नालों की गंदगी, उद्योगों का कैमिकल और जगह-जगह एनीकेट से मरती खारुन
सुरेन्द्र जैन धरसींवा रायपुर
रायपुर जिले की जीवदायिनी नदी खारुन आज खुद बेहतर जीवन के लिए संघर्ष कर रही है. प्रदूषण से लड़ रही खारुन आज अपने वास्तविक अस्तित्व को खो चुकी है. जगह-जगह एनीकेट ने जहाँ खारुन के प्रवाह को बाधित किया है, वहीं नालों की गंदगी और उद्योगों का कैमिकल युक्त पानी धीरे-धीरे नदी को मारती जा रही है. पानी बचाओ-बानी बचाओ के तहत नदी पदयात्रा में निकली मोर चिन्हारी छत्तीसगढ़ी की टीम खारुन की दुर्गति देखकर चकित थी.

टीम के संयोजक डॉ. वैभव बेमेतरिहा ने बताया कि नदी पदयात्रा के दूसरे चरण में खारुन नदी के किनारे-किनारे 13 जून शनिवार को उन्होंने अपनी टीम के साथी राजीव तिवारी, संजीव साहू, और संदीप पटेल साथ महादेव घाट से यात्रा शुरू की.
महादेव घाट जैसे टीम आगे बढ़ी कई जगहों पर खारुन में गंदे नालों का पानी मिलता हुआ दिखाई दिया. रायपुरा से लेकर सरोना-चंदनडीह तक कई किलोमीटर में सिर्फ जलकुंभी ही जलकुंभी है.
यही हाल अटारी, नंदनवन, गोमची-गुमा के रास्ते भी है. तेंदुआ, पठारीडीह, कुम्हारी जैसे गांवों के किनारे उद्योगों का कैमिकल युक्त पानी खारुन में इस कदर घुल मिल जाता है कि नदी जहरीली हो जाती है. कुछ गांवों की स्थिति यह है कि भूजल भी जहरीली हो गई है.

मुरेठी गाँव में खारुन की दुर्दशा देखी जा सकती है. यहाँ भी कई किलोमीटर तक सिर्फ जलकुंभी है. मुरेठी से आगे, मुर्रा, लखना पहुँचते-पहुँचते नदी थोड़ी साफ दिखाई देती है. लेकिन नदी का वास्तविक प्रवाह नहीं रहता. अगर गर्मियों के दिनों में डैम से पानी न छोड़ा जाए तो नदी कई हिस्सों में सूख जाती है.
इस यात्रा का उद्देश्य पानी को हर तरह से बचाना। वर्षा जल का संरक्षण भी और प्रदूषण से मुक्त भी। पानी की तरह ही आज बानी(मातृभाषा) भी संकट में है. बिना शिक्षा कोई भी भाषा मर जाती है. ऐसे स्कूली माध्यम में शामिल करना जरूरी है. पानी और बानी का यह अभियान समाज में जागरण के लिए. सोमनाथ में यात्रा के समापन के साथ यही संदेश दिया गया.