आलेख
संदीप भम्मरकर
दतिया उपचुनाव की स्क्रिप्ट भले अभी आधिकारिक तौर पर न लिखी गई हो, लेकिन दोनों दलों में खौफ का पहला ड्राफ्ट तैयार हो चुका है। कांग्रेस सहानुभूति कार्ड खेलते हुए राजेंद्र भारती परिवार पर दांव लगाने का मन बना रही है, मगर उसे तोड़फोड़ का डर सता रहा है। उधर बीजेपी भी पूरी तरह निश्चिंत नहीं है। नरोत्तम मिश्रा के गढ़ में अपने ही कहीं खेल न बिगाड़ दें, इसकी चिंता अलग है। दतिया की राजनीति का पुराना नियम है, यहां मुकाबला विरोधियों से कम, अपनों से ज्यादा होता है। इसलिए चुनाव से पहले ही दोनों खेमों की धड़कनें बढ़ी हुई हैं।

गेहूं में भी ‘नॉर्थ-साउथ डिवाइड’!
एमपी ने इस साल रिकॉर्ड गेहूं खरीदी कर सीना चौड़ा किया, लेकिन साउथ से आई एक मांग ने खुशी का तापमान थोड़ा कम कर दिया। पीडीएस के लिए इस बार साफ संदेश आया है, गेहूं चाहिए तो “टनाटन” चाहिए… और हो सके तो पंजाब वाला! वजह, पिछले साल भेजे गए गेहूं की क्वालिटी पर सवाल उठे थे। अब साउथ की पसंद ने नया सियासी और प्रशासनिक गणित खड़ा कर दिया है। इधर रिकॉर्ड खरीद का जश्न मन रहा है, उधर मांग उठ रही है कि माल पंजाब का भेजिए। अब इसे गेहूं की राजनीति कहें या क्वालिटी का जनादेश!

शुरू हुआ ‘नेटवर्किंग महोत्सव’!
तबादलों का मौसम आते ही मंत्रालय के आसपास नेटवर्किंग का मौसम भी खिल गया है। मंत्री बंगले से लेकर गलियारों तक बिचौलियों की चहलकदमी बढ़ गई है। सिफारिशी चिट्ठियों का दौर अब भी जारी है, लेकिन उनका पुराना रुतबा फीका पड़ चुका है। पिछले साल कई नेताओं की चिट्ठियां फाइलों में ही दम तोड़ गई थीं। इसलिए इस बार खिलाड़ी सीधे अफसरों तक पहुंच बनाने में जुटे हैं। कोई विधायक की लाइन पकड़ रहा है, कोई मंत्री के करीबी की। कुल मिलाकर तबादलों की फाइलें अभी खुली नहीं हैं, लेकिन सेटिंग का नेटवर्क पूरी स्पीड से ज़मीन पर आ चुका है।

सर्वोच्च प्राथमिकता, सबसे नीचे!
बीजेपी दफ्तर में इन दिनों कार्यकर्ताओं का सबसे बड़ा दुख कोई विपक्ष नहीं, बल्कि “ए-प्लस-प्लस” नोटशीट बनी हुई है। मंत्रीजी ने जिसे सर्वोच्च प्राथमिकता बताकर आगे बढ़ाया, अफसरों ने उसे शायद सबसे निचली प्राथमिकता मान लिया। नतीजा, कार्यकर्ता फाइल की तलाश में मंत्रालय से पार्टी दफ्तर तक चक्कर काट रहे हैं। शिकायत आखिरकार पांचवीं मंजिल तक पहुंच गई है। क्योंकि कई मंत्रियों को भी पता चला है कि उनकी खास नोटशीट भी डस्टबिन दर्शन कर रही हैं। जाहिर है उनका पारा उफान मारेगा।
पीएचक्यू में अफसर की शिकायत
“जब बिल का पैसा न मिले, तो शिकायत का रास्ता भी वीआईपी हो जाता है!” एक फर्नीचर कारोबारी की गुहार इन दिनों पीएचक्यू के गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है। मामला यह कि मैडम अफसर फर्नीचर तो ले गईं, मगर भुगतान अटक गया। कारोबारी घर के चक्कर काटता रहता तो बतंगड़ नहीं बनता। लेकिन अब सीधे डीजीपी दरबार में लिखित अर्जी लगा दी गई है। जाहिर बात है, पीएचक्यू के अफसर भी सिर खुजलाने लगेंगे। कारोबारी ने सीधे मैडम से पंगा तो ले लिया है। लेकिन मैडम के पलटवार का अनुमान उसे भी है। पीएचक्यू के गलियारों में इस मामले पर चर्चा गर्म है।

राज्यसभा को लेकर दावेदारी तेज
एमपी से राज्यसभा की सीट तीन सीटें खाली हो रही है। दो बीजेपी की रहेंगी, लेकिन कौन जाएगा इसपर फैसला अभी बाकी है। बीजेपी के जॉर्ज कुरियन और सुमेर सिंह सोलंकी के साथ कांग्रेस के दिग्विजय सिंह की सीट खाली हो रही हैं। बीजेपी का फैसला तो हाईकमान करेगा। साथ ही कांग्रेस में भी पशोपेश है, मीनाक्षी नटराजन की राह आसान नहीं है। कुछ दावेदार पर्दे के पीछे से बिसात बिछा रहे हैं। उधर, बीजेपी से एमपी में किसी आदिवासी चेहरे के अलावा दूसरे दिग्गज नेताओं के नाम भी चल पड़े हैं। इसमें सुरेश पचौरी की बढ़ती मेल मुलाकातों को भी इसी से जोड़कर देखा जाने लगा है।

– लेखक मप्र के वरिष्ठ पत्रकार हैं।