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उज्जैन गौरव दिवस 2 अप्रैल को

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हेमेंद्रनाथ तिवारी

उज्जैन। उज्जैन का गौरव दिवस 2 अप्रैल गुड़ी पड़वा के अवसर पर शहर में मनाया जायेगा। गौरव दिवस के अवसर पर शहर को सजाया जायेगा। घर-घर में रंगोली, लाईटिंग आदि करके नगर का जन्म उत्सव मनाया जा रहा है।गौरव दिवस के आयोजन को लेकर आयोजित की गई बैठकों में स्वयंसेवी संस्थाओं, सामाजिक संस्थाओं, औद्योगिक संस्थाओं एवं व्यापारिक संस्थाओं द्वारा शहर के 20 चौराहों को सजाने की जिम्मेदारी ली गई है।

हिंदू नव वर्ष गुड़ी पड़वा और गौरव दिवस बनाए जाने को लेकर उज्जैन के विद्वानों के द्वारा इस संबंध में अपने विचार प्रकट किए है।


संस्कृत के विद्वान एवं महर्षि पाणिनी संस्कृत विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ.मोहन गुप्त ने कहा कि मध्य प्रदेश सरकार का प्रतयेक शहर का गौरव दिवस मनाने का विचार अत्यन्त उत्तम है। उन्होंने कहा कि हाल ही में एशियाटिक सोसायटी ने वेबीनार किया था उसमें हिन्दुस्तान के केवल दो शहरों को शामिल किया था, जिनमें वाराणसी और उज्जैन थे। इसी से अंदाज लगाया जा सकता है कि उज्जैन का कितना महत्व है। डॉ.गुप्त ने कहा कि एलेंक्जेंडर के आक्रमण के समय भारतवर्ष में केवल तीन ही मुख्य शहर थे, पश्चिम में तक्षशिला पूर्व में पाटलीपुत्र व मध्य में उज्जैन। उज्जैन की विशेषता रही है कि यहां न केवल कला व साहित्य बल्कि व्यापार भी फला-फूला है। डॉ.गुप्त ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को गौरव दिवस में शामिल होना चाहिये।


महामण्डलेश्वर श्री शान्तिस्वरूपानन्दजी ने कहा कि प्रतिपदा के बाद की नवरात्रि में भगवान श्रीराम का जन्म हुआ था। उन्होंने कहा कि वर्ष प्रतिपदा पर भी सृष्टि की रचना हुई थी। नये वर्ष में उज्जैन के इतिहास में पहली बार गौरव दिवस मनाने जा रहे हैं। इस अवसर का लाभ लेते हुए सभी को आयोजनों में बढ-चढ़ कर सम्मिलित होना चाहिये। महामण्डलेश्वर ने कहा कि सभी लोग अपने घरों को अच्छे से सजायें घरों पर घट की स्थापना करें, स्वागत करें और गौरव उत्सव में बढ-चढ़कर भाग लें।


नाट्य निर्देशक एवं रंगकर्मी श्री सतीश दवे ने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण यहां पर विद्या ग्रहण करने आये थे। इससे यह निश्चित होता है कि यहां की संस्कृति कितनी परिपक्व थी। जहां तक संस्कृति का प्रश्न है, उसमें देश के विशिष्ट कवियों द्वारा उज्जयिनी के बारे में लिखा गया है। बाणभट्ट जैसे साहित्यकारों ने उज्जैन की संस्कृति की प्रशंसा की है। हमारे यहां सांस्कृतिक गतिविधियां अत्यन्त विकसित व समृद्ध थी। संस्कृति का विकास जो हमें आज दिखाई दे रहा है, यह सदियों की देन है। इस धरोहर को सहेजने, संवारने के लिये गौरव उत्सव मनाया जा रहा है। इसमें सभी लोगों को हिस्सेदारी करना चाहिये।


ज्योतिषाचार्य एवं पंचांगकर्ता श्री आनन्दशंकर व्यास ने कहा है कि वर्ष प्रतिपदा 2 अप्रैल से नये वर्ष का आरम्भ हो रहा है। उन्होंने कहा कि इसी दिन सृष्टि की रचना हुई थी। सृष्टि को आरम्भ हुए एक अरब 95 करोड़ 58 लाख 85 हजार 123 वर्ष हो गये हैं। उज्जैन कालगणना की नगरी है। उज्जैन का इतिहास अरबों वर्ष पुराना है। उन्होंने कहा कि चैत्र प्रतिपदा का दिन केवल उज्जैन के लिये ही महत्वपूर्ण नहीं है, बल्कि सम्पूर्ण विश्व के लिये गौरव का दिन है। इसलिये उज्जैन के प्रत्येक व्यक्ति को गौरव दिवस मनाकर स्वयं को गौरवान्वित होना चाहिये।


कालिदास अकादमी के निदेशक डॉ.संतोष पण्ड्या ने कहा कि उज्जैन की अपनी धार्मिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि है जो युगों से पल्लवित होती रही है। सृष्टि के आरम्भ से ही उज्जयिनी का अस्तित्व माना जाता है। युगबदलते गये और उज्जैन को कभी उज्जयिनी, अवन्तिका, कनकश्रृंगा आदि नामों से जाना जाता रहा है। यहां के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने प्रतिपदा पर भगवान सूर्य को अर्ध्य देकर गौरवशाली सनातन संस्कृति का सन्देश दिया था। इसी अवसर को उज्जैन के गौरव दिवस में बदलकर हम सब गौरवान्वित महसूस करें।

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