सद्गुरू कबीर-धनीधर्मदास साहब वंश प्रणाली के शाखा वंश गुरू बालापीर घासीदास साहेब की311 वां स्मृति दिवस पर विशेष
30,31 जनवरी और 01फरवरी2026को तीन दिवसीय गुरू बालापीर घासीदास साहेब के तपोस्थली ग्राम बंगोली(जिला रायपुर) में सत्तसंग समारोह माघी पून्नी मेला का आयोजन
सुरेन्द्र जैन रायपुर
कबीर साहब के उपदेशों से प्रभावित धनीधर्मदास साहब के विशेष आग्रह पर मध्यप्रदेश के बांधवगढ़ में सद्गुरु कबीर साहेब का संवत 1520में प्रथम आगमन हुआ। धनीधर्मदास साहब वर्षों तक सद्गुरु कबीर साहब के सानिध्य में ज्ञान प्राप्त करते रहे;इस दौरान संवत् 1538 में वचनवंश मुक्तामणिनाम साहब का अवतरण हुआ, इन्हें चुरामणिनाम से भी प्रसिद्धि मिलीऔरसंवत्1570 में मुक्तामणि उर्फ चुरामणिनाम साहेब को एक बड़ा सत्तसंग समारोह में वंश बयालीस(कबीर-पंथ)की स्थापना करते हुए प्रथम वंशाचार्य के रूप में गुरूगद्दी सौंपा गया ।इसी वंश परंपरा के चौथे वंशाचार्य प्रमोद गुरू बालापीर साहेब के साथ उनके छःभाई ,उनकी मां सहित सात सौ श्रद्धालुओं की जमात संवत्1756 में रतनपुर से रायपुर जिला बंगोली गांव आये थे,तब गांव से आधा किलोमीटर दूर एक सूखा तालाब के पार मेॅ आम,बेल और बरगद सहित अनेक पेड़ों की छाया में पूरे जमात सहित डेरा डाला गया।
**सूखा तालाब से समान तालाब नामकरण तक की कहानी**
पेंडों की घनी छाया में पूरा जमात आराम से विश्राम कर रहे थे तब प्रमोद गुरू साहेब अन्न-जल की ब्यवस्था के लिए उपाय बना रहे रहे थे।अचानक साहेब अपने आसन से उठे पान(परवाना)फूूल,सुपारी और एक मोहर लेकर सूखे तालाब के बीचोंबीच पूर्व दिशा की ओर मुंह करके कुछ अर्जी किए बैठकर साहेब बंदगी साहेब किए फिर जमातियों से बोले जाओ जहां पान-परवाना रखा है खुदाई करो।लोग खुदाई किए बहुत कम प्रयास से ही जलस्त्रोत फूट पड़ा कुछ ही देर में पूरा तालाब स्वच्छ निर्मल और स्वादिष्ट जल से लबालब हो गया।लोगों ने जल पीकर शांति महसूस किया। फिर जलावन इकट्ठा किया गया।भोजन पकाने में लगे भंडारी ताज्जुब करने लगे भोजन के बर्तन छोटा था मुश्किल से पांच-सात लोगों का ही पेट भर पाता परन्तु पके भोजन से भरे पात्र को श्वेत वस्त्र से ढंककर साहेब ने अंजूरी भर जल लेकर सुमरण कर आचमन किया और पंगत लगी सबने भर पेट भोजन किया ।भरपूर भंडार रहा।गर्मी का मौसम था लोग त्रृप्त होकर विश्राम करने लगे,घने पेड की छांव और दोपहर भर तालाब के निर्मल जल से होकर आने वाली हवा लोगों में विश्राम के दौर में भरपूर उर्जा का संचार कर रहा था। इस गर्मी भरी दोपहरी बीतते में बंगोली के लोग देखे कि मवेशी(भैंस-भैंसा) हर रोज सूखा-सूखा,मटमैलीकिचड से लथपथ गर्मी से ब्याकुल लहकते हुए आते थे पर आज गीला कीचड साफ है पानी देह से टपक रहा है। लोग अपनी उत्सुकतावश सूखा तालाब की ओर दौडे, देखा तालाब स्वच्छ जल से लबालब है और इतने सारे लोग तालाब पार में बडे आराम से आनंदमय विश्राम कर रहे हैं। बात मालगुजार तक गई।मालगुजार अपने को रोक नहीं पाए चल पडे तालाब की ओर।इस भीड में मालगुजार की नजर माताजी और उनके ईर्द-गिर्द सात नौजवानों पर टिक गई।माताजी को प्रणाम कर सातो नौजवानों की ओर मुखातिब होकर हाथ जोडे विनित भाव से मालगुजार बोले -‘आप लोग इतने सारे लोगों के साथ कौन हैं?कहां से और किस प्रयोजन से आए हैं?’एक साथ बोल गए।साहेब प्रमोद गुरू बडे विनम्र भाव से रतनपुर से आने और अपने कबीर पंथ प्रचार लिए आगमन की सारी बातें विस्तार पूर्वक बताई। साहेब की वाणी से मालगुजार बहुत प्रभावित हुए। हाथ जोड़कर मालगुजार ने कहा-यहां रहिए आप सभी का पूरा इंतजाम हो जाएगा। मालगुजार के बातों से साहेब प्रसन्न हुए। आग्रह स्वीकार किए। बंगोली में रहने का इंतजाम हो गया।जमात के कुछ लोग आसपास के गांव में बस गये।

