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आदिवासी अस्तित्व का प्रश्न, अपराधी कौन? -विवेक त्रिपाठी

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आलेख
विवेक त्रिपाठी

पिछले दिनों मऊगंज जिले के गड़रा गांव में स्थानीय आदिवासी कोल बस्ती के कुछ लोगों द्वारा एक ब्राह्मण युवक की पीठ पीट कर हत्या कर दी गई, घटना के दौरान गई पुलिस के साथ पत्थरबाजी हुई एक एक महिला डीएसपी और सब इंस्पेक्टर को भाग कर घर में घुसना पड़ा, एक एएसआई की दुखद मृत्यु हुई, कई लोग घायल हैं।

मैं खुद रीवा से हूं, कोल आदिवासियों के बीच मेरा बचपन बीता है, इसलिए मैं किसी और से कोल लोगों के बारे में बेहतर जानता हूं। रीवा का कोल इतना सहज, सरल है कि उसमें इतनी क्षमता ही नहीं है कि वह संगठित होकर हिंसा करने की सोच सके। यदि यह घटना घटी है तो जरूर इसके पीछे कुछ घटनाक्रम रहे होंगे।

मेरा गांव रीवा प्रयागराज के बीच हाईवे से तीन चार किलोमीटर अंदर है, पूरा गांव ब्राह्मण बाहुल्य है (ब्राह्मण डॉमिनेटेड रीवा का यही पैटर्न है) जबकि एक बस्ती कोल आदिवासियों की है, जिन्हें खेतों में काम करने के लिए आज से कई साल पहले स्थानीय ब्राह्मणों द्वारा यहां बसाया गया था। यानी आज जिस जमीन पर कोल रह रहे हैं वहां की जमीन उनकी खुद की नहीं है, स्थानीय ब्राह्मण भू स्वामियों द्वारा इन्हें रहने के लिए दी गई पट्टे की जमीन है।

गांव में स्थानीय जमींदारों के खेतों में ये सदियों से मेहनत मजदुरी करके पेट पालते रहे हैं, किसी के पास खुद की खेती की जमीन नहीं, कच्चा टूटा फूटा घर वो भी पट्टे की जमीन पर। झाबुआ में भील आदिवासी बहुसंख्या में हैं , इसलिए वहां उनकी आवाज है किंतु रीवा या विंध्य क्षेत्र में कोल आदिवासी मेजोरिटी में नहीं है इसलिए इनकी कोई आवाज नहीं है और यही पैटर्न देश में किसी ट्राइबल ब्लॉक से बाहर गैर ट्राइबल मेजोरिटी के बीच रह रहे हर जगह के आदिवासी की है।

गांव के कोल लोगों ने कुछ साल पहले प्रधानमंत्री आवास योजना में अप्लाई किया, कुछ लोगों की पहली किस्त निकली और उन्होंने घर बनाना शुरू किया तो बगल के पंडित जी, जिनके पूर्वजों ने इन्हें यहां बसाया था ने आपत्ति ले ली और कहा की जिस जमीन पर वह अपने कच्चे घर बना कर रह रहे हैं वह उनकी है। मेरी जानकारी अनुसार पंडित जी चाहते थे कि उनके घर के ठीक बगल में रह रहे कोल लोग यहां से हट जाएं क्योंकि वह अशिक्षित हैं, अनपढ़ है, अशुद्ध है और कोल हैं। मामला तहसीलदार के यहां गया, राजस्व विभाग का सर्वे हुआ, पटवारी ने बताया कि जिस जमीन में कोल कच्चे घर बनाए हैं, वह उनकी नहीं है, बगल की जमीन उनकी है तो कोल लोगों ने पटवारी द्वारा बताई बगल की जमीन में घर बनाना शुरू कर दिया। पंडित जी ने तहसीलदार न्यायालय में इसे चैलेंज किया, तहसीलदार न्यायालय से कोल लोगों के पक्ष में निर्णय हुआ तो पंडित जी एसडीएम कार्यालय में अपील कर दिए।

कुछ दिनों बाद मैं गांव गया, मेरे घर काम करने वाली एक बुजुर्ग विधवा कोल महिला ने मुझे आपबीती बताई और सहयोग करने के लिए रिक्वेस्ट किया। मैं स्वयं कोल लोगों की बस्ती गया और देखा कि टूटे-फूटे घर बारिश में कब गिर जाए कुछ पता नहीं.., एक वकील को खड़ा कर दिया, तो एसडीएम कार्यालय से भी कोल लोगों के पक्ष में फैसला हुआ और यह लोग अपना घर बनवाना शुरू कर दिए। पंडित जी यहां भी नहीं माने और फिर लोकल कोर्ट में अपील कर दिए।

कोल लोगों ने नींव का काम शुरू किया ही था कि एक दिन मेरे पास एक कोल लड़के का फोन आया – “भैया पुलिस आई है, साथ में दरोगा हैं ,हमें कहते हैं कि इस जमीन पर तुम्हें घर नहीं बनाना है”।

उसने मेरी बात कराई, मैंने फोन पर आए लोकल थाने के उस आदमी से पूछा –
लैंड रिवेन्यू मामले में पुलिस कब से पड़ने लग गई? इनको आपने घर बनाने से रोका है? पुलिस वाले ने बताया की मामला कोर्ट में है। मैंने उससे पूछा- कोर्ट ने कोई स्टे आर्डर किया है क्या? पुलिस वाला इधर-उधर की कहानी बताने लगा और चला गया पर आदिवासियों के मन में एक भय जरूर छोड़ गया।

कुछ दिन ही बीते होंगे कि एक दिन पंडित जी का परिवार कोल बस्ती में इसी लड़के के घर घुस गया और घर में घुसकर उस लड़के की पत्नी और 14 साल की नाबालिक लड़की के साथ मारपीट की। इस लड़के ने फिर मुझे फोन किया और बताया कि हम लोग लहू लुहान हैं , पंडित जी ने घर में घुसकर हमारे साथ मारपीट की है। कुछ दूसरे लोगों से फोन पर बात हुई तो पता चला कि यह घटना सही है।

मैं घर गांव की लड़ाई को कभी भी थाने में ले जाने पर विश्वास नहीं करता था, पर इस घटना से मैं भी गुस्से में था इसलिए मैंने उसे थाने जाने के लिए कहा। अनपढ़ आदमी था, चिट्ठी लिखने नहीं आती थी तो अपने मोबाइल से ही एक एप्लीकेशन लिखा और व्हाट्सएप पर भेजा, एक एमपी ऑनलाइन कियोस्क वाले को बोलकर एप्लीकेशन लिखवाई और वह कोल लड़का थाने गया। थाने में पहले से ही राजनीतिक लोगों का फोन पहुंच चुका था, इसलिए थानेदार ने उसको बिना एप्लीकेशन लिए भगा दिया।

मैंने थाना प्रभारी से फोन पर बात की और फिर पुलिस डिपार्टमेंट में ऊपर, तो मालूम पड़ा कि विधायक जी का दबाव था; यहां एक बात नोट करिएगा विधायक जी भी अनुसूचित जाति के थे, पर वह भी गलत तरीके से ब्राह्मण का सपोर्ट इसलिए कर रहे थे कि ब्राह्मणों का एक बड़ा वोट बैंक है जिसके दम पर विधायक जी विधायक बनते रहे हैं। बहरहाल दबाव इतना बढ़ा कि ST/ SC केस में एफआईआर दर्ज हुई।

ST/SC केस में उत्पीड़ित व्यक्ति को कंपनसेशन देने का नियम है, 7 महीने बाद मैंने उस लड़के से पूछा कि तुम्हें कंपनसेशन मिला? उसने मना किया, मैंने अपने स्रोतों से पुलिस थाना, न्यायालय, और कुछ दूसरी जगह पता लगाया तो मालूम हुआ कि कंपनसेशन की नोट शीट पुट अप ही नहीं हुई है। एक वकील को बोलकर नेशनल ट्राईबल कमिश्नर के यहां एक कंप्लेंट दायर कराई तो रीवा कलेक्टर को नोटिस गया, इसके बाद सिस्टम हड़बड़ाहट में आया; अगले हफ्ते भर के भीतर कंपनसेशन की दो किस्त संबंधित के खाते में ट्रांसफर हो गई।

