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विफल हुई दिल्ली को नेपाल बनाने की साजिश !!!संसद के द्वार तक कैसे पहुंचे आन्दोलनकारी — जांच का विषय

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मनोज कुमार द्विवेदी, अनूपपुर

क्या सोमवार 20 जुलाई को दिल्ली को नेपाल बनाने की पहली साजिश नाकाम हो गयी है ? क्या सरकार और सुरक्षा बलों के संयमित रवैये से आन्दोलनकारियों के पीछे बैठे लोगों की मंशा पर पानी फिर गया ? क्या होता यदि संसद के अन्दर भीड घुसने की कोशिश करती , संसद की सुरक्षा खतरे मे पड जाती और सांसदों की सुरक्षा के लिये सुरक्षा बल गोलियाँ चलाने को बाध्य हो जाते ? जाहिर है कि कुछ लोगों की जानें जातीं और दुनिया भर मे भारत की छवि बिगाडने का कुछ लोगों को अवसर मिल जाता।

ऐसा कुछ हुआ नहीं, लेकिन यह सरकार और सुरक्षा बलों के लिये एक बडा सबक जरुर है।

दो दिन के घटनाक्रम से यह स्प़ट है कि देश मे छात्रों के विरोध मे कोई भी नहीं है। उन्हे परेशान देख कर भला कौन खुश हो सकता है। लेकिन उन्हे आगे करके हिंसा और तोडफोड करने वालों को कौन संभालेगा ?

किसी वीडियो, किसी तस्वीर में एक भी छात्र हिंसा करते नहीं दिख रहा है। वो सख्ती से खडा होकर लाठियां खा रहा है, वह रो रहा है , गोहार लगा कर कह रहा है कि और मार लो हमें लेकिन व्यवस्था सुधार दो ।

वो पुलिस के आगे घुटनों के बल सिर झुका कर बैठ जा रहा है। ऐसे किसी भी दृश्य मे लोगों को पुलिस की थमी हुई लाठियां, अभिभावक की तरह समझाईश देते पुलिस के लोगों की संवेदनशीलता जरुर दिख रही होगी। आखिर वह भी हम जैसे ही इंसान हैं । उनके बच्चे भी इन छात्र – छात्राओं की तरह ही तो होगें।

देश को दोनों मे अन्तर कर पाना होगा कि निरीह , प्रदर्शनकारी छात्र अलग हैं और उनके बीच छुपे पत्थरबाज, अराजक, हिंसक तत्व अलग।

एक वर्ग नीट मामले मे सुधार चाहता है, न्याय चाहता है तो दूसरा वर्ग सरकार और देश को अस्थिर करने के लिये संसद मे घुस जाना चाहता है।

सरकार तक बात पहुंचाने की शांति पूर्ण कोशिश होती तो संसद तक इतनी हिंसा क्यों ?

यदि राजनैतिक दलों के सांसद छात्रों की भीड मे हैं तो वो उन्हे समझाते, नियंत्रित करते क्यों नही दिख रहे, पुलिस पर हुए हमलों की निंदा क्यों नहीं कर रहे । बल्कि उनके बयान युवाओं को उकसाते क्यों दिख रहे हैं ?

भीड यदि प्रायोजित और आमंत्रित है तो शांतिपूर्ण प्रदर्शन की जवाबदेही भी आयोजकों की ही तय होना चाहिए ।

कोई नियम – कायदे ना माने तो पुलिस दिल्ली के लोगों की ,देश के नियम कायदों की पालना तो करवाएगी ही।

लोग पत्थर मारें, पुलिस पर हमले करें, उनके वाहन, सुरक्षा बेरिकेड्स को तोड फोड दें , घंटों आम लोगो के जीवन को बंधक बनाए रखें और संसद मे घुस कर आन्दोलन करना चाहें और इसके बाद भी सरकार यह कहे कि जंतर मंतर मे आन्दोलन पर कोई कार्यवाही नही होगी तो इसका मतलब यह नही कि सरकार कमजोर या असहाय है। इसका सीधा मतलब है कि वह छात्रों के साथ खडी है , उनकी बात सुनने को तैयार है और परीक्षा प्रणाली मे सुधार पर कार्य कर रही है। लेकिन छात्रों को आगे करके कोई भी व्यक्ति , संगठन या भीड , सरकार की कनपटी पर गन रख कर धमका कर अपनी मांगे नहीं मनवा सकती। उसके लिये शांतिपूर्ण तरीके से बातचीत की टेबल पर आना होगा।

