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नाम भले ‘काॅकरोच’ हो, लेकिन एप्रोच में संजीदा होना होगा..अजय बोकिल 

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आलेख

अजय बोकिल 

दो सवाल देश में समानांतर तैर रहे हैं। पहला तो सोशल मीडिया जनित ‘काॅकरोच जनता पार्टी’ का एक राजनीतिक दल और उसके द्वारा प्रणीत काॅकरोच आंदोलन का भविष्य क्या है और दूसरा, विपक्षी इंडिया अलायंस नई परिस्थितियों में क्या नए सिरे से दम मारेगा या फिर यह भी एक प्रतिपक्ष की खानापूर्ति ही है? ताजा घटनाक्रम में भाजपा और मोदी सरकार के लिए चिंता का विषय यह है कि भले ही देश में मुख्य धारा की राजनीतिक पार्टियां काॅकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के साथ अभी खुलकर नहीं आई हैं, ‍लेकिन दिल्ली में इंडिया गठबंधन की 7 वीं बैठक में शामिल 23 पार्टियों ने सीजेपी की उस मांग को दोहराया है, जिसमें नीट पेपर लीक घोटाले में केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की बात कही गई है। यह भी संभव है कि काॅकरोच आंदोलन अपनी वर्चुअल सीमा को लांघ कर एक्चुअल में बदल जाए तो विपक्षी दल उसके साथ खुलकर आ जाएं। कुछ दल तो इसे अभी भी नैतिक समर्थन दे रहे हैं। धर्मेन्द्र प्रधान पर ‘इंडिया अलायंस’ के स्टैंड से मोदी सरकार पर कुछ दबाव तो बनेगा, बावजूद इस सच्चाई के कि बीजेपी में नैतिक आधार पर इस्तीफे नहीं होते। जिसे मंत्रिमंडल से बाहर करना होता है, वह किसी फेरबदल में एक झटके में बाहर कर ‍दिया जाता है। जाहिर है कि धर्मेन्द्र प्रधान के कामकाज को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का क्या आकलन है, यह तभी पता चलेगा, जब केन्द्रीय मंत्रिमंडल में बहुप्रतीक्षित विस्तार या फेरबदल होगा। धर्मेन्द्र प्रधान खुद इ्स्तीफा नहीं देंगे। यह भी संभव है कि उन्हें शिक्षा मंत्रालय से हटाकर किसी दूसरे विभाग में भेज दिया जाए। जहां तक शिक्षा क्षेत्र में संघ का एजेंडा लागू करने की बात है तो धर्मेन्द्र प्रधान यह काम पूरी निष्ठा से कर रहे हैं, लेकिन उनके कार्यकाल में प्रवेश और बोर्ड परीक्षाअों की पवित्रता पर जिस ढंग से दाग लग रहे हैं, उससे विभाग पर उनकी पकड़ और परफार्मेंस पर सवालिया निशान लग रहे हैं। इस स्थिति को पीएम भी अफोर्ड शायद ही कर पाएं। क्योंकि इससे भारत के साथ-साथ विदेशों में भी हमारी‍ शिक्षा प्रणाली की साख को संदेह की निगाह से देखा जाने लगा है।

अब सवाल सीजेपी (काॅजपा) का। सीजेपी के संयोजक अभिजीत दिपके ने अमेरिका से लौटते ही 6 जून को जंतर मंतर पर अपने कुछ साथियों के साथ प्रदर्शन किया। उनकी मुख्य मांग भी धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा ही है। दिपके ने अल्टीमेटम दिया है कि अगर एक हफ्‍ते के भीतर प्रधान का त्यागपत्र न हुआ तो वो अपने आंदोलन को देशभर में फैलाएंगे। दिपके नीट परीक्षा में पेपर लीक के साथ-साथ बेरोजगारी, महंगाई और भ्रष्टाचार जैसे स्थायी मुद्दे भी उठा रहे हैं, जिनसे आज का युवा परेशान है। जमीनी स्तर पर इस आंदोलन से भारत में युवा खासकर जेन जी कितनी तादाद में जुड़ेंगे, यह अभी देखने की बात है। बकौल दिपके सोशल मीडिया पर उनके 40 लाख से ज्यादा फाॅलोअर बन चुके हैं और 2 लाख से अधिक युवाअोंने सीजेपी की सदस्यता के लिए नाम रजिस्टर कराया है।

सरकार भी सीजेपी के इस उभार और गतिविधि को बहुत चौकस नजरों से देख रही है। क्योंकि यह आंदोलन पारंपरिक राजनीति करने वालों को कितना हिट करेगा अथवा कितना सपोर्ट करेगा, इसका आकलन आसान नहीं है। दूसरे, अगर इस आंदोलन ने सचमुच विराट रूप ले लिया तो विश्व में जनआंदोलनों के इतिहास का यह नया अध्‍याय होगा, जिसकी एक झलक हम नेपाल और श्रीलंका में देख चुके हैं। फिलहाल सचाई यह है कि इस काॅकरोच आंदोलन को लेकर लोकतंत्र के दोनो प्रमुख घटक सत्तापक्ष और विपक्ष दोनो ही चौकन्ने हैं। सरकार को डर है कि अगर यह मुहिम युवाअोंके जनआंदोलन में बदलने लगी तो सत्ता में बने रहने की जुगत और विकास का रोड मैप ही बदलना पड़ेगा। हालांकि सरकार अभी इस आंदोलन की गंभीरता, गहराई और व्यापकता को समझने की कोशिश कर रही है, इसलिए उस पर कोई रोक नहीं लगाई गई है। जबकि कई विपक्षी दलों और खासकर कांग्रेस में चिंता इस बात की है कि आंदोलन का परोक्ष उद्देश्य देश में कांग्रेस और राहुल गांधी की सुधरती छवि को ‘डेंट’ करना है। राहुल भक्तों की राय में राहुल गांधी के कमजोर होने का मतलब समूचे विपक्ष का कमजोर होना है। वाम और आप के कुछ नेताअोंतथा सिविल सोसाइटी के कुछ लोगों ने काॅकरोच आंदोलन को अपना समर्थन इस उम्मीद में दिया है कि युवा मन के आक्रोश की यह चिंगारी देर-सवेर ज्वाला बनकर धधकेगी, ‍जिसका इस्तेमाल केन्द्र में सत्तारूढ़ मोदी सरकार को बेदखल करने में किया जा सकता है। हालांकि डर उनके मन में भी है कि काॅकरोच आंदोलन को यह सपोर्ट कहीं भस्मासुर न बन जाए। बहुत से कांग्रेसी इसकी तुलना दिल्ली में भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाए गए अन्ना आंदोलन से कर रहे हैं, जिसे बाद में भाजपा हाई जैक कर लिया जबकि दिल्ली में उसकी राजनीतिक फसल आम आदमी पार्टी ने काट ली। इस सोच में यह शंका भी निहित है कि इस आंदोलन से युवाअो की मांगे पूरी हों न हों, लेकिन यह काॅकरोच पार्टी कांग्रेस जैसे दल की राजनीतिक पूंजी को ही चट न कर जाए। जहां तक काॅकरोच जनता पार्टी के एक जनआंदोलन में बदलने की संभावना का सवाल है तो इसमे वक्त लगेगा। भले ही इसके प्रणेता अभिजीत दिपके ने कहा हो कि वो इस आंदोलन को सभी गांव-शहरों तक ले जाएंगे। लेकिन बगैर किसी स्पष्ट विचारधारा और उद्देश्य, वैकल्पिक विचार, दूरगामी लक्ष्य, प्रभावी संगठन और समर्पित कार्यकताअों की फौज के बगैर कोई आंदोलन किसी क्रांतिकारी सैलाब में तब्दील नहीं हो सकता। वैसे भी उच्च शिक्षा के लिए प्रवेश परीक्षा में गड़बड़ी से प्रभावित युवाअों का एक सीमित वर्ग है। बेरोजगारी और भ्रष्टाचार जरूर ऐसा मुद्दा हो सकता है, जो लाखों युवाअों को जोड़े। लेकिन भारत में भ्रष्टाचार का विरोध अमूमन तभी तक होता है, जब तक कि दूसरों को इसका मौका न मिले। वैसे भी राजनीतिक आंदोलन कोई टीवी रिमोट कंट्रोल का बटन नहीं है, कि जब चाहा चैनल बदल दिया। जेन जी की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि उसमें सातत्य की कमी है। वह बहुत ज्यादा जल्दी में दिखती है और बहुत तेजी से आगे बढ़ना चाहती है। किसी एक मु‍द्दे, विचार, पसंद या आग्रह पर धैर्य के साथ टिके रहना और उसके लिए संघर्ष करने की फितरत उसमें अपवादस्वरूप ही देखने को मिलती है। ज्यादा दूर क्यों जाएं, शादी की बारात में कानफोड़ू शोर के साथ बेतरतीब नाचते युवा किसी एक गाने पर भी दो घड़ी टिकना नहीं चाहते। बुद्धि से कुशाग्रतर होने के बाद भी आचरण में एक सतहीपन और काॅकटेल सोच उनकी जिंदगी पर तारी है, जो जज्बात से लेकर जीवन के हर व्यवहार में साफ झलकता है।

ऐसे में पारंपारिक राजनीतिक औजारों के बगैर महज काॅकरोच मानसिकता के साथ कोई देशव्यापी आंदोलन खड़ा करना बेहद कठिन है। फिलहाल जो संवेग बना है, उसे मजबूत करने और गति देने के लिए दिपके को संगठन का पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा करना होगा। आंदोलन की दीर्घकालिक योजना बनानी होगी। अगर ऐसा होता है तो संभव है कि पारंपरिक राजनीतिक दल भी उसमें शामिल हो जाएं। यानी नाम भले ही काॅकरोच हो, लेकिन एप्रोच में उसे संजीदा यानी बिज्जू (हनी बैजर) की तरह होना होगा। ऐसा हो सका तो यकीनन सरकारों और कई राजनीतिक पार्टियों की मुश्किलें बढ़ेंगी।

लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं।

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