हर साल क्वांर दशहरा से सातों भाई अपनी जमात लेकर अलग-अलग दिशा में निकल पडते पंथ प्रचार करते और ज्येष्ठ मास के गंगादशहरा तक लौट कर चौमासा (वर्षा-ऋतु)बंगोली में बिताते थे।
यह क्रम सात साल ही चल पाया था कि प्रमोदगुरू साहेब के श्वेत चौकन्ना घोड़ा की खबर रायपुर के हैहयवंशी राजा को लग गई। यहां यह बताना लाजिम होगा कि इसी चौकन्ना घोड़ा को रतनपुर के तत्कालीन राजा ने साहेब से छीन लेने के लिए साहेब के साथ प्राणघातक षड्यंत्र किया था।साहेब प्रमोदगुरू ने षड्यंत्रकारी राजा के राज्य क्षेत्र में नहीं रहने का निर्णय लेकर ही निकल गए थे तब बंगोली को निवास बनाया था।
रायपुर के राजा ने सैनिकों को आदेश देकर भेजा था कि घोड़ा मोल में दे तो ठीक नहीं तो छीन कर ले आना है।ऐसा सजग घोड़ा राजा के घुड़साल में शोभा देगा। साहेब उदास मन से घोड़ा के पीठ पर हाथ फेरा घोड़ा हिनहिना कर अपने मालिक के प्रति कृतज्ञता प्रगट किया।साहेब घोड़ा को परवाना देकर सैनिकों के हवाले कर दिये।
घोड़ा साहेब से विलगाव बर्दाश्त नहीं कर पाया और राजा के मुख्य द्वार के अन्दर जीवित प्रवेश करने से इंकार कर दिया।जोर से चिंघाड कर हंसा शरीर छोड़कर साहेब के शरणागत हो गया।इस घोड़े की समाधी रायपुर महादेव घाट में आज भी मौजूद है।
इधर साहेब प्रमोद गुरू फिर एकबार निर्दयी राजा के राज्य क्षेत्र में निवास करने से इंकार करते हुए बंगोली छोड़ने का संकल्प लेकर यात्रा की तैयारी करने लगे।
तब घासीदास साहेब ने बंगोली को ही अपने पंथ प्रचार का केन्द्र बनाकर काम करने के लिए अग्रज प्रमोदगुरूसाहेब से आज्ञा प्राप्त कर लिया।माताजी घासीदास साहेब से विशेष लगाव रखती थी सो उन्होंने भी बंगोली में ही रहने का निर्णय सुना दिया।
बंगोली से अपने जमातियों के साथ पंथ प्रचार करते प्रमोदगुरू साहेब दिल्ली तक गए।अपने चमत्कारों से दिल्ली के तत्कालीन नवाब को प्रभावित किया और नवाब ने उन्हें बालापीर की पदवी से नवाजा। इसी नवाब ने साहेब को हिरा-जवाहरात जडित ताज और शेली भेंट किया। अपना प्रतिनिधि नियुक्त करने मुहर(सील) साहेब के श्री चरणों में दान दिया था।इस तरह प्रमोदगुरू प्रचार के दौरान विभिन्न चमत्कार करते मंडला में समाधि लेने तक निवास किए।
इधर बंगोली में माताजी और संतों के साथ घासीदास साहेब लोगों के बीच कबीर साहेब के वाणी वचनों खूब जोर-शोर से प्रचार करते गये। अपने क्रांतिकारी प्रचार शैली के कारण इनका राजे रजवाडे और जमींदार और उनके पुरोहितों से टकराव की स्थिति बन ही जाती थी। बावजूद इसके पुरोहित पंडित और जमींदार सम्मान भी करते और इर्ष्या भाव के कारण इनके पीठ-पीछे नीचा दिखाने षड्यंत्र भी रचते रहते थे।

