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हिंदी पत्रकारिता: ‘मार्तंड’ के ‘उदंत’ की मूल तासीर अक्षुण्ण रहेगी !-अजय बोकिल

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आलेख

अजय बोकिल

हिंदी भाषियों के अज्ञान के अंधेरे को दूर कर उन्हें जागृत, शिक्षित और संसूचित करने के उद्देश्य से आज से ठीक दो सौ साल पहले कलकत्ता से निकले पहले हिंदी अखबार ‘उदंत मार्तण्ड’ के मर्म का प्रकाश अब बहुत दूर तक फैल चुका है। हमारी पीढ़ी का सौभाग्य है कि हम इस ‘समाचार सूर्य’ के प्रकाशन की दूसरी शताब्दी के साक्षी हैं, वरना इस पत्र की पहली शताब्दी के वक्त हिंदी भाषियों को ज्ञान ही नहीं था कि हिंदी पत्रकारिता का प्रथम सूरज 30 मई 1826 को चमका था और पं. युगल किशोर शुक्ल के संपादन में अपनी चमक बिखेर कर डेढ़ साल बाद बंद भी हो गया। अलबत्ता शुक्लजी ने हिंदी पत्रकारिता का बीजारोपण कर ‍िदया था, जो आज वटवृक्ष के रूप में खड़ा है, विस्तारित होता जा रहा है। यह आधुनिक भारत आरंभ भी था। हिंदी पत्रकारिता की आत्मा को शुक्लजी ने अपने अखबार में सर्वप्रथम ‘हिंदुस्तानियों के हित के हेत’ के रूप में रेखांकित कर दिया था। यही उसका धर्म है, यही मर्म और यही प्रतिबद्धता है। हिंदी पत्रकारिता की ‍पहचान उसके जनता से जुड़े रहने में निहित है। हालांकि कुछ लोगों की नजर में हिंदी पत्रकारिता प्रतिरोध की पत्रकारिता है और उसे अपना यह चरित्र कायम रखना चाहिए। सत्ता का भोंपू बनना उसकी प्रकृति और नीयत नहीं है। कुछ लोग कालखंड और चरित्र के हिसाब से हिंदी पत्रकारिता को मिशन, कमीशन और एजेंडा पत्रकारिता में बांटते हैं। बीते एक दशक में हिंदी पत्रकारिता को ‘हिंदू पत्रकारिता’ अथवा ‘गोदी मीडिया’ कहकर उसकी आलोचना की गई। लेकिन अपनी तमाम कमियों के बावजूद हिंदी पत्रकारिता आज अपने इतिहास के सबसे प्रभावशाली दौर में अगर आ खड़ी है तो इसका श्रेय आदि पत्रकार युगलकिशोर ‍शुक्ल को ही जाता है, जिन्होंने तब शायद सोचा भी नहीं होगा कि वो एक नए इतिहास की नींव रख गए हैं। वर्तमान में हिंदी पत्रकारिता का विराट रूप आज अखबार, इलेक्ट्राॅनिक मीडिया, डिजीटल मीडिया और रेडियो मीडिया के जरिए बना है। यह बात अलग है कि इसका इस्तेमाल मीडिया मालिक, सत्ता, कई पत्रकार और इंफ्‍लूएंसर्स अपने-अपने ढंग से कर रहे हैं।

दो साल किसी भी विधा के परिपक्व होने तथा परंपरा और विरासत में तब्दील होने के साक्षी होते हैं। इस दौरान हिंदी प‍त्रकारिता ने कई उतार-चढ़ाव देखे। अनेक चुनौतियों का सामना किया और अब नई चुनौतियों से जूझ रही है। दरअसल हिंदी पत्रकारिता भारत के आधुनिक और विकसित राष्ट्र में रूपांतरित होते जाने के की साक्षी भी है। इसने अंग्रेजों से लोहा लिया, स्वतंत्रता संग्राम में योद्धा की भूमिका निभाई। आजादी के पश्चात लोकतंत्र को बचाने के लिए चौथे खम्भे के किरदार में रही। आज सूचनाअोंके कोलाहल और सोशल मीडिया के अराजक माहौल में भी पारंपरिक हिंदी पत्रकारिता अपनी पहचान बचाने की हर संभव कोशिश कर रही है।

हिंदी प‍त्रकारिता की द्विशताब्दी इस मायने में भी महत्वपूर्ण है कि हिंदी के पहले अखबार ‘उदंत मार्तंड’ का पहला शताब्दी वर्ष संभवत: अनसुना ही निकल गया। जाने-माने पत्रकार और सप्रे संग्रहालय के संस्थापक विजयदत्त श्रीधर के अनुसार जनवरी 1931 तक यह माना जाता रहा कि हिन्‍दी पत्रकारिता की शुरुआत 1 जनवरी 1845 में काशी से प्रकाशित होने वाले ‘बनारस अखबार’से हुई। ‘माडर्न रिव्‍यू’ के सहायक संपादक ब्रजेन्‍द्रनाथ बंद्योपाध्‍याय (बनर्जी) जब भारतीय भाषाओं की पत्रकार-कला का इतिहास लिख रहे थे, तब उनकी शोध दृष्टि में ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’की फाइल आई। यह तथ्‍य सामने आया कि हिन्‍दी का पहला समाचारपत्र ‘उदन्‍त मार्त्‍तण्‍ड’है। यानी‍ हिंदी पत्रकारिता का इतिहास एक झटके में 19 साल पीछे चला गया। संयोग से यह घटनाक्रम भी हिंदी पत्रकारिता के समावेशी चरित्र का ही सूचक है कि हिंदी के पहले अखबार की खोज एक बंगाली भाषी विद्वान ने की तो ‘उदंत मार्तंड’ के उजागर होने से पहले जिस ‘बनारस अखबार’ को हिंदी का आद्य अखबार समझा जाता रहा, उसके संपादक एक मराठीभाषी गोविंद रघुनाथ थत्ते थे।

बीते दो सौ सालों में हिंदी पत्रकारिता ने समय के साथ अपना रूप रंग, तेवर और धार बदली है। लेकिन आज हिंदी पत्रकारिता की प्रामाणिकता और निष्पक्षता पर भी सवाल उठने लगे हैं बावजूद इसके‍ ‍कि पत्रकारिता कभी भी समय, परिस्थिति और समाज ‍िनरपेक्ष नहीं हो सकती। आरोप यह भी है कि राष्ट्रवादी सोच और पत्रकारीय मूल्यों के बीच की लक्ष्मण रेखा धुंधली होती जा रही है। हालांकि इसके पीछे कारण जनता की सोच में परिवर्तन और सामाजिक, आर्थिक तथा राजनीतिक तकाजे भी हैं। लेकिन चिंता की बात यह है ‍िक कई बार लगता है कि पत्रकारिता का भौकाल एजेंडे में परिवर्तित हो चुकी है, जिसमें सत्य का पता लगाना कठिनतर होता जा रहा है। सूचनाएं अपनी पवित्रता और प्रामाणिकता खोकर फेक और दुष्प्रचार की खबरों में तब्दील होती जा रही हैं। इसमें सोशल मीडिया बहुत बड़ी भूमिका है। उसकी व्याप्ति पारंपरिक मीडिया से भी ज्यादा हो जाने के कारण लोगों का इसी फेक समाचार जगत को असली समझ बैठना, एक स्वतंत्र देश, स्वस्थ समाज और मानवीय सरोकारों के लिए भी घातक है।

निस्संदेह हिंदी पत्रकारिता का जन्म टीआरपी या लाइक्स बटोरने के लालच के बजाए अपने पाठकों तक सम सामयिक घटनाअोंऔर प्रवृत्तियों की सूचनाएं पहुंचाने और सद्विचारों से अवगत कराने के सात्विक आग्रह से हुआ है। अब ‘भारत और भारतीयों के हित के हेत’ में कई नए कारक और स्वार्थ जुड़ गए हैं।

शुक्लजी ने हिंदी पत्रकारिता की नींव जिस दौर में रखी थी, तब संसाधनों और सूचना स्रोतों का बेहद टोटा था। कलकत्ता से बाहर अखबार के वितरण का जरिया भी केवल डाक ही था। इसके लिए भी तत्कालीन ईस्ट इंडिया कंपनी पर ही निर्भर रहना पड़ता था, जो तब इसे ‘कंपनी मेल’ कहती थी। तब न तो फोन थे, न रेडियो था और न ही कम्प्यूटर, रेलवे भी तब तक भारत में चालू नहीं हुई थी। तार सेवा भी नहीं थी। छपाई की मशीन को छोड़ दें तो सारा काम मानवचलित ही था। उस दौर में भी शुक्लजी ने हिम्मत कर डेढ़ साल तक निकाला। अखबार की लेखनी धारदार और व्यवस्था व दमन विरोधी थी, इसलिए उस पर अंग्रेजों की कुदृष्टि पड़नी ही थी। उन्होंने समस्याएं पैदा करनी शुरू कर दीं। अंतत: अखबार बंद करना पड़ा। लेकिन शुक्लजी के साथ था हौसला, प्रामाणिकता और विश्वसनीयता। हिंदी पत्रकारिता का जन्म इसी पालने में हुआ है। शुक्लजी भी भारतीयों के हितों की प्रतिकूल घटनाअों पर प्रखर और तथ्यात्मक टिप्पणी करते थे, आज भी उसकी उतनी ही ज्यादा जरूरत है। लोकोन्मुखी और लोकतां‍‍त्रिक संघर्ष ने ही हिंदी पत्रकारिता के मूल्य गढ़े हैं।

हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल तमाम तरह की चुनौतियों से मुकाबिल होने के भी रहे हैं। अब नए जमाने में चुनौतियां भी नई हैं। मसलन डिजीटल माध्यमों से होने वाली गलत सूचनाअों की बौछार और एक खास पक्ष में झुकी प‍त्रकारिता। सत्ता और कारपोरेट दबाव के आगे नतमस्तक न होने, किसी एजेंडे का हिस्सा न बनने तथा वित्तीय संकट से जूझना भी शामिल है। आज संतुलित, तथ्यात्मक और तार्किक रिपोर्टिंग दूभर होती जा रही है। हर बात को सनसनीखेज बनाने के चलन और बाजार के दबाव ने विश्वसनीय और सत्यान्वेषी पत्रकारिता को पीछे धकेल दिया है। निर्भीक अभिव्यक्ति को आलोचना के आईने में देखा जाने लगा है। लेकिन हिंदी पत्रकारिता के लिए यह कोई नई बात नहीं है। शुक्लजी ने भी जब ‘उदंत मार्तण्ड’ शुरू किया था, वो समय देश में राजनीतिक अराजकता, आपसी संघर्ष, अशिक्षा और देश को गुलाम बनानेवाली उपनिवेशवादी ताकतों के कसते शिकंजे का था। तब भी देशभक्त ताकतें अपने विवेक और संसाधनों के साथ जूझ रही थी। आज स्थितियां बदल गई हैं। लेकिन ‘हिंदुस्तानियों के हितों’ का तकाजा कमोबेश वही है, फर्क इतना है कि उसका स्वरूप बदल गया है।

हमारे लिए गर्व की बात यह है कि आज हिंदी पत्रकारिता अपने भीतर दो सौ वर्षों का अनुभव, ज्ञान, संघर्ष, अपने मूल्य और प्रतिबद्धताएं समेटे हुए है। यही पूंजी और जज्बा हमे भावी चुनौतियों से जूझने में मदद करेगा। जिम्मेदारी उन सच्चे पत्रकारों की भी है कि शुक्लजी की भावना के अनुरूप हिंदी पत्रकारिता के मूल्य कैसे अबाधित रहें। हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप, कार्यशैली भले बदले, किंतु उसकी अंतरात्मा न बदले। जब तक हिंदी पत्रकारिता जनता से जुड़ी रहेगी, तब इस समाचार के इस सूर्य को कभी ग्रहण नहीं लग सकता। कुछ लोग भले इसे अति आत्मविश्वास मानें, लेकिन ‘मार्तण्ड’ के ‘उदंत’ की मूल तासीर यही है।

– लेखक सुबह सवेरे के कार्यकारी प्रधान संपादक हैं।

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