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शनिदेव की मदद से हनुमान जी को मिली थी विजय

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चमत्कारिक है ऐंति के शनिदेव की ऐतिहासिक कथा

मनोज कुमार द्विवेदी, अनूपपुर 

कहा जाता है कि यदि त्रेतायुग में शनि महाराज हनुमान जी की मदद नहीं करते तो भगवान श्री राम कभी लंका विजय नहीं कर पाते। मुरैना के ऐंति पर्वत स्थित शनिदेव के विश्व प्रसिद्ध ऐतिहासिक मंदिर में श्रद्धा लुओं को यहाँ पहुँच कर आत्मिक शांति प्राप्त होती है। तुलसी मानस प्रतिष्ठान मध्यप्रदेश भोपाल द्वारा उद्धृत यहाँ लगाए गये एक शिला पट्टिका में उल्लेख है कि त्रेतायुग में शनि महाराज की सहायता से हनुमान जी ने लंका में भगवान श्री राम की विजय का मार्ग प्रशस्त किया था। मुरैना के ऐंति गाँव में विश्वप्रसिद्ध शनि देव का ऐतिहासिक मन्दिर आज भी इसका गवाह है। लंका में जब राक्षसों ने हनुमान जी की पूंछ में आग लगाई थी और हनुमान जी ने लंका दहन का प्रयास किया था तो वे सफल नहीं हो पाए थे। तब योगबल से हनुमान जी ने पता लगा लिया कि उनके प्रिय सखा शनिदेव रावण के पैरों के नीचे आसन वने हुए हैं । उन्ही के प्रभाव से लंका में आग नहीं लग पा रही है।


हनुमान जी ने अपने बुद्धि चातुर्य से शनि देव को रावण के पैरों के नीचे से मुक्त करवाया और तुरंत लंका छोड़ने को कहा। वर्षों तक रावण के पैरों के नीचे आसन बने रहने के कारण शनिदेव अत्यंत दुर्बल हो गये थे । लंकाधिपति की कैद से मुक्त होने के बाद कुछ दूर चल कर ही वे थक गये। उन्होंने हनुमान जी से कहा कि वे दुर्बल हो गये हैं और अधिक नहीं चल सकते। और जब तक वो लंका में हैं ,तब तक लंका दहन नहीं हो सकता। वो इतने कमजोर हो गये हैं कि तुंरत लंका नहीं छोड़ सकते। यह सुनकर हनुमान जी मानसिक परेशानी से घिर गये। तब शनिदेव ने कहा कि आप इतने बलशाली हैं कि मुझे आप भारत भूमि की ओर प्रक्षेपित कर दें। तब मैं लंका से दूर हो जाऊंगा और तब आप लंका दहन कर सकेगें।
वीर हनुमान जी ने ऐसा ही किया। उन्होंने शनिदेव को पूरे वेग से भारत की ओर फेंका। शनिदेव मुरैना जिले के ऐंति गाँव के समीप एक पर्वत में गिरे। जिसे अब शनिपर्वत कहा जाता है‌। इस पर्वत पर जहां वे गिरे वहाँ आज भी विशाल गड्ढा है। यहाँ शनिदेव ने घोर तपस्या करके अपनी शक्तियाँ प्राप्त कीं। चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य ने यहाँ शनि मन्दिर की स्थापना की। इस मन्दिर में पूर्वाभिमुख भव्य दिव्य शनि प्रतिमा स्थापित हैं। सूर्य और शनि देव के मध्य एक श्रृंगारिक सुन्दर से हनुमान जी की स्थापना भी विक्रमादित्य ने किया था।


ऐंति से ही शनि शिंगणापुर की प्रतिमा हेतु शिला पहुँची थी। इसकी अलग कहानी है।ऐंति के शनि मन्दिर में प्रत्येक अमावस्या को विशाल मेले का आयोजन होता है। जिसमें लाखों भक्त गण यहाँ शनिदेव की पूजा अर्चना और दर्शन के लिये आते हैं।

ॐ नीलांजन समाभासं रविपुत्र यमाग्रजं ।
छाया मार्तण्ड संभूतं तं नमामि शनैशचरं ।।

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