रिपोर्ट – धीरज जॉनसन, दमोह
दमोह शहर से लगभग 9 किमी दूर ग्राम करैया भदोली में मंदिर परिसर में लगे औषधीय गुणों और धार्मिक महत्व के सिंदूर के पेड़ में लाल रंग के फल दिखाई देने लगे है इन फलियों के दाने पीस कर सिंदूर बनाया जाता है। प्राकृतिक तरीके से प्राप्त सिंदूर के औषधीय फायदे बहुत हैं। प्राकृतिक सिंदूर ना तो पानी में घुलता है और ना अपना रंग छोड़ता है।इसे बोलचाल की भाषा में कमीला का पेड़ भी कहते है, अंग्रेजी में इसे लिपस्टिक ट्री कहते हैं, क्योंकि लिपस्टिक बनाने में सिंदूर के पेड़ की फलियों के बीजों का प्रयोग भी किया जाता है।
वैसे तो सिंदूर का पेड़ पहाड़ों में ज्यादा होता है किंतु मंदिरों धर्म स्थलों और मैदानी क्षेत्रों में भी सिंदूर के पेड़ उगाए जाने लगे हैं। सौंदर्य प्रसाधन की अनेक चीजें सिंदूर के बीजों से बनती है।कहा जाता है कि इस फल से सिंदूर से लेकर बाल रंगने में, नेल पॉलिश, साबुन एवं पेंट में भी इसका उपयोग किया जाता है। लाल स्याही बनाने में भी इसका इस्तेमाल किया जाता है। अर्जुन पटेल ने बताया कि मंदिर परिसर और खेत में भी इसे लगाया है,इससे शोभा बढ़ती है फलों को पकने के बाद तोड़ा जाता है सूखने के बाद फिर पीसा जाता है।

“इसका वानस्पतिक नाम बीक्सा ओरोलेना है,इसमें प्राकृतिक लाल रंग इसके फल के बीज कोश से निकला जाता है, जो आदिम जनजाति के लोगो द्वारा बाल, चेहरा और शरीर को रंगने में किया जाता था। साथ ही खाद्य पदार्थो को रंगने में भी किया जाता है, क्योंकि इससे स्वाद में कोई परिवर्तन नहीं होता है और किसी प्रकार से नुकसान भी नही करता है।मुख्य रूप से नॉर्दन साउथ अमेरिका का पौधा है, भारत में इसको सिंदूर कहा जाता है,एक प्राकृतिक सिंदूर के रूप में प्रचलन में है”
डॉ एन आर सुमन विभागाध्यक्ष : बॉटनी
पी जी कॉलेज, दमोह