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बौद्धधर्म-दर्शन एवं मूल्यपरक शिक्षा पर पांच दिवसीय कार्यशाला

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राष्ट्रीय शिक्षा नीति और भारतीय ज्ञान प्रणाली के परिप्रेक्ष्य में आयोजन

परा-अपरा विद्या का सम्यक ज्ञान मिलने से भारतीय समाज आक्रांता नहीं बना

रायसेन। बौद्धधर्म-दर्शन एवं मूल्यपरक शिक्षा पर केंद्रित पांच दिवसीय कार्यशाला का जनजातीय संग्रहालय में शुभारंभ हुआ। मुख्य अतिथि पाणिनि संस्कृत विश्वविद्यालय उज्जैन के कुलगुरु प्रो. विजय कुमार मेनन ने कहा कि भारतीय ज्ञान पद्धति में मूल्यों पर विशेष जोर देते हुए आचार्यों के गुण बताए गए क्योंकि यदि आचार्य मूल्यवान होगा तो उसके द्वारा दी गई शिक्षा भी मूल्यपरक हो जाएगी। हमें परा और अपरा विद्या की सम्यक शिक्षा दी गई जिससे भारतीय समाज आक्रांता नहीं बना। प्रो मेनन ने कहा कि शब्द संस्कृति से आते है और भाषा में दूसरे शब्दों की मिलावट संस्कृति को संक्रमित कर देती है ।


बीज वक्तव्य देते हुए महर्षि वाल्मीकि संस्कृत विश्वविद्यालय, कैथल, हरियाणा के कुलपति प्रो. रमेश चन्द्र भारद्वाज ने कहा कि भारतीय चिंतन सार्वभौमिकता, सार्वकालिक और सर्वग्राह्यता के सिद्धांतों पर आधारित है। उन्होने आव्हान किया कि हमें शोध के पश्चिमी तरीकों को सीखना और उपयोग में लाना चाहिए। प्रो भारद्वाज ने कहा कि भारतीय ज्ञान की सभी परम्पराए एक दूसरे से सम्बद्ध है और पिछले 10 हजार साल से भारतीय समाज मूलतः वैदिक समाज है। प्रो. भारद्वाज ने कहा कि बौद्ध काल में बौद्ध दर्शन मध्य एशिया से लेकर मध्य पूर्व एशिया तक फैला हुआ था और इस काल में आम लोगों का दृष्टिकोण भी वैज्ञानिक था। उन्होने कहा कि हमें सामूहिक रुप से कार्य करना होगा तभी भारतीय चिंतन में वास्तविक दृष्टि में भारतीय ज्ञान परंपरा का प्रवेश हो पाएगा।


दत्तोपन्त ठेंगड़ी शोध संस्थान के निदेशक डॉ मुकेश मिश्र ने कहा कि सनातन दृष्टि अभेद दृष्टि है। डॉ. मुकेश मिश्रा ने कहा कि भारत में सभी पंथ, संप्रदाय, दर्शन, विचार और परंपराओं में एकात्मकता है ताकि हम श्रेष्ठ मनुष्य बन सकें। डॉ मिश्र ने आव्हान किया कि विभिन्न विषयों के बारे में बौद्ध संस्कृति के अवदानों और विषय विस्तार पर मूल पत्र जारी करना चाहिए।
कार्यक्रम कि अध्यक्षता करते हुए साँची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. वैद्यनाथ लाभ ने कहा कि भारत का सांस्कृतिक विस्तार अद्भुत है। भारतीय विचार पूरे विश्व में फैला जो कि सर्वे भवन्ति सुखिन: तथा वसुधैव कुटुंबकम की दृष्टि थी। प्रो. लाभ ने कहा कि बौद्ध धर्म दर्शन में चरित्र पर बहुत बल रहा है।


उद्घाटन समारोह में धन्यवाद देते हुए कुलसचिव प्रो. अलकेश चतुर्वेदी ने कहा कि साँची विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म दर्शन के भारतीय ज्ञान परम्परा में योगदान पर पाठ्यक्रम बनाएगा। कार्यक्रम के संयोजक और नोडल अधिकारी डॉ. संतोष प्रियदर्शी ने कहा कि “बौद्धधर्म-दर्शन और मूल्यपरक शिक्षा” पर यह कार्यशाला एक शैक्षिक प्रतिमान बनाने की दिशा में एक कदम है जो न केवल ज्ञान प्रदान करता है बल्कि बौद्ध धर्म की कालातीत शिक्षाओं से प्रेरणा लेते हुए सद्गुण और ज्ञान भी पैदा करता है। कार्यक्रम का संचालन प्रो नवीन कुमार मेहता ने किया।
12 जुलाई तक कार्यशाला में बुद्ध के बाद विभिन्न शिक्षा केंद्रों का विकास और पाठ्यक्रम के साथ ही विभिन्न बौद्धाचार्यों के शिक्षा में योगदान और आज के समाज में बौद्धधर्म-दर्शन पर केंद्रित मूल्यपरक शिक्षा की उपयोगिता पर चर्चा होगी।

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