ग्राम पंचायत ने उन आदिवासियों की प्रधानमंत्री आवास योजना की अगली किस्त रोकने के लिए षड्यंत्र शुरू कर दिए। कोल परिवारों के पास कोई बचत नहीं होती, इसलिए काम ठप पड़ गया। मैंने इन लोगों को कुछ आर्थिक मदद उपलब्ध कराई और इनके 6-7 घर करीब करीब बनकर तैयार हो गए।

कहानी यहीं खत्म नहीं हुई, लोकल वर्चस्व इतना था कि इनके नए बने घर में यह आदिवासी रहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे क्योंकि इन्हें धमकी दी गई। पुलिस थाने का कोई एक अदना वर्दी वाला 400- 500 की नोट के बदले गांव जाकर खड़ा हो जाता है और कह देता है कि कोर्ट का स्टे है, बिना हमारी जानकारी के तुम घर नहीं घुसना; ऐसा ही उस कोल लड़के ने मुझे फोन पर उस दिन बताया था। भारत के गांवों में आज भी पुलिस का मौखिक कथन ही कोर्ट का आदेश है।

प्रधान मंत्री आवास (1- 2 किस्त ही सही) के घर बने हुए आज तीन-चार साल हो चुके हैं जो वीरान हैं; आज भी गांव के आदिवासी अपने पुराने बगल के टूटे-फूटे कच्चे घरों में रहते हैं, इन पक्के घरों में रहने की हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं।

जिम्मेदार कौन है? पुलिस ,पंचायत, लोकल एडमिनिस्ट्रेशन या गांव के जमीदार अथवा वह पंडित जी या हम आप?

बात पंडित जी के बुरे- भले होने की भी नहीं है। गांव के वह पंडित जी वही हैं, जो हमारा समाज है। दरअसल जब मैं छोटा बच्चा था और गांव में रहता था तब बचपन में हमें बताया जाता था कि वह कोल है और हम ब्राह्मण हैं, हम पवित्र हैं, यह अशुद्ध हैं, हम इनको छू देंगे तो हम अपवित्र हो जाएंगे। समाजीकरण कुछ इस तरीके से होता था कि ब्राह्मण बच्चों के मन में यह भावना बन जाती थी कि यही सच्चाई है, इस धरती में सिर्फ जीने का हक हमें है, यह लोग तो हमारी सेवा के लिए ही बने हैं; यह इंसान नहीं है, कुछ और हैं। संभवत: गांव के उन पंडित जी जो खुद भी ज्यादा पढ़े लिखे नहीं है और ज्यादा सक्षम भी नहीं है उनकी भी संभवत: यही मेंटालिटी थी; अन्यथा यह सब वह क्यों करते हैं? दो-तीन हजार स्क्वायर फीट की जमीन गांव के किसी किसान के लिए होती ही कितनी है?

मुझे याद है जब मैं बहुत छोटा था तो मेरे दादा जब कभी देखते कि मैंने किसी कोल को छू दिया है, तो मुझे वह दिसंबर की ठंड में, ठंडे पानी से नहाने को कहते थे। हम जब बचपन में गांव के स्कूल में जाते थे, तो क्योंकि वहां कोल आदिवासियों के बच्चे भी पढ़ने आते थे, इसलिए हम जो कपड़े पहन कर जाते वह घर के बाहर एक अलमारी में रखते, फिर घर के भीतर प्रवेश करते और जब अगले दिन स्कूल जाना होता तो अपने स्वच्छ कपड़े उतारते, अलमारी में रखे उन अशुद्ध कपड़ों को पुनः पहनते और फिर स्कूल जाते। शुद्ध अशुद्ध का यह चक्कर था, स्कूल में कोल बच्चों के छू जाने से हमारे कपड़े अशुद्ध हो जाते थे।

पिछले शनिवार के दिन मऊगंज में जो घटना घटी, यहां मामला अधिया (बंटाई) की खेती का था, इस गांव के भूमिहीन कोल लैंडलॉर्ड के यहां मजदूरी अथवा बंटाई में जमीन लेकर खेती करते थे। यानी मामला व्यक्तिगत दो लोगों के बीच लेनदेन का अथवा दो परिवारों के बीच खेती की उपज के बंटवारे से जुड़ा हुआ लगता है, जो कालांतर में मारपीट और हिंसा में बदल गया।

