प्रतिबंध के बावजूद खेतों में धधक रही पराली, हाईवे-18 के आसपास कई गांवों में खुलेआम जलाए जा रहे फसल अवशेष
सेमरा, अंबाड़ी, बेरखेड़ी, नरखेड़ा से लेकर सरार और बालमपुर तक खेतों में उठ रहीं आग की लपटें
सुबह-शाम धुएं से घिर रहा क्षेत्र; पर्यावरण और मिट्टी की उर्वरा शक्ति को हो रहा नुकसान
जिम्मेदार विभागों की निगरानी पर उठे सवाल
मुकेश साहू दीवानगंज रायसेन
खेतों में फसल कटाई के बाद बचने वाली पराली जलाने पर प्रतिबंध के बावजूद क्षेत्र में किसान खुलेआम नियमों की अनदेखी कर रहे हैं। भोपाल-विदिशा स्टेट हाईवे-18 के आसपास स्थित कई गांवों में रोजाना खेतों में आग लगाकर फसल अवशेष जलाए जा रहे हैं। रात और सुबह के समय खेतों से आग की ऊंची लपटें उठती दिखाई देती हैं, वहीं धुएं के घने गुबार आसपास के गांवों और हाईवे तक फैल रहे हैं। इससे क्षेत्र में वायु प्रदूषण बढ़ रहा है और सुबह के समय लोगों को सांस लेने में भी परेशानी हो रही है। हैरानी की बात यह है कि प्रशासन द्वारा रोक लगाए जाने के बावजूद पराली जलाने की घटनाओं पर प्रभावी अंकुश नहीं लग पा रहा है।
सेमरा, अंबाड़ी, बेरखेड़ी चौराहा, छोला, कौसाखेड़ी, नरखेड़ा और सरार सहित कई गांवों के खेतों में पराली जलती दिखाई दे रही है। वहीं सरार से लेकर बालमपुर बेरखेड़ी चौराहे तक कई स्थानों पर खेतों में आग लगाकर फसल अवशेष नष्ट किए जा रहे हैं। हाईवे 18 से लगे गांवों में भी खेतों से आग की लपटें उठती नजर आईं। हाईवे से गुजरने वाले वाहन चालक और स्थानीय रहवासी भी खेतों में जलती परली फैलते धुएं को देख रहे हैं। इसके बावजूद संबंधित विभागों की ओर से मौके पर पहुंचकर कार्रवाई होती नजर नहीं आ रही है।

प्रतिबंध कागजों तक सीमित, खेतों में धधक रही पराली
प्रशासन ने जनसामान्य के हित, सार्वजनिक संपत्ति, पर्यावरण और लोक व्यवस्था बनाए रखने के उद्देश्य से पराली जलाने पर प्रतिबंध लगाया है। इसका मुख्य उद्देश्य वायु प्रदूषण रोकना, पर्यावरण संरक्षण करना और मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखना है। लेकिन क्षेत्र में प्रतिबंध का असर जमीन पर दिखाई नहीं दे रहा है। किसान अपनी सुविधा के लिए खेतों में आग लगाकर डंठलों और पराली को जला देते हैं, जिससे कुछ ही समय में खेत साफ हो जाता है। हालांकि यह तरीका खेती और पर्यावरण दोनों के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है।
कृषि विशेषज्ञों के अनुसार फसल अवशेषों को जलाने के बजाय एकत्र कर जैविक खाद तैयार की जा सकती है। पराली का उपयोग भू-नाडेप और वर्मी कंपोस्ट बनाने में किया जा सकता है। इसके अलावा कल्टीवेटर, रोटावेटर और डिस्क हैरो की मदद से फसल अवशेषों को खेत की मिट्टी में मिलाकर जैविक पदार्थ बढ़ाया जा सकता है। ट्राइकोडर्मा आधारित जैविक अपघटक का उपयोग भी फसल अवशेषों को जल्दी सड़ाकर खाद बनाने में सहायक हो सकता है। वहीं बेलर मशीन से नरवाई को गठ्ठरों में बांधकर कम जगह में संग्रहित किया जा सकता है, जिसका उपयोग पशुचारे और अन्य जरूरतों में किया जा सकता है। कुछ स्थानों पर पराली से कप-प्लेट और चटाई जैसी उपयोगी वस्तुएं भी बनाई जा रही हैं।
जिम्मेदार विभाग कब करेंगे कार्रवाई?
क्षेत्र में लगातार सामने आ रही पराली जलाने की घटनाओं ने प्रशासनिक निगरानी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जब भोपाल-विदिशा हाईवे-18 के आसपास ही खुलेआम खेतों में आग लगाई जा रही है तो जिम्मेदार विभागों की नजर इस ओर क्यों नहीं पड़ रही है? स्थानीय लोगों ने मांग की है कि राजस्व, कृषि और पंचायत विभाग की टीमें गांवों में नियमित निगरानी करें। किसानों को फसल अवशेषों के उचित प्रबंधन के लिए जागरूक किया जाए और प्रतिबंध का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाए, ताकि पर्यावरण और खेती को हो रहे नुकसान पर रोक लग सके।