एक बार आस-पास गांव के मालगुजार और पुरोहित-पंडितों ने गुपचुप ढंग से प्रचार कर दिया कि बंगोली में संत घासीदास साहेब ने भोजन भंडारा का आयोजन किया है।सभी को भंडारा में भोजन का आनंद लेने का निमंत्रण दे दिए गए। लोग इकट्ठा होने लगे।उस दिन आश्रम में मात्र पांच संत और माताजी तथा घासीदास साहेब कुल सात मुर्ति(लोग)का ही भोजन भंडार बना था।साहेब के शुभचिंतक समझ गए, उनमें एक आगन्तुक ने जाकर घासीदास साहेब को पूरा माजरा बता दिया। साहेब समझ गए लोग क्यों आ रहे हैं?घासीदास साहेब ने प्रमोदगुरू बालापीर साहेब का अनुकरण किया। रसोई में पके भोजन श्वेत वस्त्र से ढंककर समान तालाब के जल अंजुरी भर लेकर भोग मंत्र सुमरण कर आचमन किए फिर भंडारा शुरूआत करने आदेश हुआ। भंडारा शुरू हुआ, लोग आते गए भोजन-प्रसाद पाकर तृप्त भाव से लौटते गए। सिलसिलेवार दिनभर भंडारा चला,पूरा भंडारा भरपूर रहा।षड्यंत्रकारी कहने लगे पूरा भंडार इसी तालाब में समाया है।इस तरह सूखा तालाब समान तालाब नाम से प्रसिद्ध हुआ है।आज भी लोग इसी विचार से प्रेरित होकर समान तालाब में स्नान कर लोटा में जल और उसमें चांवल भीगा कर घासीदास साहेब के समाधि में चढाते हैं।अपने घरों के भरपूर भंडार की कामना करते हैं।

शिलास्त्रोत कुंड और ठुंठीमाता भी श्रद्धा का प्रमुख केन्द्र है बंगोली में
पंथश्रीगुरू बालापीर घासीदास साहेब का देहत्याग और समाधि क्रिया की अद्भुत कहानी प्रचलित है।समान तालाब इसलिए भी समान कहलाता है कि यहां एक ही घाट में सभी जाति के लोग समान रूप से बिना भेदभाव के स्नान करते थे। इस तालाब का जल 35 वर्ष पहले तक इतना निर्मल था,छाती भर जल में कोई वस्तु पडा रहे वह साफ-साफ दिखता था, गांव में कुंआ या हेंडपंप नहीं था तब लोगों के लिए यही तालाब पेयजल का एकमात्र स्रोत था।परन्तु अब गांव की गंदी राजनीति का शिकार यह तालाब पंचायत द्वारा मछली पालन के लिए ठेका(लीज)में दे दिया जाता है,बहुत तरह के केमिकल डालकर जल दूषित हो जाता है।कबीरपंथी समाज कलेक्टर, मंत्री,विधायक और जिला पंचायत, जनपद पंचायत और ग्राम पंचायत के प्रतिनिधियों को निवेदन-पत्र देकर इस तालाब को जो कबीरपंथियों का श्रद्धा का केन्द्र है,इसे मत्स्य पालन एवं आखेट से मुक्त रखा जाने का प्रस्ताव निवेदन कर लिए हैं परन्तु निवेदन अनसूनी ही की जा रही है। इस मामले में कबीरपंथी समाज बहुत उपेक्षित है और आहत होकर अपमान का दंश झेलने मजबूर हैं।खैर,सद्गुरू की जब कृपा होगी सभी जन प्रतिनिधियों को प्रेरणा मिलेगी इस आशा में यह बात यहीं रोकते हैं।

इसी समान तालाब में घासीदास साहेब नीत सबेरे एक बड़ा शिलाखंड पर बैठकर स्नान करते थे।लोग इस शिलाखंड को प्रणाम करके साहेब के प्रति श्रद्धा प्रकट करते थे।इसपर कोई पैर नहीं रखते थे।
एक दिन अद्भुत घटना हुआ। घासीदास साहेब रोज की तरह सुबह तालाब स्नान करने पहुंचे तब देखते हैं कोई स्त्री केश फैलाए उसी शिलाखंड पर बैठी है जिस पर साहेब स्नान करते हैं। घासीदास साहेब बडे विनम्र और सम्मानपूर्वक बोले ‘देवी आप कौन हो,इतने सबेरे क्या कर रही हो….?’साहेब अपनी दुविधा पूरी कह पाते इसके पहले स्त्री जोरदार अट्टहास करते मुडकर साहेब की ओर चेहरा की बड़ी-बड़ी आंखें, इन्द्रधनुषी भौंह और चौड़ी ललाट, लालिमा युक्त गाल,बिखरे काले बाल,बोली-‘मेरा परिचय पूछता है,देख अपने हाथ में मैं कौन हूं…समझ…’साहेब हाथ में देखे
फफोला झलझला रहा है।समझते देर नहीं लगी।साक्षात देवी प्रकट हुइ हैं।साहेब बोले -‘देवी प्रणाम!मुझसे भूल हुई,क्षमादान करिए।आपको मैं आपके धाम हिंगलाज सादर मान करते पहुंचाऊंगा। इस क्षेत्र के गांवों के रहवासी बहुत सरल,भले मानुष हैं,परेशान हो जाएंगे।इस क्षेत्र के गांवों को अपने कोपभाजन से मुक्त रखिए’ ऐसा निवेदन कर घर पहुंच कर अपनी मां से घासीदास साहेब निवदेन पूर्वक बोले-‘मां मैं हिंगलाजधाम जा रहा हूं,तीन दिन लगेंगे ।आप मेरे ठाठ(शरीर)का ध्यान रखना।मेरे कक्ष के संकल तीन दिन मत खोलना।’ कहकर चले गये।

