सांची विश्वविद्यालय में विशेष व्याख्यान का हुआ आयोजन
· ‘आचरण एवं चरित्र’ की दृष्टि छात्रों को दें- प्रो. वैद्यनाथ लाभ
· प्राध्यापकों को देश के उत्थान का नज़रिया देना होगा
· ‘देश के ज्ञान का उपयोग देश के लिए होना चाहिए’-डॉ. सप्रे
· छात्रों को भारतीय मनीषियों पर गर्व होना चाहिए-डॉ. सप्रे
रायसेन। सांची बौद्ध-भारतीय ज्ञान अध्ययन विश्वविद्यालय में आज ‘भारत के उत्थान में प्राध्यापकों/प्रबुद्धजनों की भूमिका’ विषय पर विशिष्ट व्याख्यान आयोजित किया गया। मौलाना आज़ाद नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (मैनिट) के रिटायर्ड प्रोफेसर डॉ. सदानंद दामोदर सप्रे ने कहा कि प्राध्यापकों को देश के उत्थान के लिए छात्रों को दृष्टि देनी होगी और ये प्राध्यापकों का दायित्व है कि वो अपने-अपने विषयों के शिक्षण के साथ-साथ छात्रों को भारतीय ज्ञान परंपरा से भी परिचित करायें।

डॉ सप्रे ने कहा कि हम स्वाधीन तो हैं लेकिन हमारी ज्ञान परम्परा में पूर्वजों के किए कार्यों पर जानकारी का अभाव है। उन्होंने कहा कि प्राचीन काल में ऋषि भारद्वाज ने एयरोनॉटिकल इंजीनियरिंग के सिद्धांत दिए थे जिनका आज भी अध्ययन किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि नासा के एक वैज्ञानिक ने एक भारतीय विज्ञानी से ऋषि भारद्वाज के ग्रंथ के बारे में पूछा लेकिन वो भारतीय हमारी पुरातन ज्ञान परम्परा के बारे में अनभिज्ञ था।
डॉ. सप्रे ने कहा कि शिक्षकों को चाहिए कि वो अपने छात्रों को भारतीय ज्ञान परम्परा से अवगत कराएं। डॉ. सप्रे ने कहा कि शिक्षकों के साथ-साथ छात्रों के अंदर भी यह भावना आनी चाहिए कि ‘मेरे ज्ञान का उपयोग देश के लिए किस प्रकार से हो सकता है’ तथा भारत की वर्तमान आवश्यकताएं क्या हैं।

सांची विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. बैद्यनाथ लाभ ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि शिक्षकों को चाहिए कि वो ज्ञान प्रदान करने के साथ-साथ आचरण पर फोकस करें, चरित्रवान रहें। स्वयं भी आचरण करें और छात्रों को भी आचरण करने की शिक्षा दें। उनका कहना था कि राष्ट्र ही वह इकाई है जो हमें एक सूत्र में बांधता है। उन्होंने कहा कि भारत की संस्कृति पुरानी चीजों को मटियामेट करने की नहीं बल्कि परिष्कार के जरिये बदलाव की है।

प्रो. बैद्यनाथ लाभ ने कहा कि छात्रों को विभिन्न भाषाएं सीखनी चाहिए। उन्होने भगवान बुद्ध का उद्धरण देते हुए कहा कि ज्ञान का उपयोग नहीं करने वाला व्यक्ति चरवाहे के समान है इसलिए खुद पर काम करें। विशेष व्याख्यान में सांची विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रो. अलकेश चतुर्वेदी ने कहा कि भारत में कभी पूर्ण क्रांति नहीं हुई है बल्कि सामाजिक सुधार हुए हैं क्योंकि क्रांति में सब कुछ बदल जाता है जबकि भारतीय परंपरा में उत्क्रांतियां हुई हैं जिसमें पुरानी छोड़ने वाली बातें ही छोड़ी जाती है और नई लेने वाली बातें जुड़ जाती हैं।