सागर । निर्यापक मुनि श्री अभय सागर महाराज ने क्षमा धर्म पर कहा कि सार्वजनिक जीवन में वाणी, व्यवहार या मानसिक चेष्टा से जाने-अनजाने किसी को कष्ट पहुंच सकता है। छोटी-सी बात भी कभी-कभी लंबे समय तक शत्रुता का कारण बन जाती है। इसलिए जीवन की समय-समय पर ‘सर्विसिंग’ आवश्यक है, जैसे वाहन की नियमित सर्विसिंग की जाती है, वैसे ही मन, वचन और कर्म की भी समीक्षा और शुद्धि करनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि क्षमावाणी केवल औपचारिकता न रह जाए। जिनसे अतीत में मनमुटाव हुआ हो, विशेषकर परिवार के सदस्यों से, उनके पास जाकर हृदय से क्षमा मांगना चाहिए। सच्ची क्षमा वही है, जिसमें मन से बैरभाव समाप्त हो और एक-दूसरे के प्रति सद्भाव उत्पन्न हो। उन्होंने कहा कि क्षमा मांगने से अंतरंग के परिणाम निर्मल होते हैं और आत्मा को शांति मिलती है।
मुनि श्री प्रभात सागर महाराज ने कहा कि क्षमा से धर्म की शुरुआत होती है और क्षमा के भाव से ही जीवन में अन्य धर्मों का प्रवेश होता है। केवल सोशल मीडिया या व्हाट्सऐप पर क्षमा मांग लेना पर्याप्त नहीं है। जिनसे वास्तविक जीवन में मनमुटाव है, उनसे व्यक्तिगत रूप से मिलकर क्षमा मांगने पर ही क्षमावाणी की सार्थकता है।
मुनि श्री चंद्र सागर महाराज ने दस लक्षण धर्म के समापन के अवसर पर ज्ञान की महत्ता बताते हुए कहा कि ज्ञान का अर्जन करने के साथ उसका दान भी करना चाहिए। उन्होंने आचार्य ज्ञानसागर महाराज के कठिन परिश्रम और स्वाध्याय का उल्लेख करते हुए कहा कि साधना और ज्ञान के लिए निरंतर पुरुषार्थ आवश्यक है। जीवन में टेढ़ापन रहेगा तो जीवन की यात्रा बाधित होती है, जबकि सरलता और सीधेपन से जीवन सहज बनता है। गृहस्थ जीवन में संतोष अत्यंत महत्वपूर्ण है। उन्होंने संतोष को गृहस्थ जीवन का आधार बताते हुए कहा कि संतोष के साथ ब्रह्मचर्य आदि व्रतों का पालन सहजता से किया जा सकता है।