आलेख
अजय बोकिल
देश की राजधानी नई दिल्ली के जंतर मंतर पर 20 जुलाई को काॅकरोच जनता पार्टी ( सीजेपी) के आह्वान पर आयोजित संसद मार्च में जिस तरह से हजारों युवाअों की भीड़ जुटी, उसे रोकने लाठी चार्ज हुआ, हिंसा हुई, , विपक्ष ने इसको लेकर संसद में हंगामा किया, राहुल गांधी पीएम आवास पर धरने पर बैठे और अनशन स्थल से हटाए जाने के बाद दूसरे दिन आंदोलनकारियों का फिर से जंतर मंतर पर धरने पर जम जाना कई सवाल खड़े करता है। उधर पंजाब के किसानों ने भारत-अमेरिका ट्रेड डील ( जो अभी अंतिम रूप से हुई ही नहीं है) को लेकर दिल्ली कूच सरकार से बात के बाद स्थगित कर दिया गया तो 20 जुलाई को ही जम्मू कश्मीर के मुख्यामंत्री उमर अब्दुल्ला द्वारा पूर्ण राज्य की मांग को लेकर दिल्ली में हुआ धरना अनसुना कर दिया गया। क्या ये सभी घटनाक्रम महज संयोग हैं अथवा किसी दूरगामी राजनीतिक अभियान की अोर संकेत करते हैं। वजह यह कि भारत में कई बार सत्ता परिवर्तन का मूल कारण कुछ और रहता है और बाद में वह शुद्ध रूप से राजनीतिक आकार ले लेता है। फिर चाहे वह बोफोर्स घूस कांड हो, मंडल-कमंडल आंदोलन या फिर भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना का आंदोलन हो। सभी की शुरूआत ‘व्यवस्था में सुधार’ की मांग से हुई थी और अंजाम सत्तारूढ़ दल की रवानगी से हुआ। तो क्या इस बार भी वैसा ही कुछ होने जा रहा है या फिर यह भी ‘चाय की प्याली’ में उठा तूफान है, जिससे मोदी सरकार अपने तरीके से ‘निपट’ लेगी अथवा बीते 12 सालों में उठे आंदोलनों के बुलबुलों की माफिक यह भी जल्द फूट जाएगा। क्योंकि आंदोलनों से निपटने की प्रति रणनीति पहले से तैयार है। हालांकि प्रति रणनीति हर बार सफल हो, यह जरूरी नहीं है।

दरअसल दिल्ली में पांच साल पहले किसान आंदोलन के कारण जो जबर्दस्त हलचल मची थी, वैसी फिर देखने में नहीं आई। ऐसा नहीं है देश में मुद्दे खत्म हो गए हैं, लेकिन उसे उठाने के लिए जरूरी इच्छाशक्ति और संगठन क्षमता विपक्ष में नहीं दिखाई दी। दरअसल विपक्ष स्वयं किसी मुद्दे को व्यापक राजनीतिक आंदोलन में बदलने में नाकाम रहा है, लेकिन दूसरों द्वारा शुरू किए आंदोलनों में अपनी राजनीतिक संभावनाएं जरूर खोजता रहा है। जबकि सत्तारूढ़ भाजपा और उसकी प्रेरक शक्ति आरएसएस इन आंदोलनो के पीछे की मंशा को भांपकर अपने तरीकों से उसकी हवा निकालने में कामयाब रहे हैं। क्योंकि इन आंदोलनों को जनता का व्यापक समर्थन कभी नहीं मिला। वह किसी एक वर्ग अथवा समुदाय तक सीमित होकर रह गया। विपक्ष की मानें तो उसका असल उद्देश्य मोदी सरकार को सत्ता से बेदखल करना है ताकि ‘देश और संविधान को बचाया जा सके।‘ जबकि मोदी सरकार और संघ भी इसे इसलिए कामयाब नहीं होने देता क्योंकि ‘देश और उसकी संस्कृति को बचाए रखना है।‘ इसमें कौन सही है, यह निरपेक्ष भाव से तय करना कठिन है। क्योंकि हकीकत में दोनो की दृष्टि एकांगी है। उदाहरण के लिए 20 जुलाई को एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक और सीजेपी के आव्हान पर छात्रों की मांगों को लेकर आयोजित संसद मार्च के दिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संसद में जाने से पहले मीडिया से भारत की युवाशक्ति की उपलब्धियों का तो जिक्र किया, लेकिन उसी समय जंतर मंतर पर इकट्ठा हो रहे हजारों नाराज युवाअों के बारे में एक शब्द नहीं कहा। दूसरी तरफ विपक्ष ने संसद में आंदोलनकारी युवाअों के दमन और सरकार की उनके प्रति ‘असंवदेनशीलता’ का तो मुद्दा उठाया, लेकिन आंदोलन के दौरान हुई हिंसा और बड़ी संख्या में घायल सुरक्षाकर्मियों के बारे में मौन साध लिया।
लेकिन इससे इस आंदोलन की महत्ता कम नहीं होती। क्योंकि यह बात ही अपने आप में चिंता का विषय होनी चाहिए कि देश का भविष्य युवा अगर अपनी समस्याअों और तकलीफों को लेकर सड़कों पर उतर रहा है तो यह स्थिति बनी क्यों? वैसे भी असंगठित सीजेपी की मांगों और सोनम वांगचुक के आमरण अनशन के प्रति सरकार ने शुरू से सकारात्मक रवैया अपनाया होता तो यह स्थिति शायद बनती ही नहीं। केन्द्रीय मंत्री जेपी. नड्डा ने आंदोलनकारियों से जो बात जंतर मंतर पर हंगामे के बाद की, वह अगर पहले ही कर ली जाती तो संसद मार्च की नौबत ही नहीं आती। सोनम वांगचुक से भी अब बात हो रही है, जबकि वो 20 दिनों से धरने पर बैठे थे। वैसे भी सरकार आंदोलनकारियों की सारी मांगे माने, यह जरूरी नहीं है, लेकिन वह युवाअोंको यह तो बता सकती थी कि सरकार उनकी मांगों के संदर्भ में क्या करने जा रही है। यहां बात मूलत: कोई भी काम सदाशयता के साथ दूसरों को विश्वास में लेकर करने की है। लेकिन सरकार को शायद यही मंजूर नहीं है। वह बात भी करती है तो रायता फैल जाने के बाद। इस पूरे मामले को भी ‘ठीक’ से हैंडल नहीं किया गया, यह राय खुद भाजपा और संघ में कई लोगों की है। वैसे भी सरकार युवाअों से लड़कर संदेश क्या देना चाहती है?
कहा जा रहा है कि जंतर मंतर पर जो हुआ, उसके पीछे युवा कम दूसरे राजनीतिक तत्वों का हाथ ज्यादा है। वामपंथी पार्टियों के छात्र संगठनों ने तो आंदोलन को खुला समर्थन दे ही दिया था। उसके अलावा आम आदमी पार्टी और चंद्रशेखर रावण की आजाद समाज पार्टी के लोग भी बड़ी तादाद में आंदोलन में पहुंचे। इस वजह से पूरा आंदोलन शुद्ध रूप से छात्रों का रह नहीं गया था। लेकिन यह भी सही है कि हजारों छात्र-छात्राएं देश के कई हिस्सों से अपने खर्चे पर इस मार्च में शामिल होने के लिए पहुंचे थे, क्योंकि उनकी समस्याएं जायज हैं। उनका दर्द वाजिब है कि अगर परीक्षाएं ही ईमानदारी से नहीं होंगी तो वो क्या करेंगे? कहां जाएंगे? यही व्यक्तिगत आक्रोश जंतर मंतर पर सामूहिक रूप से प्रकट हुआ। हालांकि सरकार ने भी उसे शुरू में नहीं रोका। लेकिन तभी छात्रों से संवाद होता तो बात कुछ अलग होती। यह तर्क भी लचर है कि सरकार संवाद करती तो किससे, जो बात बाद में जिनसे की गई, उन्हीं से पहले भी की जा सकती थी।
छात्र आंदोलनकारियों की तीन मुख्य मांगों में पहली केन्द्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान के इस्तीफे की है। आंदोलनकारियों को लगता है कि परीक्षा में पेपर लीक के लिए वो नैतिक जिम्मदारी लें। दूसरी मांग सोनम वांगचुक की रिहाई की है। तीसरी मांग पेपर लीक से दुखी होकर खुदकुशी करने वाले परीक्षार्थियों के परिवारों को 1-1 करोड़ रू. का मुआवजा दिया जाए। जहां तक नैतिक आधार पर इस्तीफे की बात है तो वह भाजपा के ‘राम राज्य’ में वह फिट नहीं होती। आखिर किसी भी ‘अनैतिक काम’ की ‘नैतिक जिम्मेदारी’ कोई क्यों ले? अपना मन चंगा तो कठौती में गंगा। सत्ता में रहते हमारा काम चोरों को पकड़ना है, आत्मावलोकन करना नहीं है। यही मानस हमने श्रीराम मंदिर चढ़ावा चोरी कांड में देखा। लेकिन आंदोलनकारियों की दूसरी मांग मानने में कोई दिक्कत नहीं है, क्योंकि सोनम वांगचुक अस्पताल में हैं, किसी जेल में नहीं। अलबत्ता तीसरी मांग मानी जाएगी, इसमें संदेह है, क्योंकि किसान आत्महत्या की तरह भानमती का नया पिटारा खुल जाएगा। देश में कोई छात्र किसी भी कारण से खुदकुशी करे, मुआवजे के लिए सरकार पर दबाव बनाया जाएगा।
भाजपा समर्थक इस छात्र आंदोलन को मोदी सरकार के खिलाफ एक और ‘टूलकिट’ और साजिश मान रहे हैं। यहां तक कि इसके मीडिया कवरेज में यह सोच हावी दिखी। लेकिन यह आंदोलन व्यापक असंतोष का कारण न बने, इस दृष्टि से सरकार के हित में यही है कि वह शांति और विवेक कायम रखकर इसे निपटाए। कहा तो यह भी जा रहा है कि जंतर मंतर और संसद के सामने हंगामा और हिंसा करने वाले छात्र थे ही नहीं। संभव है कि पुलिस द्वारा पकड़े गए लोगों में छात्र न हों, लेकिन इस बात से कोई इंकार नहीं कर सकता कि आंदोलन में बड़ी संख्या में छात्र शामिल थे और यही सरकार के लिए आगे चलकर खतरे की घंटी हो सकती है। इस आंदोलन का एक और अहम पक्ष सोशल मीडिया के वर्च्युअल वर्ल्ड में जीने युवाअों का स्वप्रेरणा से सड़कों पर वास्तविक दुनिया में उतरना है। जबकि सरकार और कई राजनीतिक प्रेक्षक मानकर चल रहे थे कि सोशल मीडिया और सड़क मूवमेंट का आपस में सीधा रिश्ता नहीं है। भारत में जेन-जी ऐसा नहीं कर सकती। लेकिन जो घटा वह सिर्फ ट्रेलर है। इस अर्थ में सीजेपी की यह सफलता है कि महज कटाक्ष के तौर पर सोशल मीडिया में बनी एक पार्टी नाराज युवाअोंको सड़क पर उतारने में कामयाब हो गई। यह सोच अगर राज्यों और जिलों तक फैली तो एक बड़ा आंदोलन भविष्य में खड़ा हो सकता है। इस बीच सोनम वांगचुक ने अस्पताल में भी अनशन जारी रखने का ऐलान कर दिया है तो दूसरी तरफ सीजेपी के संस्थापन अभिजीत दिपके और सोनम की पत्नी गीतांजलि ने जंतर मंतर पर धरना जारी रखने की बात कही है। यह बात अलग है कि खुद गांधीवादी सोनम वांगचुक के अनशन को गांधीवादी आंदोलन नहीं मान रहे। हालांकि ये सिलसिला जारी रहे, यह विपक्षी पार्टियों के लिए भी मुफीद है, क्योंकि उसे यह आरोप लगाने का मौका मिलता रहेगा कि यह सरकार बेरहम और ‘युवा विरोधी’ है। दरअसल विपक्ष की नजर 2029 के लोकसभा चुनावों पर है। उसका मानना है कि देश में मोदी की लोकप्रियता लहर अब मंद पड़ने लगी है, सो लोकसभा चुनाव तक इसे किसी तरह चरम पर पहुंचाया जाए। सीजेपी जैसे संगठन इसमें मददगार हो सकते हैं। हालांकि विपक्ष की सोच को 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा चुनावों ने गलत ही साबित किया है। फिर भी राजनीति संभावनाअों का खेल है। कौन जानता था कि ‘अन्ना’ शब्द का राजनीतिक अनुवाद ‘मोदी’ में होगा। ऐसे में अभिजीत दिपके का जलाया दीप बुझ जाएगा अथवा परिवर्तन की लौ में तब्दील होगा, यह देखने की बात है।

– लेखक मध्यप्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं।