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त्याग ,सम्मान , प्रेम ही जीवन में मर्यादा का संगम : पंडित शास्त्री जी

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शरद शर्मा बेगमगंज रायसेन 

जगदीश पुरी कॉलोनी पेट्रोल पंप के सामने,सागर भोपाल रोड इंडियन गैस गोदाम के पास बेगमगंज में दिनांक 25 अप्रैल से1 मई समय 3:00 से 6:30 तक चल रहा श्री राम महायज्ञ हनुमत प्रतिष्ठा एवं श्रीराम कथा के द्वितीय दिवस में पंडित कमलेश कृष्ण शास्त्री जी महाराज ने प्रवचन करते हुए कहा –

परिवार कैसे चलाया जाता है, इसका सबसे सुंदर और आदर्श उदाहरण श्री राम कथा में मिलता है। कथा हमें सिखाती है कि परिवार केवल रिश्तों का समूह नहीं, बल्कि त्याग, प्रेम, सम्मान और मर्यादा का संगम होता है। भगवान श्री राम का जीवन इस बात का प्रमाण है कि एक आदर्श पुत्र, भाई, पति और राजा कैसा होना चाहिए। उन्होंने अपने जीवन के हर संबंध को पूरी निष्ठा और जिम्मेदारी के साथ निभाया, जिससे परिवार और समाज दोनों में संतुलन बना रहा।

हर सनातनी के माथे पर तिलक, हाथ में कलावा और गले में कांठी होना आवश्यक है। शास्त्र कहते हैं कि जिसके माथे पर तिलक नहीं होता, वह पाप का भागी होता है। माथे पर तिलक लगाना ईश्वर के प्रति श्रद्धा और अपने जीवन को धर्म के मार्ग पर चलाने का संकल्प दर्शाता है। हाथ में बंधा कलावा हमें अपने कर्तव्यों और मर्यादाओं की याद दिलाता है, वहीं गले में धारण की गई कांठी हमें हर क्षण भगवान से जुड़े रहने की प्रेरणा देती है।

अपने बच्चों को कथा में जरूर लेकर आना चाहिए, क्योंकि यही वह पवित्र स्थान है जहाँ उनके मन और संस्कारों का वास्तविक निर्माण होता है। जब बच्चे कथा में बैठकर भगवान श्री राम, श्री कृष्ण और संत महापुरुषों की लीलाओं और उपदेशों को सुनते हैं, तो उनके मन में स्वाभाविक रूप से भक्ति, विनम्रता, करुणा और सत्य जैसे गुण विकसित होने लगते हैं। आज के समय में जहाँ बच्चे मोबाइल, टीवी और बाहरी आकर्षणों में अधिक उलझ रहे हैं, वहाँ कथा उन्हें एक सकारात्मक और आध्यात्मिक वातावरण प्रदान करती है।

राम कथा हमें यह भी सिखाती है कि परिवार में कभी अहंकार या स्वार्थ नहीं होना चाहिए, बल्कि एक-दूसरे के प्रति सम्मान और समझ होनी चाहिए। यदि हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों को ईमानदारी से निभाए और दूसरों के सुख-दुख का ध्यान रखे, तो परिवार में हमेशा प्रेम और शांति बनी रहती है। इसलिए हमें अपने जीवन में भगवान श्री राम के आदर्शों को अपनाकर परिवार को एक मजबूत, संस्कारी और खुशहाल बनाने का प्रयास करना चाहिए।

आज लोग भजन और सत्संग से दूर होते जा रहे हैं। उनका मन भक्ति में नहीं लग रहा, क्योंकि वे बाहरी दिखावे, व्यस्तता और मोह-माया में उलझे हुए हैं। इसी कारण उन्हें सच्ची शांति और खुशी नहीं मिल पाती। सच्ची खुशी धन, नाम या दिखावे में नहीं, बल्कि भगवान के स्मरण और अच्छे कर्मों में होती है। जब मनुष्य बुरे संग से दूर रहकर भजन और भक्ति में मन लगाता है, तभी उसका जीवन सुखमय और शांत बनता है।

आज धर्म का प्रचार-प्रसार धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। लोग नकारात्मक और गलत विषयों वाले वीडियो को बहुत तेजी से वायरल कर देते हैं, लेकिन जब कोई व्यक्ति धर्म, संस्कार और सद्गुणों की बात करता है, तो उसका मजाक बनाया जाता है या उसे अनदेखा कर दिया जाता है। यह प्रवृत्ति समाज के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि इससे नई पीढ़ी सही दिशा से भटक सकती है।

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