आलेख
सुरेंद्र जैन
जैन धर्म ओर पत्रकारिता का संबंध अनादिकाल से चला आ रहा है जब न अखबार थे न चेनल न सोशल मीडिया ओर न ही विज्ञान था तब जैन धर्म था जो एक सच्चे पत्रकार की भूमिका का निर्वहन करते हुए प्राणी मात्र को सत्य की राह दिखा रहा था
इस सत्य को एक उदाहरण के माध्यम से समझा जा सकता है जब संसार में विज्ञान नहीं था अखबार चेनल सोशल मीडिया ओर पत्रकार नहीं थे तब से जैन धर्म इस सत्य को बता रहा कि एक बूंद बिना छने हुए जल में 34850 सूक्ष्म जीव होते हैं उन सूक्ष्म जीवों की हमे रक्षा करना चाहिए कुआँ का जल निकालकर इतनी सावधानी से मोटे लट्ठे के कपड़े के छनने से छाने जिससे एक भी सूक्ष्म जीव जिस बर्तन में पानी छान रहे उसमें न जाए ओर उस बर्तन के बाहर भी आसपास न गिरे पानी छानने के बाद छनने के ऊपर का जल जिस बाल्टी से पानी खींचकर कुंआ से लाये उसी बाल्टी में डालें और फिर छनने को उल्टा करके थोड़ा छना पानी डालें ताकि जितने भी सूक्ष्म जीव हैं वो बाल्टी में आ जाएं इसके बाद सावधानी पूर्वक कड़े वाली बाल्टी के कड़े में रस्सी उलझाकर उन जीवों को नीचे कुआं के जल में छोड़े अर्थात जैन धर्म पानी में असंख्य सूक्ष्म जीवों का सत्य अनादिकाल से बताता रहा है यानी जो दिखाई भी नहीं देते उन जीवों की रक्षा करना भी जैन धर्म सिखाता रहा जैन धर्म के अनुयायी उस समय कहीं भी अन्यत्र जाते थे तो एक लोटा एक छनना सदैव साथ में रखते थे ताकि जब भी पानी पीना हो तुरंत छानकर पानी पीएं
इसके साथ ही इस सत्य को भी जैन धर्म ने अनादिकाल से बताया कि पानी छानने के बाद सिर्फ कुछ समय तक ही शुद्ध रहता है इसके बाद उसमें पुनः जीवोत्पत्ति हो जाती है इसके लिए यदि उस छने जल को उबालकर उसमें लोग डाली जाए तो जल के शुद्ध रहने की समयावधि ओर बढ़ जाती है
जैन धर्म के सिद्धांतों को जीवन में आत्मसात करने वाले जैन उस जमाने में जब छानकर पानी पीते थे और कही यात्रा पर जाते समय रस्ते में अपने पास रखे छनने से पानी छानकर पीते थे तो लोग खिल्ली उड़ाते थे वो देखो जैन छानकर पानी पी रहा क्योंकि वह खिल्ली उड़ाने वाले लोग पानी में मौजूद असंख्य सूक्ष्म जीवों का सत्य नहीं जानते थे
जब विज्ञान आया ओर जैन पानी छानकर क्यों पीते हैं क्या वास्तव में जैन धर्म में कोई है बात सत्य है इसे सूक्ष्म दर्शी से देखा गया तो अनछने पानी में सूक्ष्म जीवों की मौजूदगी को सही पाते हुए फिल्टर चले पानी मशीनो से फिल्टर होने लगा लेकिन जैन धर्म फिल्टर किए पानी की जगह आज भी अपने प्राचीन सिद्धांत पर ही चलता है पानी आज भी लट्ठे मोटे ऐसे कपड़े से छाना जाता है जिसमें सूर्य की किरणें भी पार न हों ओर पानी छानने के बाद आज भी जैन मंदिरों में कुआं में बिलछानी डाली जाती है मतलब असंख्य सूक्ष्म जीवों की रक्षा की जाती है फिल्टर किया हुआ पानी में तो असंख्य सूक्ष्म जीव मरते हैं उनकी हिंसा होती है और उनकी एक तरह से लाशों को निचोड़ा हुआ जल पीते हैं लोग तो फिर स्वस्थ्य कैसे रहेंगे
जैन धर्म पानी को छानकर पीने की इस प्रक्रिया के माध्यम से भी असंख्य जीवों के कल्याण का सत्य दिखाया ओर आज यदि हम देखें तो इस सत्य को पानी पीने वाले प्रत्येक प्राणी के चाहे वह मनुष्य हो या कोई भी सभी के स्वास्थ्य के लिए जरूरी है यानी जिस सत्य को आज के चेनल अखबार सोशल मीडिया या दुनिया की कोई भी शक्ति विज्ञान तक नहीं दिखा पाया था उस सत्य को जैन धर्म अनादिकाल से दिखाया है और यह सत्य प्राणिमात्र के कल्याण के लिए दिखाया एक तरफ आप पानी सावधानी से छानकर असंख्य सूक्ष्म जीवों की रक्षा करेंगे तो दूसरी तरफ आप भी स्वच्छ जल पीकर स्वस्थ्य रहेंगे
चलिए पानी के बाद भोजन पर आते हैं तो अनादिकाल से जैन धर्म शाकाहारी भोजन ओर सूर्यास्त के 48 मिनट पहले तक ही भोजन करने का सत्य बताया है सूर्यास्त के बाद चारों प्रकार के आहार जिसमें पानी भोजन सब सामिल है कुछ भी सेवन नहीं करना यह जैन धर्म बताया ओर अनादिकाल से जैन धर्म के अनुयायी इस सत्य के मार्ग पर चल रहे आज भी भले ही कुछ राह से भटके हुए लेकिन सच्चे जैन आज भी इसी सत्य के मार्ग को अपनाकर स्वास्थ्य हैं