यहां योग क्रिया में शरीर छोड़कर जाना मतलब मृत्यु नहीं है।
अपितु योगी सुक्ष्म शरीर को योग क्रिया के माध्यम से स्थूल शरीर को कई दिनों सुरक्षित रख सकते हैं। घासीदास साहेब हिंगलाज धाम चले गये। दूसरे दिन प्रमोद गुरूबालापीर साहेब रम्मत करते बंगोली पहुंचे थे।प्रमोदगुरू साहेब ने मां से पूछा-‘मां घासीदास कहां है ?’ तब मां ने सारा किस्सा कह सुनाई।मां के मना करने पर भी नहीं माने और घासीदास साहेब के कक्ष का दरवाजा खोल दिए। बोले-‘हंस निकल गया है।ठाठ निर्जीव पडा है।’ अपने जमातियों और गांव के लोगों से मिलकर समान तालाब के पार में पीपल पेड के पास समाधी दे दी गई।

योग क्रिया के जानकार बताते हैं कि सुक्ष्म शरीरधारी जिसे जब अपनी इच्छानुसार स्थूल शरीर सदृश दिखते हैं और उद्देश्य पूर्ति पश्चात अन्तर्ध्यान हो जाते हैं।घासीदास साहेब तीन दिन बाद मां को दर्शन दिए और ठाठ को सुरक्षित नहीं रख पाने के लिए नाराजगी जताते हुए कहा-‘प्रमोदगुरू साहेब पुरूष हैं,बडे भाई हैं,पर आप तो मां हैं,थोडी जिद्द करतीं तो मान जाते।आपका दिल भी पत्थर सा हो गया था।’ इतना कहकर अन्तर्ध्यान हो गये।
बड़े-बुजुर्ग बताते थे कि मां जडवत हो गई थी,न हिलती न डूलती,न किसी से कोई बातचीत, बस बिना पलक झपकाए एकटक देखते रहती।जडवत पत्थर सी हो गई थी।
सुक्ष्म शरीरधारी घासीदास साहेब अपनी समाधि तक गये,बताते हैं दूसरे दिन से ही समाधि बीचोंबीच फटी है ,आजतक फटी है,अनेक प्रयास के बाद भी समाधि का वह भाग बंद नहीं होता है।

समाधि के पूर्व दिशा में एक नक्काशीदार शिलाखंड स्थित है।इसी के पास बैठकर घासीदास साहेब अपने भक्तों को ज्ञान वाणी लखाया करते थे।इस शिलाखंड से पूर्व दिशा में एक किलोमीटर दूरी पर एक कुंड है।इसी कुंड के पास घासीदास साहेब ने एक भक्त को दर्शन दिया था।और आशिर्वाद देकर कहा था कि -‘तुम अपनी गर्भवती बेटी से होने वाली संतान का नाम घासीदास रखना उसके माध्यम से मुझे इस क्षेत्र में जो काम अधूरा रह गया है उसे पूरा करना है,मैं 18साल बाद उस बालक से छाता पहाड़ में दर्शन देकर सत्यनाम लखाऊंगा ,मनुष्यों के बीच परस्पर भेदभाव फैलाया गया है इसे मिटाना है,कबीर साहेब के सत्य दर्शन का पूरा ज्ञान कराना है।’ बाद में सतनाम पंथ इसी बालक शरीर के माध्यम से स्थापना हुई है।कबीर-पंथ की तरह सत्तनाम पंथ में भी गुरूगद्दी और वंश परंपरा प्रचलित है।चौका-आरती में निर्गुण भजन छत्तीसगढी बोली मेॅ गाकर जन-जन को विषय-वासना से मुक्त जीवन जीने प्रेरित किया जाता है।