सागर। निर्यापक मुनि श्री अभय सागर जी महाराज ने मुनिसुब्रतनाथ जिनालय, किष्किंधा नगर में प्रवचन देते हुए कहा कि किसी भी ऊंचे निर्माण की मजबूती उसकी नींव पर निर्भर करती है। नींव कमजोर होने पर ऊंचाई स्थिरता की गारंटी नहीं दे सकती। इसी प्रकार जीवन में भी विश्वास, आस्था और संस्कार मजबूत नींव का काम करते हैं।
महाराज श्री ने भगवान श्रीराम के आदर्श जीवन का उदाहरण देते हुए कहा कि राजपाट मिलने की बेला में भी उन्होंने पिता की आज्ञा का पालन करते हुए वनवास स्वीकार किया। माता सीता ने भी अपने पति के साथ वन गमन किया। भगवान श्रीराम का जीवन हमें त्याग, मर्यादा, कर्तव्य और आज्ञापालन की प्रेरणा देता है।
उन्होंने रामसेतु निर्माण का प्रसंग सुनाते हुए बताया कि दृढ़ संकल्प और सामूहिक प्रयास से कठिन से कठिन कार्य भी संभव हो सकता है। गिलहरी के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य में योगदान छोटा या बड़ा नहीं होता, बल्कि सच्ची भावना महत्वपूर्ण होती है। मनुष्य को दूसरों के जीवन को संवारने वाला बनना चाहिए, बिगाड़ने वाला नहीं।
मुनि श्री गरिष्ठ सागर महाराज ने कहा कि मनुष्य की तृष्णा कभी समाप्त नहीं होती। जिस प्रकार अग्नि में घी डालने से वह और बढ़ती है, उसी प्रकार इच्छाएं भी बढ़ती जाती हैं। उन्होंने कहा कि जीवन का कल्याण संग्रह करने से नहीं, बल्कि देने की भावना विकसित करने से होता है। मनुष्य को अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति के बाद शेष संपत्ति का सदुपयोग और दान करना चाहिए। साधु-संतों की संगति से जीवन में सकारात्मक परिवर्तन आता है और व्यक्ति धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है।