“रजिस्ट्री होगी या कल बेदखली का डर? उदयपुरा-देवरी में स्वामित्व योजना के बीच वन-राजस्व रिकॉर्ड का पेंच”
स्वामित्व योजना की ‘रजिस्ट्री’ पर वन विभाग का साया! उदयपुरा-देवरी के सीमावर्ती गांवों में दोहरी प्रविष्टि का पेंच, भविष्य में बेदखली का डर
वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार दीक्षित ने उठाया सवाल—पुराने वन रिकॉर्ड और नए आबादी क्षेत्र के बीच फंसे ग्रामीणों के लिए संयुक्त सीमांकन जरूरी
रायसेन/उदयपुरा। ग्रामीण आबादी को उनके मकान और भूखंड का मालिकाना हक दिलाने के उद्देश्य से संचालित स्वामित्व (SVAMITVA) योजना को लेकर रायसेन जिले की उदयपुरा तहसील और देवरी वन क्षेत्र से लगे कुछ गांवों में कानूनी पेच का मुद्दा सामने आया है। ग्रामीणों को संपत्ति कार्ड मिलने की उम्मीद है, लेकिन राजस्व और वन रिकॉर्ड में जमीन की स्थिति को लेकर स्पष्टता नहीं होने पर भविष्य में विवाद की आशंका जताई जा रही है।
भारत सरकार के पंचायती राज मंत्रालय के अनुसार SVAMITVA योजना के तहत ग्रामीण आबादी क्षेत्रों का सर्वेक्षण और मैपिंग कर संपत्ति कार्ड तैयार किए जाते हैं।
इसी प्रक्रिया को लेकर वरिष्ठ अधिवक्ता सुनील कुमार दीक्षित ने प्रशासन के समक्ष कुछ महत्वपूर्ण कानूनी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि जंगल से सटे गांवों में किसी भी संपत्ति का अंतिम रिकॉर्ड तैयार करने से पहले यह स्पष्ट होना चाहिए कि संबंधित भूमि राजस्व रिकॉर्ड में आबादी है या वन रिकॉर्ड में उसका स्वरूप अलग दर्ज है।
पुराने वन रिकॉर्ड और नए आबादी क्षेत्र के बीच विवाद
अधिवक्ता दीक्षित के मुताबिक, सीमावर्ती गांवों में कई परिवार लंबे समय से मकान बनाकर रह रहे हैं। समय के साथ ग्रामीण आबादी बढ़ी और राजस्व रिकॉर्ड में आबादी क्षेत्र का विस्तार भी किया गया। अब इसी क्षेत्र में स्वामित्व योजना के तहत सर्वे और संपत्ति कार्ड की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है।
उनका सवाल है कि यदि किसी जमीन का पुराना रिकॉर्ड वन भूमि से संबंधित है और बाद में उसे राजस्व रिकॉर्ड में आबादी क्षेत्र के रूप में दर्ज किया गया है, तो संपत्ति कार्ड जारी करने से पहले दोनों विभागों के रिकॉर्ड का विधिवत मिलान होना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के टी.एन. गोदावर्मन मामले से जुड़े न्यायिक आदेशों में वन की अवधारणा और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज वन भूमि को लेकर व्यापक संरक्षण संबंधी सिद्धांतों की चर्चा हुई है। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि वन भूमि के गैर-वानिकी उपयोग से जुड़े मामलों में वैधानिक प्रक्रिया और सक्षम अनुमति महत्वपूर्ण है।
हालांकि, उदयपुरा-देवरी के संबंधित गांवों में कौन-सा खसरा वास्तव में किस श्रेणी में आता है, इसका अंतिम निष्कर्ष संबंधित राजस्व एवं वन रिकॉर्ड तथा सक्षम प्रशासनिक/न्यायिक प्रक्रिया से ही तय होगा।
13 दिसंबर 2005 की तारीख क्यों महत्वपूर्ण?