विडंबना देखिये कि संसद कूच का आह्वान करने वाले सोनम वांगचूक अस्पताल मे थे, काकरोच पार्टी के मुखिया अभिषेक दिपके किसी आटो के ऊपर दूर खडे थे । यानि एक भी जिम्मेदार नेता भीड का नेतृत्व नहीं कर रहा था। सोशल मीडिया मे दिल्ली और उससे बाहर से हजारों की संख्या मे पुष्ट – अपुष्ट वीडियो, सूचनाएँ शेयर करके भीड को भडकाने की लगातार कोशिश की जा रही थी। संसद कूच की अनुमति नहीं थी । इसके बावजूद बिना किसी सक्षम नेतृत्व के भीड संसद तक पहुंच गयी। यदि सुरक्षा बलों ने 150-200 मीटर पहले नहीं रोका होता और अनियंत्रित भीड संसद परिसर मे घुस जाती तो सुरक्षा के लिये कितना बडा चैलेंज होता।

अब संसद कूच के बाद जमकर हुई हिंसा , पुलिस पर हमले और छात्रों पर पुलिस के बल प्रयोग के बाद देश के सामने कुछ महत्वपूर्ण प्रश्न हैं जिनके जवाब दिल्ली पुलिस और सरकार को तलाशने होगें —

1. जब जंतर – मंतर के बाहर आन्दोलन या कूच की अनुमति नहीं थी तो अनियंत्रित भीड को दिल्ली की सडकों पर उतरने कैसे दिया गया।

2. क्या अन्दोलन के उग्र और हिंसक होने का आंकलन समय रहते क्यों नहीं किया गया ?

3. आन्दोलनकारियों की बडी संख्या का अनुमान लगाने मे सुरक्षा एजेंसियो से क्या चूक हुई है ?

4. आन्दोलनकारियों की भीड संसद भवन तक पहुंचने मे सफल कैसे हुई , उन्हे दिल्ली पुलिस रोकने मे क्यों थी ?

5. कुछ वीडियो मे पथराव करते ,तोडफोड करते आन्दोलनकारी कौन लोग हैं ?

6. दिल्ली की सडकों पर पथराव के लिये पत्थर कहां से आया ?

7. सोशल मीडिया मे तमाम अफवाह, पुष्ट – अपुष्ट हिंसा की तस्वीरें, वीडियो और खबरें शेयर करके लोगों को भडकाने की कोशिश हुई। समय रहते इसे क्यों नहीं रोका गया ?

8. कुछ लोगों ने आन्दोलन के समय घटना स्थल पर ड्रोन उडाया । प्रतिबंध के बाद भी ऐसा करने वाले कौन लोग हैं

9. यह जांच का विषय होना चाहिये कि नीट छात्रों के आन्दोलन मे किन बाहरी तत्वों की सहभागिता थी।

लोकतंत्र मे धरना ,आन्दोलन, प्रदर्शन लोगों का अधिकार है। सबको शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात कहने का अधिकार है। लेकिन इसके कारण कोई आम जनता, सडक, शहर को बंधक नहीं बना सकता। प्रत्येक हिंसक, अराजक आन्दोलन की जवाबदेही तय करना होगा। सरकार को यह भी सुनिश्चित करना होगा की परीक्षा, पेपरलीक, रोजगार को लेकर युवाओं को कोई आन्दोलन के लिये आगे करके हिंसा, आगजनी ,तोडफोड ना कर सके। आन्दोलनकारियो के साथ आम नागरिकों के सुखाधिकार ,नागरिक अधिकार भी हैं, जिनकी रक्षा करना सरकार का दायित्व है।

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