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संस्कृत गौरव दिवस समारोह का हुआ शुभारंभ

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– संस्कृत में विज्ञान’ विषय पर विद्वानों ने प्रस्तुत किए शोध-पत्र, संस्कृत ग्रंथों में वर्णित वैज्ञानिक एवं पुरातात्विक तथ्यों पर हुआ मंथन

विदिशा। मध्यप्रदेश कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन द्वारा प्रतिवर्ष आयोजित संस्कृत गौरव दिवस समारोह का शुभारंभ बुधवार को सम्राट अशोक अभियांत्रिकी महाविद्यालय, विदिशा में हुआ। दो दिवसीय समारोह में ‘संस्कृत में विज्ञान’ विषय पर केंद्रित शोध-पत्रों का वाचन एवं विद्वानों के व्याख्यान आयोजित किए जा रहे हैं। आयोजन 2 एवं 3 सितंबर को किया जा रहा है।

कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री पुरातत्ववेत्ता नारायण व्यास ने की। उन्होंने कहा कि पुरातात्विक अनुसंधान के दौरान संस्कृत ग्रंथों में वर्णित तथ्यों एवं साक्ष्यों को आधार बनाकर अनेक स्थलों का अध्ययन किया गया और ग्रंथों में उपलब्ध सामग्री अनेक अवसरों पर सही एवं सटीक पाई गई। उन्होंने कहा कि महाकवि कालिदास ने अपने ग्रंथों, विशेषकर मेघदूत में विदिशा तथा दशार्ण प्रदेश का जो ऐतिहासिक एवं भौगोलिक वर्णन किया है, वह पुरातात्विक साक्ष्यों से भी काफी हद तक पुष्ट होता है। विदिशा को दशार्ण प्रदेश की राजधानी के रूप में वर्णित किए जाने की ऐतिहासिक महत्ता पर भी उन्होंने प्रकाश डाला।

विशिष्ट अतिथि राजीव गांधी प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति प्रो. आलोक शर्मा ने संस्कृत में विज्ञान विषय पर आयोजित शोध संगोष्ठी की सराहना की। उन्होंने संस्कृत की वैज्ञानिक एवं ज्ञानपरक परंपरा पर विचार व्यक्त करते हुए आदि शंकराचार्य से जुड़े संस्मरण भी साझा किए।

समारोह में सम्राट अशोक अभियांत्रिकी महाविद्यालय के डॉ. योगेंद्र जैन, डॉ. गोविंद गांधी तथा इतिहासकार गोविंद देवलिया सहित अनेक विद्वान उपस्थित रहे। आभार अजय मेहता ने व्यक्त किया। शोध संगोष्ठी के प्रथम सत्र की अध्यक्षता डॉ. हरिराम रैदास ने की, जबकि रघुवीर चरण गोस्वामी मुख्य अतिथि रहे।

प्रथम सत्र में विभिन्न विद्वानों द्वारा संस्कृत एवं विज्ञान से संबंधित शोध-पत्र प्रस्तुत किए गए। इनमें सुजाता, डॉ. श्याम सिंह, डी.आर. परमानंद मिश्रा, आचार्य शिवकुमार तिवारी, डॉ. रघुवीर गोस्वामी, गोविंद देवलिया तथा डॉ. राजेश जैन सहित शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। शोध-पत्रों में संस्कृत ग्रंथों में निहित वैज्ञानिक दृष्टि, ज्ञान-विज्ञान की परंपरा तथा प्राचीन भारतीय ज्ञान को आधुनिक संदर्भों में समझने के विभिन्न पक्षों पर विचार किया गया।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. हरिराम रैदास ने कहा कि “वैदिक वाङ्मय में हमारे जीवन के सूत्र निहित हैं।” उन्होंने संस्कृत ग्रंथों को भारतीय ज्ञान परंपरा का महत्वपूर्ण आधार बताते हुए इनके वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक पक्षों के अध्ययन की आवश्यकता पर बल दिया।

कार्यक्रम के दौरान विद्वानों ने कहा कि संस्कृत केवल धार्मिक एवं साहित्यिक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-विज्ञान की समृद्ध परंपरा को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है। समारोह के दूसरे दिन भी ‘संस्कृत में विज्ञान’ विषय पर शोध-पत्र वाचन एवं विद्वानों के व्याख्यान होंगे। सत्र का सुसंगत संचालन प्रो नीरज शर्मा देवेंदनगर ने किया।

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