दिव्य चिंतन::जब सामूहिक हत्याकांड के आरोपी स्वीकार्य हैं, तो सवाल उठाने वाले का बलिदान अस्वीकार्य क्यों ? -हरीश मिश्र
आलेख
हरीश मिश्र
जिस बिहार ने मसखरे को नायक बनाया, जिस बिहार ने पति के स्थान पर पत्नी को सत्ता का वारिस स्वीकार किया, जिस बिहार ने विरासत की राजनीति के कारण अस्वस्थ स्वास्थ्य मंत्री तक को स्वीकार कर लिया, जिस बिहार ने सामूहिक हत्याकांड के आरोपों से घिरे व्यक्ति को सम्राट के रूप में स्वीकार कर लिया।
उसी बिहार में यदि कोई युवा सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और जनसमस्याओं की बात करता है, तो कुछ कलमकारों की लेखनी में अचानक नैतिकता का ज्वार उमड़ पड़ता है।
आश्चर्य होता है कि जिन लोगों को सामूहिक हत्याकांड के आरोपियों का नेतृत्व स्वीकार करने में कभी संकोच नहीं हुआ, वे आज भरत तिवारी के बलिदान और उसके पीछे खड़े जनभावों से असहज दिखाई देते हैं।
लोकतंत्र में जनता ही अंतिम निर्णायक होती है। यदि जनता किसी बलिदानी की चिता में अपना दर्द, अपनी उपेक्षा और अपने संघर्ष का प्रतिबिंब देख रही है, तो उसका कद कुछ अखबार के स्तंभकार या किसी कलम की स्याही से नहीं, बल्कि जनसमर्थन से तय होगा।
भरत तिवारी का महिमामंडन नहीं हो रहा है…दरअसल उन प्रश्नों को स्वर दिया जा रहा है जिन्हें वर्षों से अनसुना किया गया। यदि जनहित की बात करना, सत्ता से सवाल पूछना और जनता के साथ खड़ा होना अपराध है, तो ऐसा अपराध तो लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भी किया था।
कलम का धर्म बलिदान को छोटा-बड़ा करना नहीं, बल्कि सत्ता को आईना दिखाना है। यदि कुछ कलमकार सत्ता से प्रश्न पूछने के बजाय प्रश्न पूछने वालों को कठघरे में खड़ा करने लगे, तो वह अपना मूल दायित्व ही भूल जाती है।
सवाल आज भी वही है…
जब आरोपी स्वीकार्य हैं, तो सवाल पूछने वाला बलिदानी अस्वीकार क्यों ?
लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं।