नीलकण्ठ तुम नीले रहियो…
श्री शिव के स्वरूप से जुड़ी लोकमान्यता, रावण-वध के पर्व पर शुभ शकुन की कामना और विलुप्त होती जैव विविधता की चिंता
कमल याज्ञवल्क्य रायसेन
आज दशहरा पर्व पर भोर होते ही रायसेन जिला सहित सम्पूर्ण मध्यप्रदेश में शहरों और गांवों में नीलकण्ठ महाराज के दर्शनों के लिए नागरिक उत्सुक हैं, उत्सुकता का यह क्रम शाम तक चलने वाला है और परंपरा के अनुसार सभी की इच्छा होती है कि कहीं भी नीलकण्ठ के दर्शन हो जाए तो वर्ष भर की निश्चिन्तता हो जाए क्योंकि, भारतीय संस्कृति केवल पर्वों और त्योहारों का उत्सव नहीं है, बल्कि यह प्रकृति, प्राणी जगत, आध्यात्मिक चेतना और मानवीय जीवन-मूल्यों के बीच स्थापित आत्मीय संबंधों की सनातन अभिव्यक्ति भी है। हमारी परंपराओं में वृक्षों, नदियों, पर्वतों और पशु-पक्षियों तक में ईश्वरीय चेतना का अनुभव किया गया है। यही कारण है कि भारतीय लोकजीवन में अनेक पक्षियों का दर्शन शुभता, सौभाग्य और मंगलमय भविष्य की कामना से जुड़ा हुआ है। इन्हीं में एक विशेष स्थान है – नीलकण्ठ पक्षी का, जिसके दर्शन विजयादशमी के पावन पर्व पर शुभ शकुन माने जाते हैं।
नीलकण्ठ: नाम में शिव, स्वरूप में प्रकृति की अद्भुत छटा
नीले आकाश की आभा से मिलता-जुलता आकर्षक रंग, शांत भाव-भंगिमा और विशिष्ट उड़ान वाला नीलकण्ठ पक्षी भारतीय जनमानस में लंबे समय से श्रद्धा और कौतूहल का केंद्र रहा है। इसे अंग्रेजी में Indian Roller कहा जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Coracias benghalensis है।
नीलकण्ठ नाम का स्मरण होते ही भगवान् शिव के उस दिव्य स्वरूप की छवि उभरती है, जिन्होंने समुद्र मंथन से निकले हलाहल विष को अपने कण्ठ में धारण कर सृष्टि की रक्षा की थी। विषपान के कारण उनका कण्ठ नीला पड़ गया और वे नीलकण्ठ कहलाए। यह पौराणिक प्रसंग त्याग, लोककल्याण, धैर्य और संकट को अपने ऊपर लेकर संसार की रक्षा करने का महान संदेश देता है। यद्यपि नीलकण्ठ पक्षी और भगवान् शिव के पौराणिक स्वरूप के बीच संबंध मुख्यतः नाम, प्रतीकात्मकता और लोकपरंपरा के माध्यम से व्यक्त होता है, फिर भी इस संबंध ने नीलकण्ठ पक्षी को भारतीय सांस्कृतिक चेतना में विशिष्ट स्थान प्रदान किया है।
विजयादशमी पर नीलकण्ठ दर्शन की लोकमान्यता
आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को मनाया जाने वाला विजयादशमी अथवा दशहरा पर्व अधर्म पर धर्म, असत्य पर सत्य और अहंकार पर मर्यादा की विजय का महापर्व है। भगवान् श्रीराम द्वारा रावण पर विजय की स्मृति और शक्ति-उपासना की पूर्णता से जुड़ा यह पर्व भारतीय समाज में नए संकल्प, शुभारंभ और विजय की कामना का प्रतीक है।
नीलकण्ठ दर्शन की लोक परंपरा
दशहरा पर नीलकण्ठ पक्षी के दर्शन की लोकपरंपरा भी विशेष महत्त्व रखती है। ग्रामीण अंचलों में ऐसी मान्यता है कि विजयादशमी पर नीलकण्ठ महाराज के दर्शन हो जाएं तो वर्ष भर के कार्यों में शुभता और सफलता का आशीर्वाद प्राप्त होता है। अनेक लोग इसे भगवान् शिव की कृपा तथा आने वाले समय के मंगलमय होने का संकेत मानते हैं।
दर्शन की उत्सुकता
दशहरे की सुबह से ही गांवों में एक विशेष उत्सुकता दिखाई देती है। लोग घरों से निकलकर खेतों की मेड़ों, बगीचों, पुराने वृक्षों और जंगलों के किनारों तक पहुंचते हैं। उनकी दृष्टि पेड़ों की डालियों और खुले आकाश में उड़ते पक्षियों को तलाशती रहती है। कहीं बच्चे अपने बड़ों से पूछते हैं—“नीलकण्ठ महाराज के दर्शन हुए क्या?” तो कहीं बुजुर्ग अपनी स्मृतियों में उन दिनों को खोजते हैं, जब यह सुंदर पक्षी गांवों के आसपास सहज ही दिखाई दे जाता था।
नीलकण्ठ के दर्शन हो जाने पर श्रद्धालुओं के चेहरों पर प्रसन्नता छा जाती है। वे इसे शुभ शकुन मानकर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। यह लोकविश्वास हमारी सांस्कृतिक विरासत का हिस्सा है, जिसे समझने के लिए आस्था के साथ-साथ उसके सामाजिक और प्राकृतिक संदर्भों को भी जानना आवश्यक है।
जब शुभ शकुन के दर्शन ही होने लगें दुर्लभ
समय के साथ परिस्थितियां बदल रही हैं। अनेक क्षेत्रों में लोगों को नीलकण्ठ पहले की तुलना में कम दिखाई देने की बात भी नागरिक कह रहे है। कभी खेतों, खुले मैदानों, गांवों के आसपास और बिजली के तारों अथवा वृक्षों पर बैठा दिखाई देने वाला यह पक्षी अब कुछ स्थानों पर खोजने पर ही बमुश्किल नजर आता है।
खुले प्राकृतिक क्षेत्रों का सिकुड़ना, पुराने वृक्षों की कटाई, घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों की कमी, कीटों की उपलब्धता में बदलाव और कृषि में रसायनों का अत्यधिक उपयोग अनेक पक्षियों के जीवन को प्रभावित कर सकते हैं। नीलकण्ठ भी अपने प्राकृतिक आवास, भोजन और प्रजनन के लिए अनुकूल परिस्थितियों पर निर्भर करता है।
लोक आस्था से प्रकृति संरक्षण तक
विजयादशमी पर नीलकण्ठ दर्शन की परंपरा को इसी व्यापक दृष्टिकोण से समझने की आवश्यकता है। यदि हम इस पक्षी को शुभता का प्रतीक मानते हैं, तो उसके जीवन और प्राकृतिक आवास को सुरक्षित रखना भी हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी होनी चाहिए।इसके लिए गांवों और खेतों के आसपास पुराने वृक्षों का संरक्षण, स्थानीय प्रजातियों के पौधों का रोपण, कीटनाशकों का विवेकपूर्ण उपयोग, प्राकृतिक घोंसलों और सुरक्षित बसेरों की रक्षा तथा बच्चों और युवाओं में पक्षियों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करना उपयोगी हो सकते हैं।
विजयादशमी का संदेश: बाहर भी विजय, भीतर भी विजय
दशहरा पर्व पर एक और संकल्प लेने की आवश्यकता है—प्रकृति के प्रति अपनी उदासीनता पर विजय का संकल्प।यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियां भी विजयादशमी की सुबह अपने गांवों में नीलकण्ठ के सुंदर दर्शन कर सकें, तो हमें ऐसे प्राकृतिक परिवेश को बचाना होगा, जिसमें यह पक्षी सहज रूप से रह सके। केवल पर्व के दिन उसकी खोज करना पर्याप्त नहीं; वर्ष के प्रत्येक दिन उसके आवास, भोजन और जीवन की रक्षा के लिए संवेदनशील रहना आवश्यक है।
लोकमान्यता हमें शुभता की आशा देती है और प्रकृति हमें जीवन का आधार। जब ये दोनों एक-दूसरे के पूरक बनते हैं, तभी हमारी सांस्कृतिक परंपराएं अपने वास्तविक अर्थ में जीवंत रहती हैं।
विजयादशमी पर नीलकण्ठ महाराज के दर्शन की कामना भारतीय लोकजीवन की एक सुंदर सांस्कृतिक परंपरा है। यह हमें भगवान् शिव के नीलकण्ठ स्वरूप का स्मरण कराती है, शुभता की आशा जगाती है और प्रकृति के साथ हमारे आत्मीय संबंधों को पुनः जीवंत करती है।