मोबाइल-टीवी के दौर में राजस्थान के कलाकार ने संभाली परंपरा की डोर, वेशभूषा और अभिनय देख ग्रामीणों को याद आए पुराने दिन
दीवानगंज रायसेन
आधुनिकता के दौर में मोबाइल और टीवी ने मनोरंजन के पारंपरिक साधनों की जगह ले ली है। बदलते समय के साथ लोककलाओं और पारंपरिक कलाकारों को देखने का अवसर भी लोगों को कम ही मिल पाता है। ऐसे समय में राजस्थान से आए एक बहुरूपिया कलाकार ने लगभग 15 साल बाद अंबाडी गांव पहुंचकर पुरानी लोककला की यादें फिर ताजा कर दी हैं। अलग-अलग दिन अलग-अलग रूप और किरदार धारण कर लोगों का मनोरंजन करने वाले कलाकार इन दिनों ग्रामीणों के बीच आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।
राजस्थान के शिखर जिले के हंसपुर निवासी इंसाफ भाई पिता पप्पू भाई इन दिनों अंबाडी सहित आसपास के क्षेत्र में बहुरूपिया कला का प्रदर्शन कर रहे हैं। उन्होंने इस बार भील का रूप धारण किया है। पारंपरिक पहनावा, चेहरे का श्रृंगार और अपने अभिनय के जरिए वह लोगों का मनोरंजन कर रहे हैं। उनकी वेशभूषा और अंदाज देखकर बुजुर्गों को अपने पुराने दिन याद आ रहे हैं, वहीं बच्चे और युवा भी इस पारंपरिक कला को उत्सुकता से देख रहे हैं।
पिता के साथ सीखी बहुरूपिया कला, अब परंपरा को आगे बढ़ाने की कोशिश
इंसाफ भाई ने बताया कि बहुरूपिया कला उनके परिवार की पारंपरिक कला है। उन्होंने अपने पिता के साथ रहकर इस कला को सीखा। करीब 15 वर्ष पहले वह अपने पिता के साथ अंबाडी गांव में आए थे। उस समय बहुरूपिया कलाकारों को देखने के लिए गांवों में लोगों की भीड़ जुट जाती थी। बच्चे और बुजुर्ग कलाकारों के अलग-अलग रूप देखने के लिए उत्साहित रहते थे। लेकिन अब ऐसा देखने को नहीं मिल रहा है।
समय के साथ मनोरंजन के साधन बदल गए। मोबाइल फोन, टीवी और सोशल मीडिया के बढ़ते चलन के कारण बहुरूपिया जैसी लोककलाएं धीरे-धीरे लोगों की जिंदगी से दूर होती चली गईं। इसके बावजूद इंसाफ भाई अपने पारंपरिक हुनर को छोड़ने के बजाय उसे आगे बढ़ाने में जुटे हैं।

अलग-अलग किरदारों से लोगों का मनोरंजन
इंसाफ भाई ने बताया कि बहुरूपिया कला में कलाकार अलग-अलग किरदार और वेश धारण कर लोगों के बीच पहुंचता है। इस बार उन्होंने भील का रूप धारण किया है। उनका उद्देश्य केवल लोगों का मनोरंजन करना ही नहीं, बल्कि नई पीढ़ी को इस पुरानी लोककला से परिचित कराना भी है।
उन्होंने कहा कि बहुरूपिया केवल मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि हमारी लोकसंस्कृति और पुरानी परंपराओं की पहचान है। आधुनिक दौर में इस कला को जीवित रखना चुनौती जरूर है, लेकिन जब लोग उनके अभिनय को देखकर मुस्कुराते हैं और पुराने दिनों को याद करते हैं तो उन्हें अपनी मेहनत सफल लगती है।
बच्चों और युवाओं में भी दिखी उत्सुकता
करीब 15 साल बाद अंबाडी क्षेत्र में बहुरूपिया कलाकार को देखकर ग्रामीणों में खासा उत्साह देखने को मिल रहा है। बुजुर्ग जहां पुराने समय की यादों में खो गए, वहीं बच्चों और युवाओं के लिए यह अपने आप में नया अनुभव रहा। कई लोग कलाकार के साथ फोटो खिंचवाते नजर आए तो कई ग्रामीण उनकी वेशभूषा और अभिनय को करीब से देखते रहे।
मोबाइल और टीवी के बढ़ते दौर में अंबाडी में बहुरूपिया कलाकार की दस्तक ने न केवल लोगों का मनोरंजन किया, बल्कि भूली-बिसरी लोककला और ग्रामीण संस्कृति की यादों को भी फिर से जीवंत कर दिया।