खुद लोकल थाना प्रभारी ने अपने स्टेटमेंट में बताया कि मृतक के पिता अपनी लाइसेंसी राइफल लेकर कोल बस्ती गए थे, जिसे हमलावरों ने छीन लिया था। पुलिस ने इस राइफल को आरोपियों के कब्जे से बरामद कर लिया है। मृतक के पिता राइफल लेकर पहले गए थे या बाद में बेटे को छुड़ाने के लिए गए यह तो इन्वेस्टिगेशन का प्रश्न है किंतु किसी ने कभी अपने आप से पूछा कि इन गरीब अनपढ़, डरे सहमे और दबे कुचले गरीब आदिवासियों से लड़ने, उनकी बस्ती में राइफल लेकर जाने की इतनी बड़ी जरूरत क्या थी?

कुछ जातिवादी लोग इसे दो जाति या दो समुदायों के बीच की लड़ाई साबित करने में लगे हैं, सोशल मीडिया में अनाप शनाप लिख रहे हैं, शहर बंद कराने की अपील कर रहे हैं।

मेरी समझ में ये दो व्यक्तियों या दो परिवारों के बीच व्यक्तिगत लड़ाई थी जिसमें क्रिया हुई और फिर प्रतिक्रिया, जिसका अंत भयावह हुआ। मुद्दा मानवीय है और इसे संवेदना के साथ सुलझाने की जरूरत है। इसे कोई जातिगत तूल ना दे, यही बेहतर है। पूरे विंध्य में कोल आदिवासियों के पास ना तो शिक्षा है, ना समझ और न चल- अचल संपत्ति। धनविहीन और अनपढ़ अज्ञानी से विचारशील होने की कल्पना भी मत करिए।

घटना दुखद थी, किंतु हो गई, अब बताइए क्या करेंगे, बुलडोजर चलवाएंगे?

चलवाइए..

मरे हुए लोगों को और कितना मारेंगे?

जो हत्या में शामिल थे उनको कानून देखेगा, दया करिए इन निरीह लोगों पर, हम कुछ भी ऐसा ना करें जिससे ये पूरा घटनाक्रम ब्राह्मण आदिवासी संघर्ष प्रतीत हो..

एक बात ध्यान देंगे तो पता चलेगी कि पूरे भारत में सामान्यतः अनुसूचित जातियों (SC) में से कुछ एक जातियों को अछूत माना जाता रहा है, किन्तु आदिवासियों को नहीं, किन्तु विंध्य में इन कोल आदिवासियों को भी अछूत माना जाता रहा है। भूमिहीन होने से ये स्थानीय ब्राह्मण, पटेल या राजपूत भू स्वामियों के यहां खेतों में मेहनत मजदूरी करते हैं। पहले ये खेतों में मजदूरी के अलावा रीवा अथवा इलाहाबाद में किराए का रिक्शा चलाने का काम भी करते थे।

मैंने स्वयं इलाहाबाद में रिक्शा चलाने का काम करने वाले कोल आदिवासियों की नारकीय जिंदगी को देखा है। साल 2007 में मैं यूपीपीसीएस का इंटरव्यू देने प्रयागराज गया था, जीरो रोड बस स्टैंड से पब्लिक सर्विस कमिशन ऑफिस जाने के लिए रिक्शे में बैठा, रिक्शे वाले से किराया पूछा तो उसने ₹5 बताया। मैं समझा आसपास ही होगा, लेकिन पूरे 20 – 25 मिनट मुझे वहां पहुंचने में लगे, करीब 8- 10 किलोमीटर का रास्ता रहा होगा; पूछने पर उसने बताया कि वह मिर्जापुर का का कोल है। गर्मी का महीना था, यह लड़का पसीने से तरबतर हो चुका था, उसे स्किन की बीमारी थी, रात को सड़क किनारे खुले में सोता और दिन में रिक्शा चलाता, जो कमाता उसी में से एक हिस्सा रिक्शा मालिक को किराया देता और बचा घर भेजता। इन्हें अपने श्रम के मूल्य का ही कुछ पता नहीं है।

