सम्मेद शिखरजी की पवित्रता के लिए प्रशासन और समाज मिलकर बनाएंगे ठोस कार्ययोजना : मुनि श्री प्रमाण सागर
गिरिडीह/सम्मेद शिखरजी। तीर्थराज सम्मेद शिखरजी केवल एक पवित्र तीर्थस्थल नहीं, बल्कि जैन समाज की आस्था और प्राण है। इसकी पावनता, मर्यादा और धार्मिक स्वरूप को अक्षुण्ण रखना हम सभी का मूल दायित्व है। यह बात मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने शंका समाधान कार्यक्रम में कही। उन्होंने समाजजनों से आह्वान किया कि तीर्थ की पवित्रता की चिंता के साथ-साथ संयम, धैर्य और सकारात्मक व्यवहार का परिचय दें।
गुणायतन एवं श्री सेवायतन के राष्ट्रीय प्रवक्ता अविनाश जैन विद्यावाणी ने बताया मुनि श्री के समक्ष तीर्थ क्षेत्र कमेटी के महामंत्री संतोष पेंडारी, मंत्री वीरेश सेठ, गुणायतन के सी. ई ओ सुभाष जैन सहित कयी पदाधिकारियों ने जिला प्रशासन के साथ हुई महत्वपूर्ण बैठक
सम्मेद शिखरजी की सुरक्षा, पवित्रता एवं धार्मिक स्वरूप को लेकर हुई उपरोक्त बैठक में प्रतिनिधिमंडल ने जिला कलेक्टर पुलिस अधीक्षक सहित प्रशासनिक अधिकारियों के समक्ष पर्वत पर बढ़ रही अवांछित गतिविधियों तथा तीर्थ की गरिमा से जुड़े विषयों को विस्तार से रखा।एवं प्रशासन को बताया गया कि सम्मेद शिखरजी 20 तीर्थंकरों एवं गौतम गणधर स्वामी की निर्वाण स्थली तथा 21 टोंकों वाला अत्यंत पवित्र तीर्थ स्थान है। पर्वत की धार्मिक पवित्रता और वंदना मार्ग की गरिमा को बनाए रखना पूरे जैन समाज की सर्वोच्च प्राथमिकता है। बैठक के दौरान जिला प्रशासन ने तीर्थ की पवित्रता एवं सुरक्षा को लेकर सकारात्मक रुख अपनाते हुए आश्वासन दिया कि सम्मेद शिखरजी के धार्मिक स्वरूप और पवित्रता की रक्षा के लिए आवश्यक कदम उठाए जाएंगे। प्रशासन ने यह भी सहमति व्यक्त की कि 3 सितंबर 2026 को गुणायतन में मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज के सान्निध्य में प्रशासनिक अधिकारियों, तीर्थक्षेत्र कमेटी, जैन समाज एवं सम्मेद शिखरजी क्षेत्र में कार्यरत विभिन्न संस्थाओं के प्रतिनिधियों की विस्तृत बैठक आयोजित की जाएगी। बैठक में तैयार कार्ययोजना को धरातल पर लागू करने की दिशा में आवश्यक निर्णय लिए जाएंगे।
इस अवसर पर राष्ट्रसंत मुनि श्री प्रमाण सागर महाराज ने कहा कि “तीर्थ पर आने वाले लोगों को देखकर चिंतित होने के बजाय हमें प्रसन्न होना चाहिए” हजारों लोगों के कदम यदि तीर्थराज पर पड़ रहे हैं तो यह हमारे लिए प्रभावना का अवसर है।उन्होंने कहा कि युवाओं को अहिंसा, दया, करुणा और व्यसनमुक्त जीवन का संदेश प्रेमपूर्वक दिया जाए।यदि कोई युवा ट्रैकिंग के लिए आया है तो उसे समझाएं कि श्री सम्मेद शिखरजी ट्रैकिंग का स्थान नहीं, बल्कि तीर्थयात्रा का पवित्र स्थल है। “रोक नहीं, रूपांतरण हमारा लक्ष्य होना चाहिए, ट्रैकिंग को तीर्थयात्रा में परिवर्तित कर दीजिए, जीवन बदल जाएगा।”
उन्होंने कहा कि आने वाले लोगों के साथ कठोरता नहीं,बल्कि प्रेम और मुस्कान के साथ व्यवहार करें। उन्हें जैन धर्म और भगवान पार्श्वनाथ के जीवन का परिचय दें। प्रेम से दिया गया संदेश किसी भी रोक-टोक से अधिक प्रभावी होगा। उन्होंने जैन समाज से कहा कि सोशल मीडिया पर संयम से काम लें अनधिकृत पोस्ट और प्रतिक्रियाओं से बचें। जब तक अधिकृत मंच से कोई जानकारी या घोषणा न हो, तब तक सोशल मीडिया पर चल रही बातों को आधिकारिक न माना जाए।उन्होंने कहा कि भावावेश में की गई कोई भी प्रतिक्रिया समाज के लिए परेशानी का कारण बन सकती है।जैन समाज की पहचान सर्वसमाज के साथ प्रेम, सद्भाव और सहयोग से रहने की रही है। इसलिए तीर्थ की पवित्रता की रक्षा करते हुए भी हमें संयमित भाषा और व्यवहार का परिचय देना है।पर्वत वंदना में संयम रखने का आह्वान करते हुयेकहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने वाणी, व्यवहार और आचरण में संयम रखना चाहिए। किसी से विवाद न करें, किसी को रोकें-टोकें नहीं और अनावश्यक प्रतिक्रिया से बचें।उन्होंने कहा कि प्रशासनिक व्यवस्था में परिवर्तन एक दिन में नहीं आता। कार्ययोजना तैयार होने के बाद उसे धरातल पर लागू करने में समय लगता है। इसलिए समाज को धैर्य रखना होगा।सकारात्मक बदलाव निश्चित रूप से आएगा।
छह महीने में पुराने गौरव की पुनर्स्थापना का विश्वास
मुनि श्री ने दिलाते हुये कहा कि सम्मेद शिखरजी की व्यवस्था और पवित्रता को लेकर विस्तृत कार्ययोजना तैयार की गई है, जिसे जिला प्रशासन ने भी सकारात्मक रूप से लिया है। योजना के अनुसार कार्य हुआ तो छह महीने में सम्मेद शिखरजी का पुराना गौरव पुनः प्रतिष्ठित किया जा सकता है।
उन्होंने कहा कि स्थानीय समाज, शासन-प्रशासन और जैन समाज सभी सकारात्मक बदलाव के लिए तैयार हैं।अब पहल शुरू हो चुकी है और समाज को भी अपनी जिम्मेदारी निभानी होगी।
मुनि श्री ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ निर्वाण महोत्सव को प्रभावना का माध्यम बनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि पर्वत पर आने वाले लोगों को भगवान पार्श्वनाथ के जीवन चरित्र से परिचित कराएं और जैन धर्म के मूल सिद्धांतों की जानकारी दें।उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य किसी को रोकना नहीं, बल्कि उसके जीवन में सकारात्मक परिवर्तन लाना होना चाहिए। “रोक नहीं,रूपांतरण”— यही हमारा संकल्प होना चाहिए