अधिवक्ता दीक्षित ने वन अधिकार अधिनियम, 2006 यानी FRA के प्रावधानों को भी समाधान के संभावित रास्ते के रूप में बताया है।
केंद्रीय जनजातीय कार्य मंत्रालय के अनुसार वन अधिकार अधिनियम वन-निवासी अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के आजीविका, निवास और अन्य पारंपरिक अधिकारों को मान्यता देने का प्रावधान करता है।
इसी आधार पर अधिवक्ता का सुझाव है कि जहां पात्र ग्रामीणों के वन अधिकार कानून के तहत अधिकार बनते हों, वहां निर्धारित वैधानिक प्रक्रिया के तहत उनके दावों का परीक्षण किया जाए। हालांकि, केवल किसी जमीन पर लंबे समय से मकान होने से स्वतः वन अधिकार या मालिकाना हक स्थापित नहीं हो जाता; पात्रता और अधिकार का निर्धारण कानून में निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही होगा।
अंतिम संपत्ति कार्ड से पहले हो संयुक्त सीमांकन
अधिवक्ता दीक्षित का सबसे प्रमुख सुझाव है कि स्वामित्व योजना के तहत अंतिम रिकॉर्ड जारी करने से पहले राजस्व और वन विभाग का संयुक्त सीमांकन एवं रिकॉर्ड सत्यापन कराया जाए।
उनका कहना है कि इससे यह स्पष्ट हो सकेगा कि कौन-सी भूमि निर्विवाद राजस्व आबादी है।कौन-सी भूमि वन रिकॉर्ड में दर्ज है।
किन खसरों में राजस्व और वन विभाग की दोहरी प्रविष्टि है।
किन परिवारों के पुराने कब्जे या निवास से जुड़े वैधानिक अधिकारों का परीक्षण आवश्यक है।
उनके अनुसार इस प्रक्रिया के बाद ही संपत्ति कार्ड जारी करने से भविष्य में होने वाले विवादों को काफी हद तक रोका जा सकता है।
डूब क्षेत्र और जल निकायों को लेकर भी सावधानी
अधिवक्ता दीक्षित ने स्वामित्व योजना के सर्वे में नदी, नाले, तालाब और संभावित बाढ़/डूब क्षेत्र को अलग से चिह्नित करने का सुझाव दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी मामले में सार्वजनिक उपयोग के तालाब और जल निकायों के संरक्षण पर जोर दिया था। बाद के न्यायिक निर्णयों में भी इस सिद्धांत का उल्लेख हुआ है।
इसी आधार पर उनका सुझाव है कि ड्रोन सर्वे के साथ संबंधित विभागों के रिकॉर्ड और तकनीकी रिपोर्ट का भी मिलान किया जाए, ताकि प्राकृतिक जल निकायों या सार्वजनिक उपयोग की भूमि को गलती से निजी आबादी में शामिल न किया जाए।
गांवों के आंतरिक रास्तों का भी हो रिकॉर्ड
अधिवक्ता ने ग्रामीण बस्तियों के आंतरिक रास्तों को लेकर भी प्रशासन का ध्यान आकर्षित किया है। उनका कहना है कि केवल वर्तमान भौतिक कब्जे के आधार पर नक्शा तैयार करने से भविष्य में रास्तों की चौड़ाई और उपयोग को लेकर विवाद पैदा हो सकते हैं।
उनके अनुसार ग्रामों के सार्वजनिक रास्तों, नालियों और आवश्यक सार्वजनिक सुविधाओं के लिए पर्याप्त स्थान सुनिश्चित करने के बाद ही अंतिम रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए।
प्रशासन के सामने तीन प्रमुख सुझाव
अधिवक्ता सुनील कुमार दीक्षित ने स्वामित्व योजना की प्रक्रिया में मुख्य रूप से तीन बिंदुओं पर ध्यान देने की मांग की है—
1. वन-राजस्व रिकॉर्ड का संयुक्त सत्यापन:
नारंगी भूमि अथवा अन्य विवादित श्रेणी की भूमि में दोहरी प्रविष्टियों की पहचान कर विभागीय स्तर पर उनका वैधानिक निराकरण किया जाए।
2. जल निकाय और डूब क्षेत्र अलग किए जाएं:
नदी, नाले, तालाब तथा सार्वजनिक जल संसाधनों की भूमि को आबादी रिकॉर्ड से अलग रखने के लिए संबंधित विभागों की तकनीकी रिपोर्ट ली जाए।
3. आंतरिक रास्तों का संरक्षण:
गांवों के सार्वजनिक रास्तों की वर्तमान और भविष्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए उनका रिकॉर्ड और सीमांकन स्पष्ट किया जाए।
सवाल संपत्ति कार्ड का नहीं, स्थायी मालिकाना हक का
स्वामित्व योजना का उद्देश्य ग्रामीण आबादी में संपत्ति संबंधी रिकॉर्ड को स्पष्ट करना और संपत्ति कार्ड के माध्यम से ग्रामीणों को अधिकार संबंधी दस्तावेज उपलब्ध कराना है।
ऐसे में उदयपुरा-देवरी के वन सीमावर्ती गांवों में उठाया गया सवाल केवल संपत्ति कार्ड जारी करने की प्रक्रिया तक सीमित नहीं है। असली मुद्दा यह है कि जिन ग्रामीणों को वर्षों बाद अपने मकान का दस्तावेज मिलने जा रहा है, उसका आधार सभी संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में स्पष्ट और कानूनी रूप से टिकाऊ हो।
अधिवक्ता दीक्षित का सुझाव है कि अंतिम प्रकाशन और संपत्ति कार्ड जारी करने से पहले राजस्व तथा वन विभाग संयुक्त रूप से रिकॉर्ड और मौके का सत्यापन करें। इससे पात्र ग्रामीणों को भविष्य के विवादों से सुरक्षा मिल सकती है और प्रशासन के लिए भी रिकॉर्ड अधिक स्पष्ट हो सकता है।
नोट: इस रिपोर्ट में वन भूमि, दोहरी प्रविष्टि, पुराने गजट रिकॉर्ड और संबंधित गांवों की वास्तविक स्थिति से जुड़े दावे अधिवक्ता सुनील कुमार दीक्षित द्वारा व्यक्त विधिक मत/दावे के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं। संबंधित खसरों की वास्तविक कानूनी स्थिति का अंतिम निर्धारण सक्षम राजस्व/वन प्राधिकारी अथवा न्यायालय के रिकॉर्ड से ही होगा।