– सांवरी शास.एकीकृत माध्य. शाला में शिक्षा नहीं,बदहाली और जोखिम की पढ़ाई
असलम खान सिराली हरदा
शिक्षा विभाग की बेरुखी और मुखिया की बेपरवाही से खतरे में 90 बच्चों का भविष्य शिक्षा के मंदिर में जब छत टपकती हो, दीवारे भरभराकर गिरती हो और शिक्षक खुद बैठने की जगह तलाशते हों, तो समझिए यह भारत का कोई आम सरकारी स्कूल है खिड़कियां ब्लॉक ग्राम पंचायत सांवरी शास.एकीकृत माध्य.शाला इसी बदहाली की जीवंत मिसाल है, जहा पढ़ाई का हाल भगवान भरोसे है और जिम्मेदार अफसर एआई की परछाई में अपनी कुर्सियां चमका रहे हैं कहते हैं शिक्षा से ही भविष्य का निर्माण होता है, मगर सांवरी विद्यालय को देखकर तो लगता है कि यहां ‘भविष्य’ खुद स्कूल से भागकर जंगल में जा छिपा है खिड़कियां विकासखंड के इस विद्यालय में बच्चों की संख्या 90 है, लेकिन सुविधाएं ऐसी कि कोई झोपड़ी भी शर्म से पानी-पानी हो जाए।

विद्यालय में एक शिक्षक हैं, जिनमें से दो अतिथि शिक्षक पुरुष एक महिला एक ही कमरे में 30 विषयों की नौटंकी रोज सुबह 10 बजे से शाम तक करती हैं। गणित से विज्ञान, सामाजिक विज्ञान से हिंदी सब एक ही सांस में पढ़ा देने की जादुई कला शायद सिर्फ शिक्षा विभाग के इन्हीं विद्यालयों में देखने को मिलती है। दो कमरे हैं, जिसमें से एक को गोदाम,ऑफिस, कबाड़खाना बना दिया गया है, एक कमरे की छत इतनी दयनीय है कि हर बूंदाबांदी पर अपने ‘विलीन होने’ की धमकी देती है
शिक्षा के मंदिर में टपकती छत
ग्राम पंचायत सांवरी एकीकृत शासकीय माध्यमिक शाला में एक बड़ा हादसा होते-होते टल गया, जब कक्षा की छत भर भराकर गिर गई। उस वक्त कक्षा में बच्चे और शिक्षक मौजूद नहीं थे, गनीमत रही कि कोई जान नहीं गई, लेकिन यह घटना एक बड़ा इशारा थी कि हालात अब बेकाबू हो चले हैं। फिर भी अफसरों की जमीर की नींद अब तक नहीं टूटी। जब एक ओर शिक्षा विभाग में फर्जी बिल, भ्रष्टाचार और ऊपरी कमाई के मामलों की जांच हो रही है, वहीं दूसरी ओर जमीनी स्तर पर विद्यालय की हालत यह बता रही है कि पैसा कहां जा रहा है और क्यों नहीं आ रहा है जहां जरूरत है। कागज, पर स्मार्ट क्लास, जमीन पर टूटी खिड़की और उखड़े हुए फर्श यही है इस सिस्टम की असलियत।

जवाब एआई में खोजे जा रहे हैं
यह सबसे अहम सवाल है कि अगर किसी दिन भवन की छत गिरती है और कोई मासूम बच्चा हादसे का शिकार होता है,तो उसका जिम्मेदार कौन होगा? कलेक्टर, शिक्षा अधिकारी, स्थानीय जनप्रतिनिधि? जवाब शायद वही लोग देंगे जो आज एलाई सिस्टम में फीडबैक देखकर निश्चिंत हैं कि सब कुछ ठीक है। यह हकीकत नहीं, अफसोस है कि जमीनी हक़ीक़त को नजरअंदाज कर रिपोर्ट कार्ड में ‘अति उत्तम’ की मोहर लगा दी जाती है। शिक्षा विभाग और जिला प्रशासन को अब सांवरी जैसे विद्यालयों की तरफ झांकना ही नहीं, बल्कि तत्कालीन कार्रवाई करनी होगी। केवल गोष्ठियों, बैठकों और योजनाओं से न तो छत की टपकन रुकेगी, न ही बच्चों को शिक्षा की रोशनी मिलेगी