आपके मन में भी यह प्रश्न आया होगा कि उस रिक्शा वाले ने मुझसे किराया मात्र ₹5 क्यों मांगा? दरअसल बात यह है की विंध्य और अगल-बगल के सभी शहरों में जितने रिक्शा वाले उस समय हुआ करते थे, वह सब के सब कोल थे। गांव में अच्छी मजदूरी मिलती नहीं थी इसलिए थोड़े बहुत दमखम वाले पुरुष बगल के शहर चले जाते थे; पर क्योंकि सप्लाई ज्यादा थी और सप्लाई की तुलना में डिमांड कम, इसलिए वहां हर एक रिक्शा पुलर आदमी दो-चार रुपए में चार-पांच किलोमीटर रिक्शा खींचने के लिए तैयार बैठा था।

आजकल इनकी एक बड़ी संख्या दिल्ली मुंबई जैसे महानगरों में माइग्रेट कर गई है, जहां ये फैक्ट्री अथवा बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन में मेहनत मजदूरी करते हैं। कोल एक शांत प्रवृत्ति वाली जाति है, लड़ाई झगड़े की बात सोचना बहुत दूर..। मऊगंज की घटना में अगर सामूहिक रूप से इन्होंने प्रतिक्रिया व्यक्त की, कोल महिलाएं- बच्चे – पुरूष सब सामूहिक रूप से सामने आए और उन्होंने न केवल किसी स्थानीय व्यक्ति अपितु पुलिस के ऊपर भी हमला किया तो जरूर कोई गहरी बात थी।

मैं एक बात हमेशा अपने समाज से पूछता रहा हूं, हम तो किसी वक्त यूपी बिहार तरफ से माइग्रेट होकर रीवा सतना की जमीन पर आए थे। मेरा खुद का परिवार आजसे छह-सात पीढ़ी पहले, प्रयागराज के एक गांव से आकर इस गांव में बसा था। आज से कुछ 100 साल पहले कोल आदिवासी ही तो यहां के स्थानीय निवासी थे? यहां की जल जंगल जमीन इन्हीं की तो रही होगी? फिर यह अपनी ही जमीन में भूमिहीन हो गए और हम भूस्वामी, कैसे?

आदिवासियों के लिए सरकारी नीतियों का असर हुआ है, लोकल स्कूल अस्पताल और स्थानीय प्रशासन में आदिवासियों की अच्छी खासी संख्या देखने को मिलती है पर आप खुद पता लगाइए; अपने अगल-बगल सरकारी नौकरियों में आपको भील मिलेंगे, आपको गोंड आदिवासी मिलेंगे; लेकिन कोल आदिवासियों के लड़के आपको कहीं नहीं मिलेंगे।

अति पिछड़े बैगा आदिवासियों के उत्थान के लिए शासन ने विशेष अभियान चलाया हुआ है, उनकी शिक्षा से लेकर सरकारी नौकरियों में रोजगार तक अभियान समय-समय पर चलाएं जाते रहे किंतु शासन प्रशासन की दो और आदिवासी जातियों पर नजर कुछ खास नहीं पड़ी। बैगा के अतिरिक्त मध्य प्रदेश में दो ऐसी आदिवासी जातियां और हैं जिनके लिए कुछ अलग करने की जरूरत है, इनमें से एक है चंबल बेल्ट की सहरिया और दूसरी विंध्य क्षेत्र की कोल..

मेरे गांव के कोल आदिवासियों के साथ जो हुआ और आज भी हो रहा है, यदि ये लोग भी मऊगंज के आदिवासियों की तरह आक्रोश में आकर कुछ कदम उठा लेते तो वही मऊगंज की तरह का बवाल यहां भी हो ही जाता? फिर आप कहते कि ये अपराधी हैं?

गैर जिम्मेदार और नकारा वे पुलिस और राजस्व वाले हैं जो अपनी जिम्मेदारियों से भागते हैं और नेताओं के आगे बस पूछ हिलाते हैं; गैर जिम्मेदार वोट की जोड़-तोड़ में पूरी तरह राजनीतिक दांव पेंच में ढल चुकीं हमारी पंचायतें हैं।

अपराधी आदिवासी नहीं, आप और हम हैं; अपराधी यह सिस्टम है..

-लेखक आबकारी विभाग में इंस्पेक्टर एवं लेखक विचारक हे।
-डिस्कलेमर – लेख में दिये गये विचार लेखक के अपने हे। इस एमपी टुडे का कोई सरोकार नही हे।

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