आलेख
अजय बोकिल
अयोध्या के श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले में गठित एसआईटी ने अपनी प्रारंभिक जांच रिपोर्ट यूपी सरकार के वरिष्ठ अधिकारी को सौंप दी है। इसे अभी सार्वजनिक नहीं किया गया है, लेकिन जो खबरे छनकर आ रही हैं, उससे लगता है कि मंदिर में चढ़ावा चोरी का बड़ा रैकेट काम कर रहा था और उसे ट्रस्ट के पदाधिकारियों का संरक्षण किसी न किसी रूप में मिला हुआ था। रिपोर्ट में ट्रस्ट में बदलाव तथा जिम्मेदारों के खिलाफ एफआईआर की बात भी कही गई है। मंदिर ट्रस्ट के पदाधिकारियों को बदलने की भी बात है। जांच के दौरान ही मंदिर की व्यवस्थाअों में कुछ महत्वपूर्ण परिवर्तन भी किए गए हैं, जो इस बात का संकेत है कि खामोशी से ही सही, गड़बड़ी की बात मानी जा रही है। हालांकि जनता के सामने यह रिपोर्ट पूरी जांच के बाद ही आने की संभावना है। इन सबके बाद भी कोई ठोस कार्रवाई किसी के और खासकर ‘बड़े’ लोगों के खिलाफ होगी या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं है। अभी इस बात को लेकर भी संदेह है कि यह एसआईटी, ‘स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम’ है अथवा ‘सेव इनसाइडर्स टीम’ है। प्राथमिक जांच रिपोर्ट में किसी के खिलाफ पुलिस रिपोर्ट की भी बात नहीं है। इस मामले में कुछ ठोस कार्रवाई न होने की आशंका के पीछे विश्व हिंदू परिषद एवं अनुषांगिक अन्य संगठनों तथा साधुसंतों द्वारा बनाए जा रहे अलग-अलग नरेटिव हैं, जो एक दूसरे को काटने में भी लगे हुए हैं। जबकि उन राम भक्तों की भावना और नरेटिव पर किसी का ध्यान नहीं है, जो हर हाल में धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में असंदिग्ध पवित्रता और नैतिक ईमानदारी चाहता है। एक मुद्दा ‘चढ़ावा चोरी’ को ‘चंदा चोरी’ कहकर ‘अंडर एस्टीमेट’ करने का भी है। मीडिया का बड़ा वर्ग अब चढ़ावा चोरी को ‘चंदा चोरी’ कहने लगा है। यह तार्किक रूप से सही नहीं है। क्योंकि चंदा (कंट्रीब्यूशन) तो किटी पार्टी या होली के हुड़दंग के लिए भी दिया जा सकता है। लेकिन चढ़ावा (आॅफरिंग) केवल भगवान को चढ़ता है। यह भक्तिभाव और स्वेच्छा से किया गया दान है। इसे ‘चंदा’ कहना आस्था का अवमूल्यन करने जैसा है।
बहरहाल, जो सामने आ रहे हैं, या मीडिया में सुनियोजित तरीके से चलाए जा रहे हैं, वो मुख्य रूप से चार नरेटिव हैं। पहला तो यह कि श्रीराम मंदिर में कहीं कोई रत्तीभर भी घोटाला नहीं हुआ है। वहां काम करने वाले सभी आदर्श की प्रतिमूर्ति हैं। चढ़ावा चोरी जैसी अपवित्र बातें वो लोग फैला रहे हैं, जो श्रीराम मंदिर और रामजन्मभूमि ट्रस्ट के ट्रस्टियों को और प्रकारांतर से हिंदुअों को बदनाम करना चाहते हैं। मंदिर के हिसाब-किताब में भारी अनियमितता की बातें सामने आने पर ट्रस्ट ने स्वयं एसआईटी बनाने की मांग की। उसी के तहत सारी जांच हो रही है। जिसे कहीं कोई शिकायत हो तो एसआईटी के समक्ष अपनी बात रखे। दोष सिद्ध होने के पहले किसी की नीयत पर शक करना ठीक नहीं। एफआईआर का तो सवाल ही नहीं है। वैसे भी राम भक्तों और मंदिर के बंदों पर एफआईआर कैसी? जहां तक ट्रस्ट के महासचिव चंपत राय एंड कंपनी और उनकी कार्यशैली पर उठ रही उंगलियों का सवाल है तो चंपत राय ‘महात्मा’ हैं। उनके चरित्र पर शक करना भी पाप है। इतने पवित्र वातावरण में भी कहीं कोई छोटी-मोटी ‘त्रुटि’ हुई होगी तो ‘ठीक’ कर ली जाएगी। यह बात अलग है कि इस भोले नरेटिव पर भाजपा और संघ से जुड़े बहुत से लोग भी हैरान हैं।
दूसरा नरेटिव, इस सावधानी के साथ चलाया जा रहा है कि श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी की आड़ में एक वर्ग हिंदू मंदिरों का प्रबंधन फिर से सरकार के हाथों में सौंपना चाहता है। यह कतई नहीं होने दिया जाएगा। हिंदू मंदिरों का प्रबंधन हिंदू जनता के हाथ में ही रहना चाहिए। जैसे कि अन्य धर्मों के मानने वालों के यहां होता है। यहां तक कि जिन मंदिरों के ट्रस्टों में अभी सरकार का दखल है, वह भी खत्म करके उनका प्रबंधन पूरी तरह हिंदू प्रतिनिधियों के हाथ में दिया जाना चाहिए, फिर उसमें चाहे जितनी गड़बाडि़यां हों। क्योंकि मंदिर प्रबंधन पर हिंदुअों का कब्जा ज्यादा मह्वपूर्ण है बजाए, उसमें होने वाली हेराफेरी या चोरी-चकारी आदि के। इसमें अंतर्निहित सनातन मान्यता यह भी है कि हिंदू केवल इसी बात से अभिभूत रहता है कि मंदिर का मैनेजमेंट हिंदू के हाथ में है। बाकी वह सौ खून भी माफ कर देता है। हिसाब-किताब में गड़बडि़यां तो सांसारिक प्रपंच हैं, मोक्ष प्राप्ति की परम इच्छा रखने वाले हिंदू को इस चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। दान, चंदा, चढ़ावे आदि का क्या, इस हाथ से निकला, उस हाथ को मिला। किसी का तो भला हुआ। हम तो ‘सर्वे भवंतु सुखिन:’ के आदि काल से पैरोकार हैं। मंदिर का चढ़ावा अगर किसी के घर की समृद्धि का कारण बन रहा है अथवा किसी दूसरे तरीके से बाजार में ही आ रहा है तो इसमें किसी को ईर्ष्या क्यों होनी चाहिए? ऐसा सोचना सच्चे हिंदू होने का प्रमाण नहीं है। वैसे भी चंदा क्या और चढ़ावा क्या, अंत काल में कुछ किसी के साथ नहीं जाने वाला। भगवान सिर्फ भक्ति के भूखे हैं न कि सोने की शिला, चांदी के हार अथवा नकदी के। यूं भी आपकी श्रद्धा-भक्ति डायरेक्ट प्रभु तक पहुंच गई, बाकी रह गया माल तो सेवा करने वाले बंदों का भी तो कुछ हक बनता है।
तीसरा नरेटिव, देश में हिंदू मंदिरों के प्रबंधन के लिए एक सनातन बोर्ड गठित करने का है। कथावाचक देवकीनंदन ठाकुर जैसे लोग इसे हवा दे रहे हैं। इसके पीछे भाव यह है कि सारे मंदिरों को ‘मुस्लिम वक्फ बोर्ड’ की तर्ज पर किसी एक बोर्ड के अधीन किया जाए। उसके अपने नियम हों, उसी के तहत मंदिरों को प्रबंध सुनिश्चित किया जाए। लेकिन ऐसा करने के लिए सरकार को पहला बोर्ड गठित करना होगा। उसके नियम बनाने होंगे। अगर बोर्ड बने भी तो नियम-कायदे सरकार के ही रहेंगे। यह नरेटिव मंदिर प्रबंध स्वतंत्रता समर्थकों को शायद ही मंजूर हो।
