परमाणु विनाश से बचने के लिए मानवता को बदलनी होगी अपनी दिशा : मुनि श्री चंद्र सागर
सागर। मुनि श्री चंद्र सागर महाराज ने भाग्योदय तीर्थ में कहा कि संसार में चारों ओर विनाश की संभावनाएं बढ़ रही हैं। बारूद के ढेर पर रखा एक परमाणु बम पलभर में सारी मानव सभ्यता को समाप्त कर सकता है। ऐसे में मनुष्य को बाहरी संसार की चिंता के साथ अपने भीतर भी परिवर्तन लाना होगा और संकल्प करना होगा कि राग, द्वेष और मोह को प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कम करेंगे।
मुनि श्री कहा कि गुरु के सामने दर्शन हो जाएं और उनकी मुस्कान प्राप्त हो जाए तो व्यक्ति स्वयं को अत्यंत पुण्यशाली समझे। गुरु और भगवान से जुड़ी स्मृतियां जीवनभर प्रेरणा देती हैं। उन्होंने कहा कि जिसके स्वप्न में गुरु अथवा प्रभु आते हैं, उसका जीवन धन्य हो जाता है।
मुनि श्री ने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में राग, द्वेष और मोह को निरंतर कम करने का प्रयास करना चाहिए। राग के रंगों में रंगने के बजाय वीतरागता की ओर बढ़ना ही वास्तविक साधना है। राग-द्वेष और मोह संसार के बंधनों को बढ़ाते हैं, जबकि इनसे दूर होना आत्मकल्याण और मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है।
उन्होंने कहा कि गुरुदेव ने जो कार्य संसार से मुक्ति के लिए सौंपा है, साधक को उसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। इसके विपरीत संसार में मनुष्य की प्रवृत्ति निरंतर जोड़ने और संग्रह करने की रहती है। परिग्रह का त्याग मनुष्य को राग से दूर करता है और आत्मा को सद्गति की ओर ले जाता है।
उन्होंने प्राकृतिक जीवनशैली पर भी जोर देते हुए कहा कि आज फलों को समय से पहले रासायनिक पदार्थों से पकाया जा रहा है। इससे शरीर पुष्ट होने के बजाय प्रभावित होता है। पहले प्राकृतिक रूप से पके आम की खुशबू घर-आंगन तक आती थी, लेकिन कृत्रिमता ने प्रकृति की उस सुगंध को भी प्रभावित कर दिया है। मनुष्य को प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीवन जीने की आवश्यकता है।
मुनि श्री ने कहा कि जब तक आंख लगी है, तब तक परिग्रह का त्याग है। इस प्रकार का संयम और त्याग राग को कम करने का प्रभावी माध्यम है। यदि इसी भाव में जीवन का अंत हो तो व्यक्ति सद्गति का पात्र बन सकता है। इसलिए जीवन का उद्देश्य संग्रह बढ़ाना नहीं, बल्कि राग को क्षीण कर आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ना होना चाहिए।