने बताया कि केपवर्ड से लेकर रूस तक में यह आवश्यक होता है कि किसी आपराधिक प्रवृत्ति वाले व्यक्ति की गिरफ्तारी से पहले उसके अधिकार उसकी अपनी भाषा में बताए जाएं। इसी तरह से साइप्रस में न्यायायिक कार्रवाई पक्षकारों की भाषा में की जाएंगी।
विश्वविद्यालय के हिंदी भाषा विभागाध्यक्ष डॉ. राहुल सिद्धार्थ ने कहा कि यू.एन ने चिंता जताई है कि 21वीं सदी के अंत तक 1500 से अधिक भाषाएं विलुप्त हो जाएंगी जिनमें 46 भारतीय भाषाएं भी खो जाएंगी। इस पर श्री मनोज श्रीवास्तव ने कहा कि ऐसा इसलिए होगा कि बोलियां और भाषाएं भूमंडलीकरण और बाज़ार से प्रभावित हो रही हैं।


हिंदी दिवस के अवसर पर सांची विश्वविद्यालय की कुलपति डॉ. नीरजा गुप्ता ने कहा कि किसी भी देश में भाषा का दिवस नहीं मनाया जाता। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता की लड़ाई की भाषा हिंदी बन गई थी। उनका कहना था कि हिंदी ने अपना धर्म निभा दिया है अब देश के प्रत्येक नागरिक को हिंदी के प्रति अपना धर्म निभाना है।


विश्वविद्यालय में हिंदी दिवस के अवसर पर छात्रों ने कई कार्यक्रम भी आयोजित किए जिनमें निबंध प्रतियोगिता, कविता पाठ और भाषण सम्मिलित हैं। हिंदी विभाग के छात्र सुमित कुमार ने हिंदी पर कविता पाठ किया।

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