जिस सत्य को जैन धर्म अनादिकाल से बताता रहा उस सत्य को आज विज्ञान भी मान रहा है शोध हो चुके कि सूर्यास्त के पहले तक ही भोजन करने ओर रात्रि में कुछ भी नहीं खाने पीने से इंसान स्वास्थ्य रहता है साथ ही जैन धर्म के व्रत उपवास जिन्हें करना आज के समय बहुत कठिन है क्योंकि जैन धर्म के उपवास में एक उपवास करने में प्रक्रिया तीन दिन की रहती है
यदि आपका कल उपवास है तो आज संध्या सूर्यास्त के पहले तक आप भोजन आदि कर लें अच्छे से मुंह साफ कर लें और फिर आपको कुछ नहीं लेना है दूसरे दिन सुबह उठकर स्नान कर सीधे मंदिर जी में पूजन पाठ करना संध्या आरती करना फिर तीसरे दिन जब पूजन करके मंदिर से वापस आओगे तब आप उपवास खोलोगे इतना कठिन है जैन धर्म में उपवास ओर आज भी जैन समाज के युवक युवतियां बुजुर्ग माता बहीन दशलक्षण पर्व में दस दिन तक इस तरह के कठिन उपवास करते हैं जो उन्हें धर्म की आराधना के साथ स्वास्थ्य लाभ प्रदान करते हैं
विज्ञान भी अब उपवास को लेकर मानने लगा कि जिस बीमारी का कोई इलाज नहीं उस पर भी उपवास नियंत्रण करता है अर्थात जैन धर्म स्वस्थ्य दीर्घायु जीवन जीने का सत्य भी उस समय से बता रहा जब न विज्ञान था न अखबार या न्यूज चेनल थे एक तरह से प्राणी मात्र के कल्याण का सत्य जैन धर्म पत्रकार के रूप में बताता रहा यह बात अलग है कि अधिकांश लोगों ने उस समय नहीं माना लेकिन आज जब उसी को सिद्ध करके विज्ञान बता रहा तब लोग सत्य मान रहे यदि जैन धर्म के इस सत्य के मार्ग पर चलते तो तरह तरह की बीमारियों से सदैव दूर रहते
पत्रकारिता का उद्देश्य भी जन कल्याण हो
जिस तरह जैन धर्म अनादिकाल से सिर्फ मानव जाति के लिए ही नहीं अपितु प्रत्येक प्राणी के कल्याण का सत्य बताता रहा है उसी तरह पत्रकारिता का उद्देश्य भी जनकल्याण होना चाहिए न कि लोभ लालच में भ्रम ओर असत्य फैलाना भारत ही नहीं अपितु संसार के हर प्राणी का कल्याण हो ऐसे सत्य को प्रगट करना चाहिए जनता को भयभीत करने वाली डरा डराकर मारने वाली खबरें कभी प्रकाशित नहीं करनी चाहिए
नारद मुनि ओर संजय की भूमिका निभाएं
पत्रकारिता में आवश्यकता है कि उस सत्य को प्रदर्शित करें जिससे जनता अनभिज्ञ है जैसे प्राचीनकाल में नारद मुनि एक तरह से प्रिंट मीडिया की तरह सत्य से सभी को अवगत कराते थे लेकिन चाहे देवलोक हो या पृथ्वी लोक कहीं कोई उनसे नफरत नहीं करता था वह सत्य प्रगट कर सभी का कल्याण करते थे और महाभारत काल में संजय राजा धृत राष्ट्र को आंखों देखा हाल सुनाते थे अर्थात इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भूमिका निभाते थे और वास्तविक सत्य से अवगत कराते थे यदि संजय के बताए सत्य के बाद राजा धृतराष्ट्र मोह माया लोभ लालच आदि को त्याग कर सत्य अहिंसा का मार्ग अपनाते तो कौरवों का वंश कभी समाप्त नहीं होता
पत्रकारिता जनकल्याण ओर देशोन्नति के लिए जैन धर्म ओर नारद मुनि व संजय की तरह सत्य प्रस्तुत करने वाली होनी चाहिए
हाल ही में छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में जैन पत्रकारों के राष्ट्रीय अधिवेशन महा तपस्वी आचार्यश्री विद्यासागर जी महामुनिराज के परम प्रभावक शिष्य पूज्य मुनिश्री आगम सागर जी मुनिश्री पुनीत सागर जी ने भी समाज के पत्रकारों को जनकल्याण के लिए सत्य प्रस्तुत करने पर जोर दिया
अब सवाल आज की पत्रकारिता से
अनादिकाल से जैन धर्म ने जिस तरह प्राणिमात्र के कल्याण की सच्चाई बताई प्राणिमात्र के कल्याण की भावना भाई सूक्ष्म से सूक्ष्म जीवों की भी रक्षा करना सिखाया ओर नारद मुनि एवं महाभारत काल में संजय ने जिस तरह धृतराष्ट्र को सत्य दिखाया क्या आज की पत्रकारिता वैसी है
क्या आज के तमाम पत्रकार चाहे वह इलेक्ट्रॉनिक मीडिया से हों या प्रिंट मीडिया से हों या सोशल मीडिया से हों क्या वह पत्रकारिता में जनकल्याण प्राणिमात्र के कल्याण के लिए सत्य को अपने कलम कैमरा से प्रगट कर रहे यदि नहीं तो क्यों फिर ऐसी पत्रकारिता किस काम की जो प्राणिमात्र का कल्याण न कर पाए ओर उन्हें सत्य के रास्ते से भ्रमित करें।
– लेखक सुरेंद्र जैन रायपुर धरसींवा के वरिष्ठ पत्रकार हे