चौथा नरेटिव आम राम भक्तों का है, जो केवल और केवल आस्था एवं श्रद्धा के कारण मंदिरों में जाते हैं। भक्तों को सदा यही आस रहती है कि कभी तो भगवान की कृपा बरसेगी और कभी तो उनके दिन फिरेंगे। मंदिर में चढ़ावा भी वह अपनी श्रद्धा और हैसियत के साथ समर्पित भाव से देते हैं। अमूमन ज्यादातर भक्त चढ़ावा चढ़ाने के बाद भूल जाते हैं कि उसका कोई हिसाब भी रखना जरूरी है। यानी जो हिसाब होगा, भगवान के घर होगा। बावजूद इस निष्काम भाव के श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड के बाद राम भक्तों की भावनाअों को ठेस जरूर लगी है और वो आत्मचिंतन के दौर से गुजर रहे हैं। यह भावना बलवती होती जा रही है कि मंदिर में उनका चढ़ावा भी उसकी खून पसीने की कमाई ( दो नंबर की कमाई वालों को छोड़ दें) है, जिस पर यूं डाका डाला जा रहा है, यह तो सरासर धार्मिक ठगी है। लिहाजा लोग अब तंग हाथ से नकदी चढ़ा रहे हैं।
भारत में मंदिरों के प्रबंधन और चढ़ावे के धन का हिसाब किताब रखने के लिए अलग अलग व्यवस्थाएं हैं। उदाहरण के लिए तिरूवअंनतपुरम् के पद्मनाभस्वामी मंदिर में दान और वित्तीय प्रबंधन जिला जज की निगरानी में होता है। तिरूपति बालाजी मंदिर में चढ़ावे की गिनती एक बंद लेकिन पारदर्शी कक्ष में होती है, जिसे बाहर से कोई भी देख सकता है। चित्तौड़गढ़ के श्री सांवलिया सेठ मंदिर में चढ़ावे और दान की गिनती का हिसाब दिन सार्वजनिक किया जाता है और इस काम में कोई भी भक्त सहभागी हो सकता है। पूरी प्रक्रिया में एडीएम स्तर का अधिकारी और बैंक के अधिकारी मौजूद रहते हैं। शिर्डी के साई बाबा मंदिर का प्रबंधन आदर्श माना जाता है। वहां मंदिर परिसर में रखी दानपेटियां मुख्य कार्यकारी अधिकारी और बैंक अधिकारियों की मौजूदगी में खोली जाती हैं। गिनती बुलेटप्रूफ कांच वाले सुरक्षित हॉल में होती है। यहां का ऑडिट निजी चार्टर्ड अकाउंटेंट नहीं ,बल्कि महाराष्ट्र सरकार का लोकल फंड ऑडिट विभाग करता है। ऐसा नहीं है कि कभी किसी मंदिर के हिसाब-किताब में रत्ती भर भी गड़बड़ी नहीं हुई हो, लेकिन बाकी मंदिरों के प्रबंधन और श्रीराम मंदिर प्रबंधन में अंतर यह है कि वहां गड़बड़ी की जानकारी मिलते ही तुरंत कार्रवाई की गई। उसे बचाने, ढंकने की कोशिश नहीं की गई और न ही इसे मंदिर प्रबंधन पर कब्जे की कोशिशों से जोड़कर देखा गया। चिंता की बात यह है कि मंदिर प्रबंधन में बदलाव की मांग में भी मंदिर के सुप्रबंधन की बुनियादी अपेक्षा यानी व्यक्ति की नैतिक ईमानदारी, आचरण की पवित्रता, सत्यनिष्ठा और लोक मर्यादा की बात कहीं नहीं की जा रही है, अगर यही सद्गुण प्रबल रहें तो व्यवस्था की शुचिता स्वत: कायम रहेगी।
– लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं।
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